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कोरोना वायरस: लॉकडाउन में महिलाओं पर भारी पड़ता वर्क फ्रॉम होम
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नाश्ता, सफाई, बर्तन, तैयार होना, मीटिंग, मेल, टार्गेट, बच्चे की क्लासेस, लंच बनाना, बर्तन, फ़ोन, मेल, मीटिंग, टार्गेट, बच्चे का होमवर्क, रात का खाना, कल की मीटिंग....
ये महिलाओं के दिमाग़ से निकाली गई कामों की एक लिस्ट है. वो महिलाएं जो आजकल घर से ऑफ़िस का काम कर रही हैं. रुकिए... सिर्फ़ ऑफ़िस का ही नहीं बल्कि घर और ऑफ़िस दोनों का काम कर रही हैं.
सुबह उठते ही उनके दिमाग़ में घंटी बज जाती है, तेज़ी से घड़ी चलने लगती है, ढेर सारे कामों की लिस्ट बन जाती है और वो इधर-उधर दौड़कर रोबोट की तरह झटपट काम निपटाने लगती हैं.
इस लिस्ट में आपको घर और ऑफ़िस के काम से जुड़े तमाम शब्द तो मिल जाएंगे लेकिन चैन और आराम जैसे शब्द ढूंढे भी नहीं मिलेंगे.
कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन से कई लोग वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं. महिलाएं भी इस दौरान घर से ऑफ़िस का काम कर रही हैं. लेकिन, उनका रूटीन पूरी तरह बदल गया है.
वो घर और ऑफ़िस का दुगना बोझ उठा रही हैं. मेड ना आने से कोई मदद भी नहीं मिल पाती. दोनों ज़िम्मेदारियों से महिलाएं कैसे जूझ रही हैं वो आप इस रूटीन से समझ सकते हैं.
शर्मिला, सेल्स सपोर्ट एंड कस्टमर सर्विस मैनेजर
दिन शुरू - सबुह 5 बजे
दिन ख़त्म – रात 11 बजे
सुबह उठते ही रसोई में जाकर खाना बनाना, बर्तन धोना, कपड़े धोना और झाड़ू-पोछा करना. उसके बाद 9 बजे ऑफ़िस का काम शुरू हो जाता है.
“मुझे नहाने से लेकर नाश्ता बनाने के लिए बस आधा घंटा मिलता है. मैं ठीक से नहा भी नहीं पाती. इस बीच लैपटॉप भी चला रही होती हूं ताकिमीटिंग तक ब्लूटुथ से कनेक्ट हो जाऊं.उसके बाद मेरा ऑफ़िस शुरू हो जाता है और तब तक जान ही निकल जाती है. नौ बजे जब लैपटॉप के सामने बैठती हूं तो लगता है कि आधे घंटे के लिए सो जाऊं. लेकिन, तभी आपको मीटिंग में फ्रेश और एनर्जेटिक भी लगना होता है.”
पूजा चित्रोदा, गेमिंग कंपनी में डिजिटल मार्केटिंग मैनेजर
दिन शुरू - सबुह 7 बजे
दिन ख़त्म – रात 2 बजे
सुबहघरकेकामसेशुरूहोतीहै. फिर ऑफिस का काम... दिन का खाना, बर्तन, बच्चे की क्लासेस, साथ में ऑफ़िस का काम... शाम के बर्तन, रात का खाना, ऑफ़िस का काम...
“महिलाओं पर काम का बोझ बहुत बड़ गया है. घर और ऑफ़िस दोनों जगह दिनभर संभालते रहो. कभी-कभी ऐसा लगता है कि मुझे थोड़ा आराम चाहिए लेकिन वो नहीं मिल पाता. बस एक कमरे से दूसरे कमरे में दिनभर भागती रहती हूं.”
शालिनी जोशी, मैनेजर एचएसबीसी बैंक
दिन शुरू - सबुह 7 बजे
दिन ख़त्म – रात 11:30 बजे
“आप काम के बीच मेंजो ब्रेक लेते हैं वो ब्रेक नहीं होता क्योंकि उसमें आप घर के काम करते हैं. अपने लिए कोई समय ही नहीं मिलता. ये सब मुझे बहुत थका देता है.”
ये हाल लगभग सभी कामकाजी महिलाओं का है. वो घरेलू ज़िम्मेदारियों और ऑफ़िस की उम्मीदों के बीच बने हालात से निपट रही हैं.
