मान सिंह, जिन्होंने कांग्रेस के मंच और सीएम के हेलिकॉप्टर से भिड़ा दी थी जीप

राजा मान सिंह

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    • Author, नारायण बारेठ
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए

उत्तर प्रदेश में मथुरा की ज़िला अदालत ने बहुचर्चित भरतपुर के मानसिंह हत्याकाण्ड में दोषी पाए गए सभी 11 पुलिस कर्मचारियों को उम्रकैद व 12-12 हज़ार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई है.

स्थानीय पत्रकार विजय आर्य विद्यार्थी ने बताया कि ज़िला जज साधना रानी ठाकुर ने 35 साल से जारी इस मुक़दमे में बुधवार को सज़ाओं का एलान किया.

अदालत के सुनाए गए फ़ैसले के बाद मानसिंह की पुत्री व राजस्थान की पूर्व कैबिनेट मंत्री कृष्णेंद्र दीपा कौर ने अदालत के निर्णय एवं दोषियों को सुनाई गई सज़ा पर संतोष व्यक्त किया और कहा कि आख़िर 35 साल बाद ही सही, न्याय तो मिला.

दीपा ने बीबीसी से कहा, "हमें इंसाफ़ के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी है. इस घटना के बाद पूर्वी राजस्थान और उससे लगते उत्तर प्रदेश के कई भागों में तनाव पैदा हो गया. भरतपुर में लोग सड़कों पर आ गए. वहाँ क़र्फ्यू लगाना पड़ा. आगजनी और हिंसा हुई. पुलिस को गोली चलानी पड़ी. इसमें लोग मारे गए. भरतपुर में फैले तनाव को देखते हुए तत्कालीन मुख्य मंत्री माथुर को अपना पद गँवाना पड़ा. उस वक़्त प्रधान मंत्री राजीव गाँधी के निर्देश पर माथुर ने इस्तीफ़ा दे दिया."

क्या थी वो घटना?

यह घटना 21 फरवरी ,1985 की है. राजस्थान के भरतपुर ज़िले के डीग में चुनाव के दौरान उपजे एक विवाद के बाद पुलिस ने पूर्व रियासत के सदस्य मान सिंह को गोली चला कर मार डाला.

मान सिंह पर आरोप था कि उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान अपनी जीप से पहले कांग्रेस की सभा का मंच धराशाई कर दिया और फिर तत्कालीन मुख्य मंत्री शिव चरण माथुर के हेलिकॉप्टर को जीप से टक्कर मार कर क्षतिग्रस्त कर दिया.

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भरतपुर की पूर्व रियासत का डीग अपने ख़ूबसूरत महलों, फव्वारों, क़िलेबंदी और वास्तुशिल्प के कारण जाना जाता है. लेकिन इस घटना ने उसे किसी और सबब से सुर्ख़ियों में ला दिया.

यह विवाद तब पैदा हुआ, जब विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान कथित रूप से डीग में कांग्रेस समर्थकों ने लक्खा तोप के पास अपना परचम लहरा दिया.

मान सिंह डीग से निर्दलीय होकर चुनाव मैदान में थे. उनके समर्थकों को यह गवारा नहीं हुआ. इसके अलावा भी दोनों पक्ष के कार्यकर्ताओ में कटुता की कुछ और घटनाएँ भी हुई. इससे मान सिंह कुपित हो गए. चुनाव प्रचार के दौरान 20 फरवरी को मुख्य मंत्री माथुर का दौरा था.

मान सिंह के दामाद कुंवर विजय सिंह कहते हैं, "हमारे झंडे की तौहीन की गई. यह बड़ा अपमानकारी लगा. लिहाज़ा मान सिंह जी ने कांग्रेस की सभा न होने देने की ठान ली. वे अपने कार्यकर्ताओ के साथ जीप में सवार होकर पहुँचे और मंच तोड़ दिया. फिर हेलिकॉप्टर भी जीप का निशाना बना. लेकिन इसमें कोई चोटिल नहीं हुआ. मुख्य मंत्री माथुर सड़क मार्ग से वापस जयपुर लौट गए. पुलिस ने इस बारे में मान सिंह के विरुद्ध मुक़दमे दर्ज किए."

इसके अगले दिन 21 फरवरी 1985 को पुलिस ने डीग की अनाज मंडी में जीप पर सवार होकर जाते मान सिंह पर गोली चलाई. इसमें सिंह और उनके दो सहयोगी मारे गए. इस जीप में विजय सिंह साथ थे. लेकिन वे बच गए.

विजय सिंह ने बीबीसी से कहा, "हम निहत्थे थे. हमारे पास कोई हथियार नहीं थे. पुलिस ने गिरफ़्तार करने का कोई प्रयास नहीं किया. पुलिस दल की अगुवाई उप अधीक्षक कान सिंह भाटी कर रहे थे. यह एक नियोजित हत्या थी."

