पाकिस्तान: हिंदू संत की समाधि ढहाने पर सुप्रीम कोर्ट ने लिया संज्ञान, मंगलवार को होगी सुनवाई

पाकिस्तान में ख़ैबर पख़्तूनख़्वां प्रांत के करक ज़िले में हिंदू संत की समाधि ढहाने की घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए इसपर सुनवाई का फ़ैसला किया है. सुनवाई मंलवार पाँच जनवरी को की जाएगी.
पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से जारी एक प्रेस रिलीज़ के मुताबिक़ पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के चीफ़ पेट्रन रमेश कुमार ने इस मुद्दे पर चीफ़ जस्टिस गुलज़ार अहमद से बात की.
प्रेस रिलीज़ में कहा गया है, "पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश इस मामले को लेकर चिंतित हैं, और उन्होंने सांसद को बता दिया है कि वो इस मामले में स्वत: सज्ञान ले रहे हैं, इस मामले को पाँच जनवरी 2021 को इस्लामाबाद में सुना जाएगा."
सुप्रीम कोर्ट ने अल्पसंख्यकों के लिए बनी एक व्यक्ति की कमीशन, केपीके के चीफ़ सेक्रेटरी और आईजीपी को वारदात के स्थान का मुआयना कर चार जनवरी तक रिपोर्ट दायर करने को कहा है.
सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन
पाकिस्तान हिंदू काउंसिल ने इस घटना पर ग़ुस्सा ज़ाहिर किया और सुप्रीम कोर्ट के सामने प्रदर्शन के लिए उतरे.
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डॉ रमेश कुमार वाकवानी ने कहा, "इस मंदिर का जीर्णोद्धार 2014 में पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद किया गया था. उस वक़्त भी मौलाना शरीफ़ के नेतृत्व में लोग मुद्दे का हल निकालने को लेकर गंभीर नहीं थे लेकिन उन्हें सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला मानना पड़ा."
उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ स्थानीय चरमपंथियों ने 27 दिसंबर को ही हमले का प्लान बना लिया था.
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रांत की सरकार पहले भी मंदिर को नहीं बनाना चाहती थी और एक बार फिर स्थित को क़ाबू में करने में नाकामयाब रही.
डॉक्टर वाकवानी का कहना है कि पाकिस्तान पहले ही अंतरराष्ट्रीय स्तर धार्मिक आज़ादी और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर दबाव झेल रहा है. इसलिए ये ज़रूरी है कि ऐसी अतिवादी गतिविधियों को किसी भी क़ीमत पर रोका जाए.
कराची में प्रदर्शन

पाकिस्तान हिंदू काउंसिल ने कराची में एक विरोध प्रदर्शन भी किया जिसमें हिंदू समुदाय के लोगों के अलावा कई सामाजिक कार्यकर्ताओं में भी हिस्सा लिया.
लोगों ने नाराज़गी का इज़हार करते हुए इसके लिए ज़िम्मेदोर लोगों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की माँग की.
वाकवानी ने कहा कि पहले भी इस समाधि पर हमले हो चुके हैं और दोबारा यह घटना इसलिए हुई क्योंकि पिछले बार जिन लोगों ने यह हरकत की थी उन्हें सज़ा नहीं मिली थी.

पाकिस्तान के मुस्लिम धर्मगुरुओं का संगठन उलेमा मशाएख़ काउंसिल और समाज के कई लोगों ने हिंदू समुदाय के लोगों से एकजुटता दिखाई है और इस घटना की पुरज़ोर निंदा की है.
पुलिस का कहना है कि 350 लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया है और अब तक 31 लोगों को गिरफ़्तार भी किया जा चुका है. जिन लोगों के शामिल होने पर शक जताया जा रहा है उनमें से कई जमीयत उलेमा इस्लाम (एफ़) के सदस्य बताए जा रहे हैं.

मंत्रियों ने की निंदा
घटना की निंदा पाकिस्तान की मानवाधिकार मंत्री ने भी की है.
मंत्री डॉक्टर शिरीन मज़ारी ने ट्वीट करके ख़ैबर पख़्तूनख़्वां सरकार से साज़िशकर्ताओं को सज़ा देने की माँग की है.
उन्होंने कहा है कि उनका मानवाधिकार मंत्रालय इस मामले को देख रहा है. उन्होंने ट्वीट मे लिखा, "सरकार होने के नाते हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम सभी नागरिकों और उनके पूजा के स्थान की रक्षा करें."
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इसके अलावा एक और केंद्रीय मंत्री चौधरी फ़व्वाद चौधरी ने भी इस हमले की निंदा की है.
उन्होंने ट्विटर पर लिखा, "करक में हिंदू समाधि को जलाना अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ सोच वालों का काम है. समस्या ये है कि सेना आंतकियों से लड़ सकती है, लेकिन चरमपंथ से लड़ना सिविल सोसायटी का काम है. हमारे स्कूल से लेकर सामाजिक सम्मेलनों तक, कहीं कुछ नहीं किया जा रहा, हम इस दलदल में धंसते जा रहे हैं."
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क्या है मामला?
मंगलवार को पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह प्रांत के करक ज़िले में हिंदू संत श्री परम हंस जी महाराज की ऐतिहासिक समाधि को स्थानीय लोगों की एक नाराज़ भीड़ ने ढहा दिया था.
पुलिस ने बताया कि करक ज़िले के एक छोटे से गांव टेरी में भीड़ इस बात को लेकर नाराज़ थी कि एक हिंदू नेता घर बनवा रहे थे और वो घर इस समाधि से लगा हुआ था.
करक के ज़िला पुलिस अधिकारी इरफ़ानुल्लाह मारवात ने बीबीसी के स्थानीय प्रतिनिधि सिराजुद्दीन को बताया कि उस इलाक़े में कोई हिंदू आबादी नहीं रहती है. स्थानीय लोग इस बात से नाराज़ थे कि जिस जगह पर ये निर्माण कार्य हो रहा था, वो उसे इस समाधि स्थल का ही हिस्सा समझते थे.
उन्होंने बताया कि पुलिस को लोगों के विरोध की जानकारी दी गई थी और वहां पर सुरक्षा इंतज़ाम भी किए गए थे.
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इरफ़ानुल्लाह मारवात ने बताया, "हमें विरोध प्रदर्शन की जानकारी थी लेकिन हमें बताया गया था कि ये शांतिपूर्ण रहेगा. हालांकि एक मौलवी ने हालात को भड़काऊ भाषण देकर वहां हालात बिगाड़ दिए. भीड़ इतनी बड़ी थी कि वहां हालात बेक़ाबू हो गए. हालांकि इस घटना में वहां किसी को कोई नुक़सान नहीं हुआ है."
ज़िला पुलिस अधिकारी ने कहा कि वहां हालात नियंत्रण में हैं लेकिन क्षेत्र में स्थिति तनावपूर्ण है.
हिंदू संत श्री परम हंस जी महाराज की समाधि पर विवाद कोई नई बात नहीं है. इलाक़े के रूढ़िवादी लोग इस समाधि स्थल का शुरू से ही विरोध करते रहे थे. साल 1997 में इस समाधि पर पहली बार स्थानीय लोगों ने हमला किया था.
हालांकि बाद में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह की प्रांतीय सरकार ने इसका पुनर्निमाण कराया.
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