खाना खाने का समय नहीं
जो महिलाएं घर में सबके लिए खाना बना रही हैं खुद उन्हें ठीक से खाने का समय नहीं मिल पाता.
शर्मिला अपनी 11 साल की बेटी, पति और सास-ससुर के साथ रहती हैं. उनके ससुर बीमार हैं और उन्हें डायबिटीज भी है. ऐसे में शर्मिला सबके लिए तो खाना बनाती ही हैं साथ में अपने ससुर को हर दो घंटे में कुछ न कुछ खाने के लिए देती हैं ताकि उनका शुगर लेवल कम ना हो जाए.
लेकिन, जब खुद उनके खाने की बात हो तो...
शर्मिला ने बताया, “खाना तो खा लेती हूं लेकिन वो खाने की तरह नहीं होता. काम के साथ-साथ ही मुझे खाना पड़ता है. ऑफिस में कम से कम आधा-एक घंटा तो अलग से लंच के लिए मिल जाता था लेकिन घर पर ऐसा भी नहीं होता. इसलिए मैं अपने लिए आसान खाना बनाती हूं. जैसे पीनट बटर लगाकर ब्रैड खा लिया, दलिया या सूप बना लिया. इसे मैं मीटिंग करते-करते खाती रहती हूं.”
पूजा कहती हैं कि बात ये है कि आप दो ड्यूटी एक साथ कर रहे हैं. ऑफिस के काम से थोड़ा ब्रेक मिलता है तो आप घर के काम में जुट जाते हैं. घर का काम ख़त्म होता है तो फिर ऑफिस के काम में जुट जाते हैं.
किचन में मीटिंग
महिलाओं को इस दोहरी जिम्मेदारी के चलते ज़रूरत से ज़्यादा मल्टी टास्किंग होना पड़ रहा है जिससे उनका दिमाग फ्री नहीं रह पाता. इस तरह वो मानसिक और शारीरिक थकान का अनुभव करती हैं.
एक सरकारी स्कूल में स्पेशल एजुकेटर करुणा थापर कुछ इसी तरह की स्थितियों का सामना कर रही हैं.
उन्हें खास ज़रूरत वाले बच्चों को रोज़ एक्टिविटी देनी होती है. वो ये टास्क मैसेज, वीडियो या ऑडियो के ज़रिए देती हैं. उन्हें ज़रूरत पड़ने पर बच्चों से बात भी करनी होती है.
वह कहती हैं, “मैं कई बार रसोई का कुछ और काम करते हुए बच्चों से बात करती हूं. ज़रूरत हो तो अपने वॉयस मैसेज भी इसी तरह रिकॉर्ड करती हूं. शारीरिक तौर पर बहुत ज़्यादा थकान भरा हो गया है. मानसिक दबाव अब ज़्यादा है. पहले तो स्कूल छह घंटे के बाद काम ख़त्म हो जाता था लेकिन अब तो दिनभर चलता रहता है.”
मानसिक समस्याओं की ओर बढ़तीं महिलाएं
मनोवैज्ञानिक पूजा शिवम कहती हैं कि इन स्थितियों का प्रभाव तो हर किसी पर पड़ रहा है लेकिन महिलाओं के लिए परेशानी और ज़्यादा है.
वह कहती हैं, “हमारे समाज में महिलाओं के लिए एक ऐसी सामाजिक भूमिका है जिसमें सभी घरेलू ज़िम्मेदारियां उसे भी निभानी है. भले ही वो नौकरीपेशा हो या नहीं. अब वो दोनों काम कर रही हैं तो काम खिंचता चला जाता है. इससे उन पर शारिरक और मानसिक दबाव बढ़ रहा है.”
“साथ ही वो एक तरह के अपरोधबोध से भी गुजर रही हैं. अगर घर के काम में कोई कमी छूट गई तो उन्हें लगता है कि उनमें ही कोई कमी है. ये पूरे तनाव और दबाव की स्थिति उनमें चिड़चिड़ापन, असंतुष्टी, झुंझलाहट, बैचेनी, थकान और वज़न गिरने जैसी समस्याएं ला सकती है.”
डॉक्टर पूजा शिवम का कहना है कि ये हल्के मानसिक तनाव के लक्षण हैं. महिलाओं को इन पर ध्यान देना होगा. अगर वो ऐसा महसूस करती हैं तो उन्हें अपना रूटीन ठीक करने की तुरंत ज़रूरत है वरना स्थितियां और ख़राब हो सकती हैं.