मीडिया से बात करती हुईं राजा मान सिंह की बड़ी बेटी दीपा कुमारी

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मान सिंह की बेटी दीपा उन लम्हों को याद कर बताती हैं, "पुलिस ने जब मुक़दमा दर्ज किया, तो मेरे पिता ने मुझसे अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी तैयार करने को कहा. हम इस काम को कर ही रहे थे कि उन्हें गोली मार दी गई. मुझे सूचना मिली कि उन पर गोली चलाई गई है. फिर पता लगा कि वे नहीं रहे. मैं सुन कर बहुत दुखी हुई."

भरतपुर में राकेश वशिष्ठ उस वक्त पत्रकारिता में थे. वे कहते हैं, "हम मान सिंह के मोती झील आवास पर पहुँचे और मौक़े पर भी गए. हमें लग गया था यह हत्या है. पुलिस ने इसे आत्म रक्षा में गोली चलाना बताया. देखते-देखते हुजूम सड़कों पर उतर आया. हिंसा होने लगी. सरकार के लिए हालात क़ाबू में करना मुश्किल हो गया. यह तनाव भरतपुर ज़िले तक सीमित नहीं रहा. राजस्थान से लगते उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में भी लोग सड़कों पर निकले, क्योंकि मान सिंह काफ़ी लोकप्रिय थे और वे सात बार विधानसभा के सदस्य रहे थे."

पुलिस के लिए स्थिति संभालना बड़ा मुश्किल रहा. मान सिंह के दामाद कुंवर विजय सिंह कहते हैं, "भरतपुर में कोई हफ़्ते भर तक कर्फ़्यू रहा. ज़िले की सीमा को सील रखा गया. अलीगढ़ तक इसकी आँच पहुँची. मानसिंह की शव यात्रा में शोकाकुल लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा. इसमें फिर भीड़ और पुलिस में भिड़ंत हो गई. इसमें तीन लोगों की जान चली गई."

यह विधान सभा चुनावों का मौक़ा था. तत्कालीन प्रधान मंत्री राजीव गाँधी ने स्थिति को देखते हुए मुख्य मंत्री माथुर को पद से त्याग पत्र देने को कहा.

माथुर ने 22 फरवरी 1985 की आधी रात को इस्तीफ़ा दे दिया. इससे लोगों का ग़ुस्सा कुछ शांत हुआ.

माथुर की जगह वरिष्ठ कांग्रेस नेता हीरालाल देवपुरा को मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया. लेकिन इससे कांग्रेस को चुनावों में बड़ा नुक़सान हुआ. डीग में चुनाव रोक दिए गए. सरकार ने मामले की जाँच सीबीआई को सौंप दी.

इसके अलावा न्यायिक जाँच के लिए आयोग भी बनाया गया. लेकिन वो कोई काम नहीं कर सका और बीच में ही भंग हो गया.

भरतपुर के नवीन शर्मा कहते हैं, "घटना की ख़बर मिलते ही वे भी डीग पहुँचे थे. सड़कें और मार्ग भीड़ से पटने लगे थे. लोगों में घटना को लेकर काफ़ी रोष था."

कुंवर विजय सिंह कहते हैं, "भरतपुर में पूर्व रियासत का परचम बहुत जज्बात से जुड़ा मुद्दा होता है. बात झंडे को लेकर ही शुरू हुई और फिर काफ़ी तनाव पैदा हो गया था."

राजा मान सिंह

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पुलिस कहती रही कि उसने आत्म रक्षा में गोली चलाई है. लेकिन विजय सिंह कहते हैं कि मान सिंह के पास कोई हथियार नहीं था. वे प्रचार के लिए निकले थे. ऐसे में पुलिस ने निहत्थों पर गोली चलाई और उन्हें मौत की नींद सुला दिया.

लेकिन अब वे कहते हैं उन्हें न्याय पर संतोष है. पर कार्यवाही बहुत लंबी चली. पुलिस ने अपने पक्ष में 17 गवाह पेश किए जबकि मान सिंह की तरफ़ से कोई 61 गवाह कार्यवाही से गुज़रे.

इस लंबी अवधि में 1700 से अधिक सुनवाई की तारीखें गुज़री और कोई एक हज़ार दस्तावेज भी अदलात की नज़रों से गुज़रे. 35 साल चले मुक़दमे में 26 जज बदल गए, 27वें ने फ़ैसला. ख़ास बात यह है कि सभी अभियुक्त 60 साल से ऊपर के हैं और डीएसपी कान सिंह भाटी अस्सी साल से ऊपर के हैं.

घटना भरतपुर की ज़िले की थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मामले की सुनवाई उत्तर प्रदेश में मथुरा की अदालत में हुई.

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