गर्ग ने अपने ब्लॉग में लिखा, "हम किसी बाहरी व्यक्ति से नहीं मिले और कोई भी हमारे घर नहीं आया. लेकिन इसके बावजूद हमारे घर में एक के बाद दूसरा व्यक्ति कोरोना वायरस से संक्रमित हो गया."
गर्ग द्वारा लिखा गया ये ब्लॉग बताता है कि कोरोना के ख़िलाफ़ जंग में संयुक्त परिवार एक ख़ास तरह की चुनौती पेश कर रहे हैं.
भारत में कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए जो लॉकडाउन लगाया गया वह 25 मार्च से शुरू होकर पिछले हफ़्ते तक चलता रहा. इसका उद्देश्य लोगों को घरों के अंदर रखकर भीड़ भरी सड़कों और सार्वजनिक जगहों से दूर रखना था.
वीडियो कैप्शन, कोरोना वायरस ने कैसे एक परिवार को पूरी तरह तबाह कर दिया?
लेकिन भारत में चालीस फ़ीसद घरों में कई पीढ़ियां एक साथ रहती हैं (ऐसे में तीन से चार लोग एक साथ एक ही छत के नीचे रहते हैं.). ऐसे में घर भी एक भीड़-भाड़ वाली जगह है.
ये जोख़िम पूर्ण है क्योंकि अध्ययन बताते हैं कि वायरस के घर के अंदर फैलने की आशंका ज़्यादा रहती है.
संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ डॉ. जैकब जॉन कहते हैं, "लॉकडाउन के दौरान किसी भी एक व्यक्ति के संक्रमित होने पर उसका परिवार एक क्लस्टर की तरह बन जाता है. क्योंकि एक व्यक्ति के संक्रमित होने के बाद लगभग सभी लोगों के संक्रमित होने की आशंका बन जाती है."
गर्ग के परिवार के रूप में जो सामने आया वो ये है कि संयुक्त (बड़े) परिवारों में सामाजिक दूरी संभव नहीं है, विशेषत: तब जबकि लॉकडाउन की वजह से घर के सारे सदस्य घर पर ही मौजूद हों.
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'हमने काफ़ी अकेलापन झेला'
मुकुल गर्ग का परिवार दिल्ली के उत्तरी-पश्चिमी हिस्से में बने एक तीन मंज़िल के घर में रहता है.
33 वर्षीय गर्ग अपनी 30 वर्षीय पत्नी और दो साल के दो बच्चों के साथ टॉप फ़्लोर पर रहते हैं. गर्ग के साथ उनके दादा-दादी और माता-पिता भी रहते हैं.
पहली दो मंज़िलों पर गर्ग के चाचा और उनके परिवार रहते हैं.
परिवार के सदस्यों में 90 साल के बुज़ुर्ग से लेकर चार महीने का बच्चा शामिल है.
सामान्य संयुक्त परिवारों में कई लोग एक ही कमरे और बाथरूम का इस्तेमाल करते हैं.
लेकिन गर्ग परिवार का घर काफ़ी बड़ी जगह में बना हुआ है. 250 वर्ग मीटर में बने इस घर में हर मंज़िल पर तीन बेडरूम हैं जिनमें बाथरूम अटैच हैं. इसके साथ ही किचन भी है.
लेकिन इतनी जगह होने के बावजूद वायरस एक मंज़िल से होता हुआ दूसरी मंज़िल में लोगों को संक्रमित करता गया.
इस परिवार में सबसे पहले संक्रमित होने वाले शख़्स मुकुल गर्ग के चाचा थे लेकिन परिवार को अब तक नहीं पता है कि वह किससे संक्रमित हुए.
गर्ग कहते हैं, "हमें लगता है कि वह सब्ज़ी वाले या राशन वाले से संक्रमित हुए होंगे क्योंकि वह ही पहला मौक़ा था जब घर से कोई बाहर गया था."
इस परिवार में वायरस धीरे-धीरे फैल रहा था लेकिन डर और शर्म की वजह से किसी ने टेस्टिंग कराना उचित नहीं समझा.
