कश्मीर में एनकाउंटर पर उठे सवाल, सेना ने कहा मरने वाले चरमपंथी, परिजनों ने बताया बेगुनाह

    • Author, माजिद जहाँगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिन्दी के लिए

भारत प्रशासित कश्मीर के श्रीनगर में पिछले दिनों सेना ने एक एनकाउंटर में तीन चरमपंथियों को मारने का दावा किया था. सेना का दावा है कि ये लोग सुरक्षाबलों पर हमला करने की योजना बना रहे थे. लेकिन मारे गए युवकों के परिजनों ने इस एनकाउंटर को फ़र्ज़ी बताया है.

परिजनों का कहना है कि उनके बच्चों का चरमपंथ से कोई लेना-देना नहीं था और वे आम नागरिक थे. जम्मू-कश्मीर पुलिस के महानिदेशक दिलबाग़ सिंह ने सेना के दावों को ख़ारिज तो नहीं किया है, लेकिन परिजनों की माँग पर जाँच का भरोसा दिलाया है.

जबकि सेना के जनरल अफ़सर कमांडिंग मेजर जनरल एचएस साही ने बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया था कि श्रीनगर के होकरसर इलाक़े में एक इमारत के अंदर तीन चरमपंथियों को एक एनकाउंटर में मारा गया.

जनरल एचएस साही का ये भी कहना था कि मारे गए चरमपंथियों से आत्मसमर्पण के लिए भी कहा गया था, जिसके लिए वो तैयार नहीं हुए थे और उन्होंने सुरक्षाबलों पर फ़ायरिंग करना शुरू कर दिया, जिसके बाद एनकाउंटर शुरू हुआ.

लेकिन परिजनों का कहना है कि सेना का दावा झूठा है और उन्हें अपने बच्चों के शव तक नहीं दिए गए और घर से दूर उन्हें दफ़ना दिया गया.

पिछले साल जुलाई में शोपियां में सेना ने एक एनकाउंटर में तीन चरमपंथियों को मारने का दावा किया था. बाद में पता चला कि वे तीनों राजौरी के मज़दूर थे. कुछ दिन पहले ही पुलिस ने सेना के एक कैप्टन के ख़िलाफ़ इस मामले में अदालत में चार्जशीट भी दाख़िल की है.

ग़मगीन माहौल

शोपियां ज़िले के तुरकावंगम गाँव में ज़ुबैर अहमद के घर में दाख़िल होते ही वहाँ बड़ी संख्या में मौजूद महिलाएँ जमा दिखती हैं और वहीं कोने में ज़ुबैर की माँ फूट-फूटकर रो रही हैं.

रोती हुई ज़ुबैर की माँ सारा बेगम कहती हैं, "उस दिन सुबह मैंने उसके लिए खाना परोसा था. उसके बाद मुझे पता नहीं कि कौन उसे ले गया? वो न चरमपंथियों के साथ था और न किसी के साथ उसका कोई संबंध था. अगले दिन ही पता चला कि वो शहीद हो गया है. वो आम नागरिक था. उसकी बहनें बहुत परेशान हैं. वो भाई का चेहरा देखना चाहती हैं. जहाँ उन्हें दफ़नाया गया, वहाँ भी चेहरा नहीं दिखाया गया."

बीते बुधवार को श्रीनगर के होकरसर इलाक़े में सेना ने एनकाउंटर में तीन चरमपंथियों को मारने का दावा किया गया था. सारा बेगम का बेटा ज़ुबैर अहमद लोन भी इस विवादित एनकाउंटर में मारा गया.

एनकाउंटर के बाद मारे गए तीन युवकों के परिजनों ने श्रीनगर में प्रदर्शन कर बताया कि उनके बच्चे चरमपंथी नहीं बल्कि आम लोग थे.

ज़ुबैर के भाई आबिद अहमद लोन कहते हैं कि घर से दोपहर एक बजे निकलने के बाद कुछ ही देर में ज़ुबैर ने मुझे फ़ोन किया और बताया कि वो शाम तक लौटेंगे.

उन्होंने बताया, "जब वो शाम तक नहीं लौटा, तो हमने उसको फ़ोन किया, जो बंद आ रहा था. फिर अगले दिन दोपहर फ़ोन किया, तो फिर फ़ोन बंद था. दिन के 12 बजे किसी ने मुझे फ़ोन किया और बताया कि मेरा भाई शहीद हो गया है और हम श्रीनगर पहुँच जाएँ. श्रीनगर पहुँचने के बाद पुलिस कंट्रोल रूम में भाई की लाश थी. फिर उन्हें सोनमर्ग ले गए दफ़नाने के लिए. हमें लाश नहीं दी गई. बताया गया कि वो चरमपंथी था."

