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शाहीन बाग़ में मीडिया के सामने मध्यस्थता पर विवाद क्यों?
- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सुप्रीम कोर्ट की ओर से शाहीन बाग़ में प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच जारी गतिरोध को ख़त्म करने के लिए नियुक्त वार्ताकार पैनल बुधवार को शाहीन बाग़ पहुंचा.
वार्ताकार पैनल के दो सदस्यों संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन ने प्रदर्शनकारियों से बात की.
दोनों वार्ताकारों ने बुधवार को यह स्पष्ट किया कि 'उनके पास कुछ ही दिन का समय है और वे इस मामले में कोई फ़ैसला सुनाने शाहीन बाग़ नहीं पहुंचे हैं बल्कि बातचीत के ज़रिये चीज़ों को सामान्य करने का प्रयास कर रहे हैं.'
रामचंद्रन ने लोगों को अपने आने की वजह और उद्देश्य बताए लेकिन उन्होंने मीडिया से प्रदर्शनस्थल से चले जाने की अपील भी की. रामचंद्रन की इस बात का शाहीन बाग़ में मौजूद कुछ प्रदर्शनकारियों ने विरोध किया.
इस सब के बाद बुधवार का दिन बिना किसी नतीजे के ख़त्म हो गया मगर हेगड़े और रामचंद्रन ने जाते-जाते कहा कि वे कल फिर आएंगे ताकि बातचीत को आगे बढ़ाया जा सके.
मीडिया को लेकर विवाद क्यों?
शाहीन बाग़ में मीडिया की मौजूदगी पिछले कुछ समय से कई बार विवाद का विषय बनी है.
शाहीन बाग़ में कुछ पत्रकारों के साथ हाथापाई जैसी ख़बरें भी सामने आई हैं. इन मुद्दों पर पत्रकारों के बीच अलग-अलग राय भी देखने को मिली है.
फिर बुधवार को जब वार्ताकारों ने मीडिया से जाने के लिए कहा तो यह सवाल उठने लगा कि इस तरह की संवेदनशील बातचीत के दौरान मीडिया को मौजूद रहना चाहिए या नहीं.
मीडिया की मौजूदगी सार्थक या निरर्थक?
बीबीसी ने इस सवाल का जवाब जानने के लिए कई मामलों में मध्यस्थ की भूमिका निभा चुके स्वामी अग्निवेश से बात की.
स्वामी अग्निवेश मानते हैं कि ऐसी प्रक्रिया में मीडिया की मौजूदगी एक सार्थक रोल निभाती है.
वह कहते हैं, "हमें ये समझना चाहिए कि ये एक काफ़ी अहम प्रक्रिया है. ऐसे में इसमें किसी तरह के भ्रम की गुंजाइश नहीं है. इसलिए बातचीत की प्रक्रिया में मीडिया की मौजूदगी काफ़ी अहम है."
इस कारण बताते हुए अग्निवेश कहते हैं, "यह इसलिए अहम है क्योंकि मीडिया की मौजूदगी की वजह से किसी तरह के भ्रम की स्थिति पैदा नहीं होती है. बयानों को तोड़मरोड़ कर पेश नहीं किया जा सकता है और इससे मध्यस्थता की प्रक्रिया में एक पारदर्शिता आती है जो ऐसी प्रक्रियाओं के लिए बेहद ख़ास है."
अग्निवेश इससे पहले यूपीए 2 के दौरान अन्ना आंदोलन और माओवादियों के साथ वार्ता के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभा चुके हैं.
वह कहते हैं, "मेरा अनुभव तो यही कहता है कि मीडिया की मौजूदगी इस प्रक्रिया में एक सार्थक भूमिका अदा करती है. इसका उदाहरण अन्ना आंदोलन है. उस दौरान मध्यस्थता की प्रक्रिया में मीडिया कवरेज़ से पारदर्शिता आई थी और समस्या सुलझ गई. वहीं, माओवादियों के साथ मध्यस्थता के दौरान मीडिया कवरेज़ नहीं होने से सार्थक परिणाम सामने नहीं आए."
बुधवार की शाम संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन की ओर से एक वीडियो मेसेज भी जारी किया गया.
रामचंद्रन ने इस वीडियो मेसेज में कहा है, "आज हमारी प्रदर्शनकारियों के साथ काफ़ी अच्छी मुलाक़ात हुई. वहां हम कई सारे लोगों से मिले जिन्हें अपने भारतीय होने पर गर्व है. इन लोगों को अपनी संवैधानिक संस्थाओं पर पक्का भरोसा है."
वीडियो मेसेज़ के अंत में संजय हेगड़े ने कहा है, "हम कल (गुरुवार) को एक नई उम्मीद के साथ वापस शाहीन बाग़ जाएंगे ताकि एक ऐसा हल निकल सके जो सभी को स्वीकार हो."
लेकिन उनकी ओर से अभी स्पष्ट नहीं किया गया है कि आने वाले दिनों में मीडिया को मौजूद रहने की इजाज़त दी जाएगी या नहीं.
क्या है मामला?बीते साल संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक पेश होने और उसके बाद क़ानून में परिवर्तित होने के बाद से देश भर में इसके ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन जारी हैं.शुरुआत में इसके ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शनों ने हिंसक रूप लिया जिनमें कई लोगों की जानें गईं. लेकिन इसके बाद शाहीन बाग़ समेत देश भर में महिलाओं ने इसके ख़िलाफ़ विरोध शुरू किया.शाहीन बाग़ विरोध प्रदर्शन की वजह से दिल्ली और नोयडा को जोड़ने वाला रास्ता बंद है. इस वजह से लोग हर रोज़ जाम की समस्या का सामना कर रहे हैं.इन समस्याओं के चलते पहले ये मामला पहले दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा था और अब सुप्रीम कोर्ट में है.सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के समाधान के लिए साधना रामचंद्रन, संजय हेगड़े और वजाहत हबीबुल्लाह समेत तीन लोगों का वार्ताकार पैनल बनाया है.अदालत ने इन लोगों को शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों के साथ बातचीत करके इस गतिरोध को ख़त्म करने की कोशिश करने के लिए कहा है और चार दिन का समय दिया है.
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