गर्ग कहते हैं, "हम 17 लोग एक साथ थे लेकिन हम काफ़ी अकेलापन महसूस कर रहे थे. हम चिंतित थे कि अगर हमें कुछ हो गया तो क्या कोई कोरोना वायरस के साथ जुड़े स्टिग्मा यानी शर्म की वजह से हमारे यहां अंतिम संस्कार में शामिल होगा?"
मई महीने के पहले हफ़्ते में उनकी 54 वर्षीय चाची को सांस लेने में दिक़्क़त हुई तो परिवार उन्हें लेकर अस्पताल पहुंचा.
गर्ग कहते हैं कि इसके बाद पूरे परिवार को टेस्टिंग करानी होगी.
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'बीमारी का महीना'
मई का पूरा महीना वायरस से लड़ने में बीत गया. गर्ग कहते हैं कि वह घंटों डॉक्टरों से बात करते थे.
और परिवार के लोग वॉट्सऐप पर एक दूसरे का हाल लिया करते थे.
गर्ग कहते हैं, "हम लक्षणों के आधार पर पारिवारिक सदस्यों की जगह भी बदलते रहे ताकि ज़्यादा बुख़ार वाले दो लोग एक साथ एक जगह पर मौजूद न हों."
संक्रमित होने वाले 11 लोगों में से छह लोगों की को-मॉर्बिडिटी वाली स्थिति थी. इन लोगों को डायबिटीज़, दिल की बीमारी, और हायपरटेंशन था जिसकी वजह से इनकी स्थिति ज़्यादा जोख़िम भरी थी.
गर्ग कहते हैं, "रातोंरात, हमारा परिवार कोविड-19 हेल्थकेयर सेंटर बन गया जहां पर हम एक-एक करके नर्स की भूमिका निभा रहे थे."
संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ कहते हैं कि बड़े परिवार किसी अन्य भीड़ भरी जगह जैसे ही होते हैं. बस लोगों की उम्र में भारी अंतर होता है.
ऐसे ही एक विशेषज्ञ डॉ. पार्थो सारोथी रे कहते हैं, "जब कई उम्र वर्गों के लोग एक ही जगह पर रहते हैं तो सभी लोगों को अलग-अलग स्तर पर जोख़िम होता है. इनमें वृद्ध लोगों को सबसे ज़्यादा जोख़िम होता है."
गर्ग के लिए ये बात एक बड़ी चिंता का विषय थी क्योंकि वह 90 साल की उम्र वाले अपने बाबा को लेकर काफ़ी चिंतित थे.
लेकिन दुनिया भर में वैज्ञानिकों को अचरज में डालने वाले इस वायरस ने गर्ग परिवार को भी हैरान कर दिया.
ये कोई अचरज की बात नहीं थी कि गर्ग और उनकी पत्नी, जिनकी उम्र चालीस वर्ष से कम है, में किसी तरह के लक्षण नहीं दिखे. लेकिन ये बात अचरज भरी थी कि उनके 90 वर्षीय बाबा में भी किसी तरह के लक्षण नहीं दिखे.
और घर के एक सदस्य जिसे किसी तरह की बीमारी नहीं थी उन्हें अस्पताल ले जाना पड़ा. परिवार के अन्य सदस्यों में भी आम लक्षण देखने को मिले.
वीडियो कैप्शन, क्या ग़रीबी कोरोना वायरस को और घातक बना देती है?
गर्ग बताते हैं कि उन्होंने ब्लॉग इसलिए लिखा ताकि वह उन लोगों तक पहुंच सकें जो कि मदद चाहते थे.
वह लिखते हैं, "शुरुआत में हमने इस बारे में काफ़ी सोचा कि लोग क्या सोचेंगे. लेकिन हमें कमेंट्स में लोगों की प्रतिक्रियाएं काफ़ी सकारात्मक दिखीं. कमेंट्स में था कि अगर कोरोना वायरस हो गया तो कोई बड़ी बात नहीं है. ये कोई ऐसी बात नहीं है जिसके लिए आपको शर्मिंदा होना पड़े."