"फिर हमारा परिवार भी सोनमर्ग गया और वहाँ भाई का जनाज़ा पढ़ा. हमारी माँग सिर्फ़ ये है कि लाश को वापस करें. मेरा भाई बेगुनाह था. जिस एनकाउंटर की ये बात कर रहे थे, वो फ़र्ज़ी था. उनके जिस्म पर हथियार रखे गए थे और किसी कमरे में ले जाया गया था."

ज़ुबैर अहमद के गाँव तुरकावंगम में सभी दुकानें गुरुवार को बंद रखी गईं. आबिद का कहना था कि उनका भाई अपने गाँव में शटरिंग का काम करता था.

ये पूछने पर कि सेना ने दावा किया है मारे गए युवकों के पास से हथियार बरामद किया गया और ये तीनों युवक सुरक्षाबलों पर किसी बड़े हमले की फ़िराक़ में थे, इस पर ज़ुबैर के एक रिश्तदार शफ़ी कहते हैं, "सेना कुछ भी कह सकती है. सेना के पास क्या हथियारों की कमी है? वो कहीं से भी हथियार लेकर कंधे पर डाल सकते हैं. हमारे भाई का चरमपंथ से कोई लेना-देना नहीं था. मासूम लड़के क्या मंसूबा बना सकते हैं? वो अभी तक आम इंसान की ज़िंदगी गुज़ार रहा था. वो दो घंटों में क्या मंसूबा बना सकता था?"

वो कहते हैं, "अगर उनके पास कोई ऐसा सबूत है, जिससे हमें यक़ीन आ सके, तो हमें दिखाएँ. अभी तक सेना ने जो भी दावे किए हैं, हम उनका खंडन करते हैं. हम जाँच की माँग करते हैं ताकि सच्चाई सामने आ सके."

एजाज़ मक़बूल गनाई के पिता ने क्या कहा?

सेना के इस कथित और विवादित एनकाउंटर में पुलवामा ज़िले के रहने वाले मोहम्मद मक़बूल के बेटे एजाज़ मक़बूल गनाई भी मारे गए. मोहम्मद मक़बूल कहते हैं, "मेरा बेटा बेगुनाह है. वो तो बीते 35 दिनों से बिस्तर पर पड़ा हुआ था. ये उसके पर्चे हैं. ये उसका एक्सरे है. वो चंद घंटों में चरमपंथी कैसे बना?"

मोहम्मद मक़बूल का बेटा एजाज़ मक़बूल गनाई बीते बुधवार की दोपहर तक अपने घर पर था. मक़बूल कहते हैं, "जिस दिन वो ग़ायब हुआ, वो उस दिन अपनी माँ से पूछकर घर से निकला था. वो उस दिन कॉलेज के लिए सुबह साढ़े दस बजे घर से निकला था. क़रीब चार बजे माँ के साथ फ़ोन पर बात हुई थी. माँ को कहा था कि एक घंटे तक घर पहुँच रहा हूँ. वो देर तक नहीं लौटा और लगातार मोबाइल फ़ोन बंद आ रहा था. सुबह साढ़े आठ बजे राजपुरा पुलिस स्टेशन से मुझे फ़ोन कॉल आया. फिर ये पूछा कि तुम्हारा बेटा कहाँ है और कब घर से निकला है? फिर मुझसे बेटे की एक तस्वीर माँगी."

वो बताते हैं, "मैंने तस्वीर भेज दी. राजपुरा के स्टेशन अफ़सर का कहना था कि श्रीनगर में एनकाउंटर में मारे गए चरमपंथियों की पहचान के लिए ज़रूरत है. इसके बाद मैं सीधे श्रीनगर पुलिस कंट्रोल रूम पहुँचा. वहाँ मैंने अपने बेटे की लाश देखी, जो बिल्कुल नंगी थी. बदन पर कोई कपड़ा नहीं, कुछ नहीं. वहाँ तीन लाशें पड़ी थी. मेरे बेटे की लाश तीसरे नंबर पर थी. बदन के कई हिस्सों पर गोलियाँ लगी थीं."

एजाज़ के दो मंज़िला घर पर लोगों की काफ़ी भीड़ उमड़ी थी और लोग उसके मारे जाने की निंदा कर रहे थे और बता रहे थे कि एजाज़ को 'फ़र्ज़ी एनकाउंटर' में मारा गया.

वो कहते हैं, "मेरे बेटे के ख़िलाफ़ आज तक पुलिस का कोई केस नहीं था. आप राजपुरा पुलिस स्टेशन जाकर पता कर सकते हैं मेरे बेटे का रिकॉर्ड. वो एक आम इंसान की ज़िंदगी गुज़ार रहे थे. आप यहाँ किसी से भी पूछ सकते हैं."

