कोरोना: लॉकडाउन में सब कुछ भूलकर दूसरों की मदद करते नौजवान

    • Author, शुरैह नियाज़ी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, भोपाल से

देशभर में कोरोना की वजह से लॉकडाउन कर दिया गया है. भोपाल में कोरोना के मरीज़ मिल जाने की वजह से सरकार ने सोमवार से ही कर्फ़्यू लगाने के आदेश दे दिये थे.

सरकार का दावा है कि लोगों के लिए रोज़मर्रा की चीज़ें उपलब्ध हैं लेकिन दिक्क़तें उन घरों पर आ रही है जहां पर बुर्जुग लोग हैं और उनके लिये इस वक़्त निकल पाना मुश्किल है.

इस मुश्किल वक़्त में शहर के कुछ नौजवान और संस्थान ऐसे लोगों के लिए मददगार बनकर सामने आए हैं. ये युवा बिना कोई परवाह किए लोगों की मदद कर रहे हैं.

लगभग 70 साल के श्याम बाली अपनी पत्नी के साथ शहर के साकेत नगर इलाके में रहते हैं. इस मुश्किल वक़्त में उनके पास आटा नहीं था और उनका निकलना भी मुमकिन नहीं था.

ऐसे मुश्किल वक़्त में उनके लिये 25 साल के क्षितिज पाटले फ़रिश्ता बन कर सामने आए.

फ़ेसबुक ग्रुप के ज़रिए संपर्क कर रहे हैं लोग

श्याम बाली ने बताया, "हमारे पास आटा ख़त्म हो गया था. हमें मिलने की भी उम्मीद नही थी क्योंकि हम बाहर निकल नही सकते थे. इसके बाद हमने भोपाल सिटी इन्फ़र्मेशन पोर्टल पर मदद मांगी और हमारी मदद के लिये ये मौजूद थे."

क्षितिज पेशे से ग्राफ़िक डिजाइनर हैं. उन्होंने बताया, "पहले बुजुर्ग अपने इस्तेमाल करने वाले ब्रैंड का आटा चाह रहे थे. लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि जो भी मिल जायें वो ला दें."

उनकी मदद के लिये क्षितिज को दो बाज़ारों में जाना पड़ा क्योंकि एक जगह सभी दुकानें बंद थी. हालांकि दूसरी जगह उन्हें आटा मिल गया और उसके बाद उन्होंने उसे डेलिवर कर दिया.

भोपाल सिटी इन्फ़ॉर्मेशन पोर्टल एक फ़ेसबुक ग्रुप है जिसका संचालन रजनीश खरे कर रहे हैं. रजनीश ने इसे शहर के लोगों को हर तरह की मदद मुहैया कराने के लिए बनाया था और इस समय यह ग्रुप लोगों की ख़ूब मदद कर रहा है.

मददगार साबित रहे हैं...

कुछ इसी तरह के मददगार उत्तर प्रदेश के गाजीपुर के रहने वाले अनूप गुप्ता भी साबित हो रहे हैं. लगभग 30 साल के अनूप भोपाल में रहकर सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे हैं.

उनके पास बेंगलुरु से फ़ोन आया कि शहर के पिपलानी इलाक़े में रहने वाली एक महिला को कुछ सामान की ज़रूरत है. उस घर में दो महिलाएं थीं जिनकी उम्र लगभग 70-75 साल थी.

अनूप गुप्ता ने बताया, "कोशिश यही थी कि जिस इलाक़े में भी लोगों को ज़रूरत हो तो उसी इलाक़े में रहने वाले वालिंटयर्स मदद पहुंचायें ताकि उन्हें किसी भी तरह की कोई दिक्क़त न आए."

अनूप ने उनके लिए किराने का सारा सामान ख़रीदा और पास की आटा चक्की से आटा लिया और उनके पते पर पहुंच गए और सामान उपलब्ध करा दिया.

अनूप ने बताया, "हम मुश्किल के इस समय में जो थोड़ी-बहुत मदद कर सकते हैं, वो हम कर रहे हैं."

खाने को कुछ भी नही था...

पेशे से सरकारी शिक्षक मनीष यादव भी इस समय मदद करने में जुटे हुए हैं.