बच्चों की जिम्मेदारी
आजकल स्कूल बंद हैं तो सभी बच्चे घर पर हैं. वहीं, पढ़ाई रुकने के कारण स्कूलों ने ऑनलाइन क्लासेस देना शुरू कर दिया है. अब महिलाओं पर काम के बीच में बच्चों की जिम्मेदारी भी आ जाती है.
पूजा की पांच साल की बेटी की भी ऑनलाइन क्लास चल रही है. स्कूल से कौन-सा वीडियो आया, क्या होमवर्क मिला सब उन्हें देखना पड़ता है
पूजा कहती हैं, “बेटी के स्कूल से वीडियो आते हैं और होमवर्क मिलता है. घर और ऑफिस के काम के बीच में उसका भी ध्यान रखना पड़ता है. बच्चों की पढ़ाई नहीं छूटनी चाहिए.”
वहीं, करुणा थापर तो ऑनलाइन क्लास दे भी रही हैं और अपने बेटे को क्लास दिलवा भी रही हैं.
वह कहती हैं, “बेटे को भी दिन भर व्यस्त रखना होता है. अगर उसे छोड़ दूंगी तो वो छुट्टी समझकर खेलता रहेगा.”
ऑफ़िस का बढ़ता काम
वर्क फ्रॉम होम का ट्रेंड पहले भी रहा है लेकिन इतने लंबे समय तक होना, ऐसा पहली बार है. इससे लोगों के सामने कई तरह की चुनौतियां आ रही हैं.
महिलाएं बताती हैं कि जैसे पहले ऑफ़िस का काम सिर्फ़ ऑफ़िस तक रहता था अब वो दिनभर चलता रहता है. ऑफिस वालों को लगता है कि दिनभर घर पर हैं तो काम करने में क्या दिक्कत है.
जैसे पूजा बताती हैं, “मेरी नौकरी फुल टाइम हो गई है. काम के समय की कोई सीमा ही नहीं रही. अब तो वीकेंड में भी काम करना पड़ता है. लोग सोचते हैं कि आप घर पर हैं तो बीच-बीच में आराम करते होंगे. लेकिन, हमारे लिए वो आराम नहीं होता बल्कि उसमें घर का काम निपटाना होता है.”
“आप छुट्टी भी नहीं ले सकते क्योंकि कहा जाता है कि अब तो रोज ही छुट्टी है तो अलग से किस बात के लिए चाहिए.”
वहीं, एचएसबीसी बैंक में मैनेजर शालिनी जोशी बताती हैं कि दिक्कत ये है कि घर पर काम की स्पीड कम हो जाती है क्योंकि हर काम फोन और मैसेज पर होता है. इससे आप आठ घंटे नहीं बल्कि 10 से 12 घंटे काम कर रहे हैं. साथ ही रात को काम ख़त्म करने के बाद अगले दिन की चिंता होने लगती है. रात से ही अगले दिन की तैयारी शुरू हो जाती है.
कैसे रखें अपना ध्यान
मनोवैज्ञानिक पूजा शिवम कहती हैं कि ये पूरा माहौल महिलाओं की सेहत पर बुरा असर डाल रहा है. शरीर और दिमाग बहुत ज़्यादा समय तक इतना दबाव नहीं झेल सकते. ऐसे में महिलाएं अपने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए इन बातों का ध्यान रख सकती हैं-
सबसे पहले ये सोचें कि क्या आप ऐसा कुछ कर रही हैं जिससे तनाव और दबाव बढ़ा रहा है. सबका ध्यान रखते हुए अपनी ही अनदेखी तो नहीं कर रहीं.
इस धारणा से निकलें कि हर काम आपको ही करना है.
ये तय करना पड़ेगा कि क्या कर सकते हैं और क्या करना चाहिए. अगर आप कोई काम नहीं कर सकतीं तो उसे जबरदस्ती ना करें.
आप सभी को खुश नहीं रख सकतीं. परफेक्ट या सुपरवुमन बनने की कोशिश ना करें.
अपने लिए वक़्त निकालें और आराम करें. पौष्टिक खाना, सोने पर, एक्सरसाइज पर ध्यान दें क्योंकि इस वक़्त किसी भी इनफेक्शन से बचने के लिए स्वस्थ रहना बहुत ज़रूरी है.
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