मई महीने के दूसरे हफ़्ते में लक्षण दिखना बंद हो गये. और एक के बाद एक परिवार के सदस्यों की कोरोना संक्रमण की रिपोर्ट निगेटिव आने लगी जिससे परिवार को एक बड़ी राहत मिली. इसी दौरान गर्ग की चाची की कोरोना संक्रमण रिपोर्ट निगेटिव आने पर उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई.
इस समय परिवार को लगा कि ख़राब समय गुज़र गया.
लेकिन मई महीने, जिसे गर्ग 'बीमारी का महीना' कहते हैं, के आख़िर तक परिवार के सिर्फ़ तीन सदस्य कोरोना वायरस संक्रमित रह गए. इनमें स्वयं गर्ग भी शामिल थे.
एक जून को तीसरी बार की टेस्टिंग में वह कोरोना संक्रमण से आज़ाद पाए गए.
'सबसे अच्छा और ख़राब दौर'
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भारत के संयुक्त परिवारों में समर्थन और देखभाल हासिल की जा सकती है. लेकिन गतिरोध और संपत्ति विवाद भी देखने को मिल सकते हैं. लेकिन ऐसे समय में परिवार के लोग ही आपकी मदद से लिए पहल कर सकते हैं.
डॉ. जॉन कहते हैं, "क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि एक वृद्ध व्यक्ति क्वारंटीन में अकेला रहे जहां पर उनकी मदद के लिए कोई उपलब्ध न हो? तमाम चुनौतियों के बावजूद संयुक्त परिवारों में एक फ़ायदा ये होता है कि युवा वर्ग वृद्धों की मदद करने के लिए उपलब्ध होते हैं."
भारत में कोरोना वायरस से जुड़े मामले 250,000 के पार चले गए हैं. ऐसे में एक नई बहस शुरू हुई है कि क्या ये महामारी संयुक्त परिवारों के लिए जोख़िमभरी साबित हो सकती है क्योंकि युवा लोग इस बारे में चिंतित हैं कि कहीं वे अपने वृद्ध रिश्तेदारों तक इस वायरस को न पहुंचा दें.
कानपुर की सीएसजेएम यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र की प्रोफ़ेसर किरण लांबा झा बताती हैं, "संयुक्त परिवार एक ऐसा तंत्र है जो कि पश्चिमी मूल्यों और औपनिवेशीकरण के प्रभाव के बावजूद ज़िंदा रहा है और कोरोना वायरस इसे ख़त्म करने नहीं जा रहा है."
गर्ग परिवार इससे सहमत होगा.
गर्ग कहते हैं कि वायरस से संक्रमित होने से पहले उनका परिवार समृद्ध था जो कि नब्बे के दौर की किसी फ़िल्म की याद दिलाता है.
वह कहते हैं, "एक परिवार के रूप में, हमने कभी भी एक साथ इतना समय नहीं जिया जितना हमने लॉकडाउन के पहले महीने में जिया. और ये हमारे परिवार के सबसे सुखी क्षणों में से एक था."
हालांकि, एक के बाद दूसरे व्यक्ति के कोरोना वायरस से संक्रमित होते देखना परेशान करने वाला था.
"हमने एक दूसरे को उनके सर्वश्रेष्ठ और सबसे ख़राब पलों से गुज़रते देखा लेकिन हम इससे मज़बूत होकर बाहर निकले हैं. हम अभी भी दोबारा संक्रमण को लेकर सजग हैं लेकिन हम इस बात को लेकर ख़ुश हैं कि हम इस वायरस को हराने में कामयाब हुए."