मक़बूल बताते हैं कि उन्होंने श्रीनगर में माँग की थी कि उन्हें बेटे की लाश सौंपी जाए, लेकिन नहीं दी गई. उन्होंने कहा, "हमें बताया गया कि ऊपर बैठे अधिकारयों की इजाज़त नहीं है. फिर लाशों को गाड़ी में डाला गया और सोनमर्ग ले जाया गया. हम भी इस गाड़ी के पीछे-पीछे वहाँ पहुँच गए. अब हमारी यही माँग है कि बच्चे की लाश वापस दी जाए. मैं पुलिस के सभी आला अधिकारियों से विनती करता हूँ कि हमारे साथ इंसाफ़ करें. हमें बच्चों की लाशें वापस दी जाएँ. वो चरमपंथी नहीं थे. उनकी लाशें घर से इतनी दूर क्यों दफ़नाई गईं? ये कैसा क़ानून है कि कोई बाहर निकलेगा तो उसको मार डालेंगे?"

ख़ुद मक़बूल भी पुलिस विभाग में काम करते हैं. मक़बूल कहते हैं कि ज़ुबैर लोन को न उनका बेटा जानता था और न वो. जो पुलवामा का लड़का मारा गया मेरे बेटे के साथ, वो उनका रिश्तेदार था. मक़बूल कहते हैं कि उनका बेटा दो दिन पहले उनसे घर पर बातचीत के दौरान बता रहा था कि वो पढ़ाई के लिए पंजाब जाना चाहता है. एजाज़ पुलवामा डिग्री कॉलेज से बीएससी की पढ़ाई कर रहे थे.

मुश्ताक़ के परिजनों ने क्या कहा?

मुश्ताक़ अहमद वानी का 17 वर्ष का बेटा अतहर मुश्ताक़ भी एजाज़ और ज़ुबैर के साथ होकरसर एनकाउंटर में मारा गया. पुलवामा के बेलव गाँव में अपने दो मंज़िला घर के बाहर बैठे मुश्ताक़ एकदम ख़ामोश और उदास थे.

बेटे को चरमपंथी मानने से इनकार करते हुए मुश्ताक़ कहते हैं, "ये एनकाउंटर फ़ेक है. वो एनकाउंटर नहीं था. जिस दिन ये घटना घटी, उस दिन वो मुझे घर में दिन के बारह बजे मिला. फिर वो 12 बजे अपने चाचा की दुकान पर आया था. दिन के डेढ़ बजे घर पर खाना खाया. खाने के बाद वो घर से निकला. साढ़े तीन बजे अपनी बहन को फ़ोन किया और बताया कि मैं श्रीनगर एक दोस्त के साथ गया हूँ, जल्दी वापस लोटूँगा. बेटी ने दूसरे दिन दोपहर साढ़े चार बजे फ़ोन किया, तो उसका मोबाइल बंद था."

वो कहते हैं, "मैं साढ़े छह बजे घर वापस पहुँचा. मैंने अतहर के बारे में पूछा. मैंने फ़ोन लगाया तो वो बंद था. पूरी रात तक भी फ़ोन बंद बता रहा था. फिर मैंने घरवालों को आश्वासन दिलाया कि वो सुबह तक लौटेगा. सुबह मैं एयरपोर्ट के लिए निकला. वापसी पर रास्ते में भाई का फ़ोन आया और कहा कि तुम जल्दी घर आ जाओ. मैं जब घर पहुँचा, तो यहाँ देखा कि घर के बाहर लोगों की काफ़ी भीड़ थी. मैंने लोगों से पूछा कि क्या बात है, क्या मेरा बेटा चरमपंथी बन गया है? घर में सब रो रहे थे. फिर हम श्रीनगर के पुलिस कंट्रोल रूम पहुँचे. वहाँ बेटे की लाश थी."

मुश्ताक़ कहते हैं कि जब उन्होंने अपने बेटे की लाश देखी, तो चिल्ला कर कहा कि उन्हें बेटे की लाश वापस करो, लेकिन उन्हें लाश नहीं दी. वो बताते हैं, "जिस गाड़ी में बेटे की लाश थी, मैं उस गाड़ी के आगे लेट गया और अपने आप को मारना चाहा. फिर पुलिस ने मुझसे कहा कि सोनमर्ग आ जाओ, जहाँ उनको दफ़नाया गया. वहाँ मैंने बेटे को अपने हाथों से क़ब्र में डाला. बस ये समझिए कि 150 किलोमीटर दूर आधा जिस्म वहाँ रखा और आधा यहाँ रखा."

वो कहते हैं, "मेरे बेटे का ना कोई बुरा दोस्त था, ना कोई अच्छा दोस्त. वो घर का काम करता था. बाग़ का काम करता था. मेरे कहने के बावजूद वो क्रिकेट खेलने भी नहीं जाता था."

