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भारत की अपने पड़ोसी देशों से किन-किन मुद्दों पर ठन रही है?
- Author, सचिन गोगोई
- पदनाम, बीबीसी मॉनिरिंग
भारत और चीन के बीच एलएसी पर बढ़े हुए तनाव के माहौल में अमरीका ने दक्षिण चीन सागर में अपने दो ताक़तवर युद्धपोत यूएसएस रोनाल्ड रीगन और यूएसएस निमित्ज़ को तैनात किया है.
चीन के साथ तनाव पर भारत को अमरीका और कई अन्य दोस्ताना देशों का सहयोग मिला है लेकिन पड़ोसी देशों से कोई ख़ास अच्छी प्रतिक्रिया भारत को नहीं मिली है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2014 में सत्ता संभालते ही पड़ोसी देशों को प्राथमिकता देने की नीति लागू की थी.
लेकिन भारत को पड़ोसी देशों चीन, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका से जिस तरह अलग-अलग स्तर पर परेशानी का सामना करना पड़ा है, उससे लगता है कि इस नीति की पोल बहुत जल्द ही खुल गई है.
भारत और चीन के बीच सैन्य संघर्ष से उपजे तनाव के माहौल में अमरीका ने जहां चीन के ठीक पीछे सैन्य गतिविधियां की हैं वहीं राष्ट्रपति ट्रंप और उनके अधिकारियों ने भारत को मौखिक समर्थन भी दिया है.
फ्रांस के साथ रक्षा सौदा
जून के अंत में अमरीकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा था कि अमरीका अपनी सेनाओं को यूरोप से निकालकर चीन के क़रीब तैनात करने पर विचार कर रहा है.
अपने बयान में पोम्पियो ने कहा था कि चीन से एशियाई देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, को ख़तरा पैदा हुआ है.
इसी बीच भारतीय मीडिया में ख़बर आईं कि फ्रांस भारत को 36 रफ़ाल विमान जल्द ही सौंपने जा रहा है.
भारत ने ये एक बड़े रक्षा सौदे में फ्रांस की दासो एविएशन से ये विमान ख़रीदे हैं.
एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की मांग के बाद फ्रांस इन विमानों को समय से पहले सौंपने पर काम कर रहा है. भारतीय मीडिया की कई रिपोर्ट के मुताबिक पहले छह लड़ाकू विमान जुलाई अंत तक भारत पहुंच सकते हैं.
इसी बीच रूस की मीडिया में ख़बर आई कि रूस भारत को 21 मिग-29 और 12 सुखोई एमकेवन लड़ाकू विमानों और ए-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली बेचने की प्रक्रिया में तेज़ी ला रहा है.
रूस की इंटरफेक्स समाचार एजेंसी ने एक रूसी अधिकारी के हवाले से कहा है कि ये सौदा निकट भविष्य में हो सकता है.
वहीं जापान की मेरीटाइम सेल्फ़ डिफेंस फ़ोर्स ने 27 जून को हिंद महासागर में भारतीय नौसेना के साथ साझा युद्धाभ्यास किया.
ये सब घटनाक्रम ऐसे समय में हुए हैं जब भारत और चीन के बीच तनाव बेहद बढ़ा हुआ है.
ऑस्ट्रेलिया के साथ सैन्य अड्डों का अहम समझौता
भारत और चीन के सैनिक जब लद्दाख में एलएएसी पर उलझे हुए थे,ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ वीडियो वार्ता की. इस दौरान दोनों देशों ने सात समझौते किए जिनमें ज़रूरत पड़ने पर लॉजिस्टिकल सहयोग के लिए एक दूसरे के सैन्य अड्डों के इस्तेमाल का समझौता भी शामिल हैं.
गुरुवार को एक बयान में चीन ने कहा है कि एलएसी पर पश्चिमी सेक्टर में हालात बेहतर हो रहे हैं और दोनों देशों के बीच बातचीत की प्रक्रिया जारी है.
हाल के दिनों में सीमा पर तनाव कुछ कम हुआ है. चीन और भारत की सेनाओं के कुछ पीछे हटने की पुष्ट रिपोर्ट आई हैं.
हालांकि 15-16 जून की रात गलवान घाटी में दोनों सेनाओं के बीच हुई हिंसक झड़प में बीस भारतीय सैनिकों की मौत के बाद से ही दोनों देशों के बीच विश्वास कम हुआ है.
द टेलीग्राफ़ में प्रकाशित एक लेख में चीन मामलों के विशेषज्ञ मनोज केवलरमानी ने टिप्पणी की है, "पिछले एक साल में चीन ने अपने आप को हर ओर से घिरा हुआ महसूस किया है और इसी वजह से वो हर ओर आक्रामक हुआ है. बीते एक साल में चीन ने जो कुछ भी किया है, रणनीतिक तौर पर उसका कोई मतलब नहीं निकलता है."