पुराने भोपाल के लालघाटी इलाके में एक बुर्जुग दंपति जिनकी उम्र 84 और 80 साल है, उन्हें दंवाई की ज़रूरत पड़ गई. मनीष यादव ने फ़ौरन उनके लिए वो दवा ढूंढी और उनके पास पहुंच गए.

ऐसा भी नहीं है कि मदद सिर्फ़ बुर्जुगों की ही की जा रही है. ग्रुप के सदस्यों ने नागपुर से भोपाल ट्रेनिंग में आए अमेय की भी मदद की.

अमेय और उनके दोस्त भोपाल में किसी ट्रेनिंग में 20 मार्च को आए थे. लेकिन इस बीच वो आकर फंस गये और उनके पास खाने को कुछ भी नही था.

अमेय का फ़ोन आया और उसके बाद प्रखर शर्मा नाम के एक वालेंटियर को लगाया गया जो दो टाइम का खाना लेकर उनके पास पहुंच गए.

इस ग्रुप में महिलाएं भी जुड़ी हुई हैं. इन्हीं महिलाओं में से एक हैं उज़मा. पेशे से वक़ील उज़मा शेख़ ने उन लड़कियों की मदद की जो भोपाल से बाहर से आकर यहां रह रही हैं लेकिन उनके पैसे भी ख़त्म हो गये और उनके पास खाने का सामान भी नहीं है.

'रोटी बैंक' बना मदद का ज़रिया

उज़मा ने उनके लिए खाने का सामान लिया और कुछ ऐसी चीज़ें भी दी जिसका इस्तेमाल वो आगे आने वाले कुछ दिनों में कर सकती हैं.

उज़मा ने बताया, "ऐसे समय में आस-पास के लोग भी अपने करीब में रहने वाले लोगों पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं. यही वजह है कि इन लड़कियों की मदद करीब में रहने वाले नहीं कर रहे थे."

भोपाल का रोटी बैंक भी इस वक़्त लोगों के ख़ूब काम आ रहा है. रोटी बैंक की स्थापना 2018 में मोहम्मद यासिर ने की थी. लॉकडाउन के बाद रोज़ाना 500-700 लोग यहां से खाना खा रहे हैं.

रोटी बैंक के दो काउंटर शहरों में है लेकिन एक काउंटर जो नए भोपाल में था उसे पुलिस ने बंद करा दिया है. अभी पुराने भोपाल की इक़बाल मैदान में स्थित दूसरा काउंटर बख़ूबी आपने काम को अंजाम दे रहा है.

मोहम्मद यासिर ने बताया कि लॉकडाउन के बाद उनका काम लगभग तीन गुना बढ़ गया है. रोटी बैंक में लोग ही खाना देकर जाते है जिन्हें फिर ज़रूरतमंदों को दे दिया जाता है.

लॉकडाउन के बाद

यासिर ने बताया, "हम लोगों से कहते है कि आप अगर खाना बना रहे हैं तो एक या दो लोगों का खाना अलग से बना लें. उसके बाद लोग वो खाना हमें दे जाते हैं जो हम फिर हमारे पास आने वाले लोगों को देते हैं."

नाम इसका ज़रूर रोटी बैंक है लेकिन यहां पर लोगों को पूरा खाना मिलता है. यहां कोई भी इंसान जो भूखा हो, आकर खाना खा सकता है.

इसके अलावा भी कई स्थानीय संस्थाएं है, जो आगे आ रही हैं और लोगों की मदद कर रही है.

कुछ ऐसी संस्थाएं हैं जो लोगों की ज़रूरत के सामान का पैकेट बना कर ग़रीबों को उपलब्ध करा रही हैं, ताकि इस समय अगर उन्हें काम नहीं मिलता है, तो भी उनका घर चलता रहे.

कोरोना वायरस को लेकर हो रहे लॉकडाउन के बाद ख़ास तौर पर यह देखा जा रहा है कि लोग दूसरों की मदद के लिये बड़ी तादाद में आगे आ रहे हैं. वो न सिर्फ़ अपना समय दे रहे हैं बल्कि पैसों और खाने-पीने की चीज़ों से भी मदद कर रहे हैं.

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