मुश्ताक़ का कहना था कि अतहर 11वीं क्लास का छात्र था और आजकल परीक्षा दे रहा था. मुश्ताक़ सेब और ठेकेदारी का काम करते हैं.

अतहर के चाचा मोहम्मद शफ़ी कहते हैं, "वो उस दिन सुबह के साढ़े दस बजे चाय लेकर आया. मैंने अतहर से पूछा भी कि तुम्हारी परीक्षा चल रही है तो तुम क्यों मेरे पास आए? वह हँसकर कहने लगा कि सैर-सपाटा भी ज़रूरी है."

सेना के दावों पर सवाल उठाते हुए वो पूछते हैं, "अगर वो एनकाउंटर में फँसे थे, तो उन्होंने एक बार घर फ़ोन तो किया होता? उन सबके पास फ़ोन थे. वो ये समझते कि अब तो हम फँस ही गए, क्यों न घरवालों को सूचित किया जाए. सेना कह रही है कि उन्होंने तीनों को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा था, लेकिन वो नहीं माने. मैं पूछता हूँ कि घरवालों को क्यों नहीं बुलाया गया?"

शफ़ी कहते हैं कि उनके बच्चे के ख़िलाफ़ पुलिस में कोई केस नहीं था. वो कहते हैं, "मैं विनती करता हूँ कि मेरी सारी जायदाद सरकार ले जाए क्योंकि हम इस देश में अब रहना नहीं चाहते. हम पूरा परिवार यहाँ से निकलना चाहते हैं. हम हिंदुस्तान में ख़तरा महसूस करते हैं. ये हमारे बच्चों को मारेंगे. बोले तो ख़ुद ही मर जाएँगे."

पुलिस के हवाले से मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि अतहर चरमपंथियों के लिए ओवर ग्राउंड वर्कर बन कर काम कर रहा था. हालाँकि शफ़ी पुलिस के इन दावों का भी खंडन करते हैं और कहते हैं कि पुलिस और सेना बताए कि वो किसके लिए काम करता था?

सेना के जनरल अफ़सर कमांडिंग मेजर जनरल एचएस साही ने बुधवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि ये चरमपंथी राजमार्ग पर सुरक्षाबलों पर किसी बड़े हमले की योजना बना रहे थे.

जनरल एचएस साही का ये भी कहना था कि मारे गए चरमपंथियों से आत्मसमर्पण के लिए भी कहा गया था, जिसके लिए वो तैयार नहीं हुए थे और उन्होंने सुरक्षाबलों पर फ़ायरिंग करना शुरू कर दिया, जिसके बाद एनकाउंटर शुरू हुआ.

जम्मू-कश्मीर पुलिस के डायरेक्टर जनरल दिलबाग़ सिंह ने गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि वो सेना के दावों को ख़ारिज नहीं कर सकते हैं. हालाँकि उन्होंने कहा कि वो घरवालों की तरफ़ से किए गए दावों की भी जाँच करेंगे.

बीबीसी ने कश्मीर ज़ोन के इंस्पेक्टर जनरल विजय कुमार से बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने फ़ोन कॉल्स का जवाब नहीं दिया.

मगर जम्मू-कश्मीर पुलिस ने शुक्रवार को जारी किये अपने ताज़ा बयान में जाँच के आधार पर यह दावा किया है कि 'मारे गये तीन युवकों में से दो का चरमपंथी विचारधारा की ओर झुकाव था और वो लश्करे-तैय्यबा के लिए काम कर रहे थे.'

पुलिस के प्रवक्ता ने यह भी बताया है कि श्रीनगर एनकाउंटर आर्मी के इनपुट पर शुरू हुआ था जो बाद में एक जॉइंट ऑपरेशन में बदला, जिसमें आर्मी, सीआरपीएफ़ और पुलिस शामिल हुई.

उन्होंने बताया कि घेराबंदी का काम पूरा होने के बाद अंदर से ग्रेनेड हमला हुआ और पुलिस पर फ़ायर भी किया गया. चरमपंथियों से हमने अपील की थी कि वे सरेंडर कर दें, लेकिन उन्होंने बात नहीं सुनी.

पुलिस के अनुसार, अभी भी सारी संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए इस एनकाउंटर की जाँच चल रही है.

इस बीच पुलवामा और शोपियां में गुरुवार से ही मोबाइल इंटरनेट बंद कर दिया गया है.

कुछ दिन पहले पुलिस ने शोपियां के ओमशिपोरा में छह महीने पहले हुए एनकाउंटर में सेना के एक कैप्टन के ख़िलाफ़ चार्जशीट अदालत में दाख़िल की है.

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