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कोरोना वायरस एक संक्रामक बीमारी है जिसका पता दिसंबर 2019 में चीन में चला. इसका संक्षिप्त नाम कोविड-19 है
सैकड़ों तरह के कोरोना वायरस होते हैं. इनमें से ज्यादातर सुअरों, ऊंटों, चमगादड़ों और बिल्लियों समेत अन्य जानवरों में पाए जाते हैं. लेकिन कोविड-19 जैसे कम ही वायरस हैं जो मनुष्यों को प्रभावित करते हैं
कुछ कोरोना वायरस मामूली से हल्की बीमारियां पैदा करते हैं. इनमें सामान्य जुकाम शामिल है. कोविड-19 उन वायरसों में शामिल है जिनकी वजह से निमोनिया जैसी ज्यादा गंभीर बीमारियां पैदा होती हैं.
ज्यादातर संक्रमित लोगों में बुखार, हाथों-पैरों में दर्द और कफ़ जैसे हल्के लक्षण दिखाई देते हैं. ये लोग बिना किसी खास इलाज के ठीक हो जाते हैं.
लेकिन, कुछ उम्रदराज़ लोगों और पहले से ह्दय रोग, डायबिटीज़ या कैंसर जैसी बीमारियों से लड़ रहे लोगों में इससे गंभीर रूप से बीमार होने का ख़तरा रहता है.
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जब लोग एक संक्रमण से उबर जाते हैं तो उनके शरीर में इस बात की समझ पैदा हो जाती है कि अगर उन्हें यह दोबारा हुआ तो इससे कैसे लड़ाई लड़नी है.
यह इम्युनिटी हमेशा नहीं रहती है या पूरी तरह से प्रभावी नहीं होती है. बाद में इसमें कमी आ सकती है.
ऐसा माना जा रहा है कि अगर आप एक बार कोरोना वायरस से रिकवर हो चुके हैं तो आपकी इम्युनिटी बढ़ जाएगी. हालांकि, यह नहीं पता कि यह इम्युनिटी कब तक चलेगी.
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वैज्ञानिकों का कहना है कि औसतन पांच दिनों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं. लेकिन, कुछ लोगों में इससे पहले भी लक्षण दिख सकते हैं.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) का कहना है कि इसका इनक्यूबेशन पीरियड 14 दिन तक का हो सकता है. लेकिन कुछ शोधार्थियों का कहना है कि यह 24 दिन तक जा सकता है.
इनक्यूबेशन पीरियड को जानना और समझना बेहद जरूरी है. इससे डॉक्टरों और स्वास्थ्य अधिकारियों को वायरस को फैलने से रोकने के लिए कारगर तरीके लाने में मदद मिलती है.
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दोनों वायरस बेहद संक्रामक हैं.
ऐसा माना जाता है कि कोरोना वायरस से पीड़ित एक शख्स औसतन दो या तीन और लोगों को संक्रमित करता है. जबकि फ़्लू वाला व्यक्ति एक और शख्स को इससे संक्रमित करता है.
फ़्लू और कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाए जा सकते हैं.
बार-बार अपने हाथ साबुन और पानी से धोएं
जब तक आपके हाथ साफ न हों अपने चेहरे को छूने से बचें
खांसते और छींकते समय टिश्यू का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत सीधे डस्टबिन में डाल दें.
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हर पांच में से चार लोगों में कोविड-19 फ़्लू की तरह की एक मामूली बीमारी होती है.
इसके लक्षणों में बुख़ार और सूखी खांसी शामिल है. आप कुछ दिनों से बीमार होते हैं, लेकिन लक्षण दिखने के हफ्ते भर में आप ठीक हो सकते हैं.
अगर वायरस फ़ेफ़ड़ों में ठीक से बैठ गया तो यह सांस लेने में दिक्कत और निमोनिया पैदा कर सकता है. हर सात में से एक शख्स को अस्पताल में इलाज की जरूरत पड़ सकती है.
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अस्थमा यूके की सलाह है कि आप अपना रोज़ाना का इनहेलर लेते रहें. इससे कोरोना वायरस समेत किसी भी रेस्पिरेटरी वायरस के चलते होने वाले अस्थमा अटैक से आपको बचने में मदद मिलेगी.
अगर आपको अपने अस्थमा के बढ़ने का डर है तो अपने साथ रिलीवर इनहेलर रखें. अगर आपका अस्थमा बिगड़ता है तो आपको कोरोना वायरस होने का ख़तरा है.