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स में लिखा है, 'भारत के ख़िलाफ़ चीन की आक्रामकता का एशिया के सुरक्षा परिदृश्य पर असर पड़ेगा. अगर मौजूदा गतिरोध भी 2017 के डोकलाम की तरह ही समाप्त होता है, जिसमें चीन स्पष्ट रूप से विजेता था, तो शी जिनपिंग शासन को मज़बूती मिलेगी और ये पड़ोसी देशों के लिए और बड़ा ख़तरा बन जाएगा.'
लद्दाख में जो हिंसक संघर्ष हुआ है उसके कारण भले ही और हिंसक घटनाएं न हों लेकिन दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों में रुकावटें तो आ ही गई हैं. चीन और भारत के बीच सालाना 82 अरब डॉलर का कारोबार होता है.
भारत सरकार ने हाल के दिनों में चीन के व्यापारिक हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए कई क़दम उठाए हैं. इनमें 59 चीनी एप्स पर लगाया गया प्रतिबंध भी शामिल है.
भारत की सड़क निर्माण परियोजनाओं में चीनी निवेश वाली कंपनियों पर भी रोक लगा दी गई है. भारत सरकार ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स से कहा है कि वो ग्राहकों को ये भी बताएं कि उत्पाद कहां निर्मित हुए हैं.
नेपाल और चीन के बीच नज़दीकी
हालांकि लद्दाख संकट से निबट रहे भारत ने लगता है नेपाल में चीन के लिए जगह छोड़ दी है. हिंसक संघर्ष में बीस भारतीय सैनिकों की मौत के कुछ दिन बाद ही नेपाल की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ नेपाल (सीपीएन) ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) के साथ वर्चुअल सेमिनार कर पार्टी और सरकार चलाने के लेकर नीतियों पर चर्चा की.
जून में नेपाल की सरकार ने नए नक्शे को मंज़ूरी देने के लिए देश की अन्य पार्टियों का समर्थन जुटाया. नक्शे में शामिल कई इलाक़े भारत के नियंत्रण में हैं.
हाल ही में नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने कहा कि भारत उन्हें सत्ता से हटाने की साज़िश रच रहा है. ओली अपनी ही पार्टी के नेताओं के विरोध का सामना कर रहे हैं.
इसी बीच भारत और नेपाल की मीडिया में चीन की नेपाल में राजदूत हाओ यांकी की सक्रियता की ख़बरें आईं. रिपोर्टों में कहा गया की चीनी राजदूत नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के विपक्षी धड़ों के बीच बातचीत करा रही हैं.
वहीं दूसरी ओर भारत की मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि लद्दाख में चीन के साथ जारी तनाव के दिनों में पाकिस्तान ने भी सीमा पर गोलीबारी की घटनाएं की.
द प्रिंट वेबसाइट में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल अप्रैल, मई और जून में पाकिस्तान की ओर से 387, 382 और 302 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन हुआ जबकि बीते साल इसी दौरान 234, 221 और 181 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन हुआ था.
पाकिस्तान के साथ ज़ुबानी जंग भी जारी रही और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने कई बार भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की.
इमरान ख़ान ने आरोप लगाया कि पाकिस्तान में 29 जून को स्टॉक एक्सचेंज पर हुए हमले के पीछे भारत था. ऐसे माहौल में अगर भारत की पाकिस्तान के साथ कोई बात शुरू भी होती है तो शांति क़ायम होनी की संभावना बहुत ही कम है.
श्रीलंका ने भी भारत का निवेश रोका
वहीं दक्षिणी पड़ोसी देश श्रीलंका ने भी भारतीय विदेश नीति के लिए चिंताएं पैदा की हैं. हाल ही में जापान और भारत के निवेश वाले निर्माण प्रोजेक्ट को श्रीलंका ने होल्ड कर दिया.
राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे ने कोलंबो के ईस्ट कंटेनर टर्मिनल की वित्तीय संभावनाओं की जांच के लिए एक समिति गठित कर दी है. भारत और जापान के निवेश वाले इस प्रोजेक्ट को पिछली सरकार ने मंज़ूरी दी थी.
इंडिया टुडे में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रोजेक्ट की समीक्षा करने का निर्णय राजनीतिक फ़ायदा उठाने की कोशिश हो सकती है. श्रीलंका में इसी साल अगस्त में संसदीय चुनाव होने हैं.
हालांकि कई लोगों का ये भी मानना है कि श्रीलंका का ये फ़ैसला चीन से प्रभावित है जो इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रहा है.
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