क्या ऐसे विकलांग लोग जिन्हें दूसरी कोई बीमारी नहीं है, उन्हें कोरोना वायरस होने का डर है?स्टॉकपोर्ट से अबीगेल आयरलैंड
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ह्दय और फ़ेफ़ड़ों की बीमारी या डायबिटीज जैसी पहले से मौजूद बीमारियों से जूझ रहे लोग और उम्रदराज़ लोगों में कोरोना वायरस ज्यादा गंभीर हो सकता है.
ऐसे विकलांग लोग जो कि किसी दूसरी बीमारी से पीड़ित नहीं हैं और जिनको कोई रेस्पिरेटरी दिक्कत नहीं है, उनके कोरोना वायरस से कोई अतिरिक्त ख़तरा हो, इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.
जिन्हें निमोनिया रह चुका है क्या उनमें कोरोना वायरस के हल्के लक्षण दिखाई देते हैं?कनाडा के मोंट्रियल से मार्जे
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कम संख्या में कोविड-19 निमोनिया बन सकता है. ऐसा उन लोगों के साथ ज्यादा होता है जिन्हें पहले से फ़ेफ़ड़ों की बीमारी हो.
लेकिन, चूंकि यह एक नया वायरस है, किसी में भी इसकी इम्युनिटी नहीं है. चाहे उन्हें पहले निमोनिया हो या सार्स जैसा दूसरा कोरोना वायरस रह चुका हो.
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सरकारें इतने कड़े कदम क्यों उठा रही हैं जबकि फ़्लू इससे कहीं ज्यादा घातक जान पड़ता है?हार्लो से लोरैन स्मिथ
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शहरों को क्वारंटीन करना और लोगों को घरों पर ही रहने के लिए बोलना सख्त कदम लग सकते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं किया जाएगा तो वायरस पूरी रफ्तार से फैल जाएगा.
फ़्लू की तरह इस नए वायरस की कोई वैक्सीन नहीं है. इस वजह से उम्रदराज़ लोगों और पहले से बीमारियों के शिकार लोगों के लिए यह ज्यादा बड़ा ख़तरा हो सकता है.
क्या खुद को और दूसरों को वायरस से बचाने के लिए मुझे मास्क पहनना चाहिए?मैनचेस्टर से एन हार्डमैन
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पूरी दुनिया में सरकारें मास्क पहनने की सलाह में लगातार संशोधन कर रही हैं. लेकिन, डब्ल्यूएचओ ऐसे लोगों को मास्क पहनने की सलाह दे रहा है जिन्हें कोरोना वायरस के लक्षण (लगातार तेज तापमान, कफ़ या छींकें आना) दिख रहे हैं या जो कोविड-19 के कनफ़र्म या संदिग्ध लोगों की देखभाल कर रहे हैं.
मास्क से आप खुद को और दूसरों को संक्रमण से बचाते हैं, लेकिन ऐसा तभी होगा जब इन्हें सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और इन्हें अपने हाथ बार-बार धोने और घर के बाहर कम से कम निकलने जैसे अन्य उपायों के साथ इस्तेमाल किया जाए.
फ़ेस मास्क पहनने की सलाह को लेकर अलग-अलग चिंताएं हैं. कुछ देश यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनके यहां स्वास्थकर्मियों के लिए इनकी कमी न पड़ जाए, जबकि दूसरे देशों की चिंता यह है कि मास्क पहने से लोगों में अपने सुरक्षित होने की झूठी तसल्ली न पैदा हो जाए. अगर आप मास्क पहन रहे हैं तो आपके अपने चेहरे को छूने के आसार भी बढ़ जाते हैं.
यह सुनिश्चित कीजिए कि आप अपने इलाके में अनिवार्य नियमों से वाकिफ़ हों. जैसे कि कुछ जगहों पर अगर आप घर से बाहर जाे रहे हैं तो आपको मास्क पहनना जरूरी है. भारत, अर्जेंटीना, चीन, इटली और मोरक्को जैसे देशों के कई हिस्सों में यह अनिवार्य है.
अगर मैं ऐसे शख्स के साथ रह रहा हूं जो सेल्फ-आइसोलेशन में है तो मुझे क्या करना चाहिए?लंदन से ग्राहम राइट
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
अगर आप किसी ऐसे शख्स के साथ रह रहे हैं जो कि सेल्फ-आइसोलेशन में है तो आपको उससे न्यूनतम संपर्क रखना चाहिए और अगर मुमकिन हो तो एक कमरे में साथ न रहें.
सेल्फ-आइसोलेशन में रह रहे शख्स को एक हवादार कमरे में रहना चाहिए जिसमें एक खिड़की हो जिसे खोला जा सके. ऐसे शख्स को घर के दूसरे लोगों से दूर रहना चाहिए.
मैं पांच महीने की गर्भवती महिला हूं. अगर मैं संक्रमित हो जाती हूं तो मेरे बच्चे पर इसका क्या असर होगा?बीबीसी वेबसाइट के एक पाठक का सवाल
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
गर्भवती महिलाओं पर कोविड-19 के असर को समझने के लिए वैज्ञानिक रिसर्च कर रहे हैं, लेकिन अभी बारे में बेहद सीमित जानकारी मौजूद है.
यह नहीं पता कि वायरस से संक्रमित कोई गर्भवती महिला प्रेग्नेंसी या डिलीवरी के दौरान इसे अपने भ्रूण या बच्चे को पास कर सकती है. लेकिन अभी तक यह वायरस एमनियोटिक फ्लूइड या ब्रेस्टमिल्क में नहीं पाया गया है.
गर्भवती महिलाओंं के बारे में अभी ऐसा कोई सुबूत नहीं है कि वे आम लोगों के मुकाबले गंभीर रूप से बीमार होने के ज्यादा जोखिम में हैं. हालांकि, अपने शरीर और इम्यून सिस्टम में बदलाव होने के चलते गर्भवती महिलाएं कुछ रेस्पिरेटरी इंफेक्शंस से बुरी तरह से प्रभावित हो सकती हैं.
मैं अपने पांच महीने के बच्चे को ब्रेस्टफीड कराती हूं. अगर मैं कोरोना से संक्रमित हो जाती हूं तो मुझे क्या करना चाहिए?मीव मैकगोल्डरिक
जेम्स गैलेगरस्वास्थ्य संवाददाता
अपने ब्रेस्ट मिल्क के जरिए माएं अपने बच्चों को संक्रमण से बचाव मुहैया करा सकती हैं.
अगर आपका शरीर संक्रमण से लड़ने के लिए एंटीबॉडीज़ पैदा कर रहा है तो इन्हें ब्रेस्टफीडिंग के दौरान पास किया जा सकता है.
ब्रेस्टफीड कराने वाली माओं को भी जोखिम से बचने के लिए दूसरों की तरह से ही सलाह का पालन करना चाहिए. अपने चेहरे को छींकते या खांसते वक्त ढक लें. इस्तेमाल किए गए टिश्यू को फेंक दें और हाथों को बार-बार धोएं. अपनी आंखों, नाक या चेहरे को बिना धोए हाथों से न छुएं.
बच्चों के लिए क्या जोखिम है?लंदन से लुइस
बीबीसी न्यूज़हेल्थ टीम
चीन और दूसरे देशों के आंकड़ों के मुताबिक, आमतौर पर बच्चे कोरोना वायरस से अपेक्षाकृत अप्रभावित दिखे हैं.
ऐसा शायद इस वजह है क्योंकि वे संक्रमण से लड़ने की ताकत रखते हैं या उनमें कोई लक्षण नहीं दिखते हैं या उनमें सर्दी जैसे मामूली लक्षण दिखते हैं.
हालांकि, पहले से अस्थमा जैसी फ़ेफ़ड़ों की बीमारी से जूझ रहे बच्चों को ज्यादा सतर्क रहना चाहिए.