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नसीरुद्दीन शाह के पिता भारत छोड़कर पाकिस्तान क्यों नहीं गए
- Author, रियाज़ सुहैल
- पदनाम, बीबीसी उर्दू सेवा के लिए
भारत के विभाजन के बाद भारत में रहने वाले लाखों मुसलमान पाकिस्तान चले गए थे. लेकिन बॉलीवुड के मशहूर कलाकार नसीरुद्दीन शाह के माता-पिता ने भारत में ही रुक जाने का फ़ैसला किया था.
बॉलीवुड के मशहूर कलाकार नसीरुद्दीन शाह ने विभाजन के समय पाकिस्तान ना जाने के संबंध में बात करते हुए कहा, "ये सच है कि भारत में मेरे पिता की कोई जायदाद नहीं थी लेकिन वह सरहद पार जाकर अपने ज़मीर की आवाज़ के ख़िलाफ़ दावा करके जायदाद हथियाना नहीं चाहते थे. दूसरी बात यह थी कि उनकी यहां सरकारी नौकरी थी उसे छोड़कर नई ज़िंदगी की शुरुआत करना उन्हें ठीक नहीं लगा, इसलिए उन्होंने आज़ाद "हिंदू देश" में रहने को तरजीह दी."
नसीरुद्दीन शाह अपनी आत्मकथा 'और फिर एक दिन' में लिखते हैं कि उनके पिता कभी भी किश्तियों को जलाने का समर्थन नहीं करते थे, उन्होंने दृढ़ता दिखाई कि हम भारत में ही रह कर कुछ ना कुछ बेहतर कर लेंगे, बाद में यह साबित हुआ कि भारत में हमारे भविष्य के बारे में उनका अनुमान ग़लत नहीं था.
नसीरुद्दीन शाह की आत्मकथा लगभग पाँच बरस पहले प्रकाशित हुई थी लेकिन हाल ही में उन्होंने भारत में नागरिकता के विवादित क़ानून पर कड़ी नाराज़गी जताई है.
एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, "70 बरस बाद अब उन्हें एहसास होने लगा है कि वो बतौर मुसलमान भारत में नहीं रह सकते और यह भी कि उन्हें ये साबित करने की ज़रूरत भी पड़े कि वह मुसलमान होने के साथ-साथ भारतीय भी हैं."
नसीरुद्दीन शाह के अनुसार उनके पिता मोहम्मद शाह ने नायब तहसीलदार से सरकारी नौकरी की शुरुआत की थी.
पिता ने की अंग्रेज़ सरकार की सेवा
नसीरुद्दीन शाह लिखते हैं कि ब्रिटिश सरकार में प्रोविंशियल सर्विस करने से पहले उनके पिता ने एक सैलानी की तरह ज़िंदगी गुज़ारी थी इसी दौरान आज़ादी की सुबह आई, भारत का बंटवारा हुआ और अँगरेज़ यहाँ से चले गये.
वह मौक़े से फ़ायदा नहीं उठाना चाहते थे इसलिए उन्होंने भारत में रह जाने का फ़ैसला किया. उनके दो भाइयों ने भारत को छोड़ दिया.
वह लिखते हैं, "मेरी माँ के बहन भाइयों में से भी कई ने ऐसा किया. मेरी माँ के 10 बहन भाई थे और मेरे पिता के सात बहन भाई, इसमें कोई शक नहीं कि हम सब ने अपने पिता के भारत ना छोड़ने के फ़ैसले को सही माना."
नसीरुद्दीन शाह के पूर्वज अफ़ग़ानिस्तान से थे, उन्होंने जंग-ए-आज़ादी को कुचलने में अंग्रेज़ों का साथ दिया था.
नसीरुद्दीन शाह अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि हमारे दादा का नाम आग़ा सैय्यद मोहम्मद शाह था वह अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी काबुल के नज़दीक स्थित एक क़स्बे पगमान के रहने वाले थे वह पेशे से एक फ़ौजी थे. वो 19 वीं सदी के पूर्वार्ध में किसी समय भारत आए थे.
वो भारत की 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेज़ों की तरफ़ से लड़े थे जंग में उनकी क़ाबिलियत से ख़ुश होकर उन्हें मेरठ के क़रीब जागीर दी गई थी इसे सरधना जागीर कहा जाता था.
अंग्रेज़ और कम्यूनिस्ट होने का तमग़ा
उस जागीर के अलावा आग़ा सैय्यद मोहम्मद शाह को ब्रिटिश सरकार की तरफ़ से नवाब जान फिशानी की उपाधि भी दी गई.
नसीरुद्दीन शाह के पिता अली मोहम्मद शाह ने अपने देश अफ़ग़ानिस्तान से संबंध बांधे रखे थे, जब अफ़ग़ानिस्तान के बादशाह अमानुल्लाह ख़ान देश छोड़कर ब्रिटेन गए तो नसीरुद्दीन शाह के पिता भी उस क़ाफ़िले में शामिल थे. वह अफ़ग़ानिस्तान के बादशाह की बेटी को अंग्रेज़ी सिखाने के लिए रखे गए थे और कुछ अर्से के बाद वह भारत वापस आ गए.
नसीरुद्दीन शाह पिता की सरकारी नौकरी की वजह से भारत के कई शहरों और देहाती इलाक़ों में रहे.
उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से शिक्षा हासिल की जहां वह अपनी पहली पत्नी परवीन के इश्क़ में पड़े.
अलीगढ़ यूनिवर्सिटी की यादों में वो लिखते हैं कि आप सिर्फ़ कुर्ते और पतलून में हॉस्टल से बाहर नहीं जा सकते थे, शेरवानी या पेंट शर्ट पहनना ज़रूरी होता था, इसी तरह शेरवानी के साथ टोपी ज़रूरी थी.
हर तरफ़ से सलाम, सलाम की आवाज़ें आती थीं, जो लोग ऊंची आवाज़ में दूसरों को सलाम नहीं करते थे या नमाज़ में ख़ुशदिली से शामिल नहीं होते थे उन पर फ़ौरन 'कम्युनिस्ट' का लेबल लगा दिया जाता था.
दूसरी ख़ास रिवायत यह थी कि अंग्रेज़ी बोलने वाले विद्यार्थियों को ईस्ट इंडिया कंपनी का नाम देकर उनका अलग वर्ग बना दिया जाता था.
भारत के बंटवारे के समय नसीरुद्दीन शाह के माता-पिता पाकिस्तान नहीं गए लेकिन इस बंटवारे से जो ख़ानदान बटे उस तकलीफ़ और दर्द को उन्होंने भी नज़दीक से महसूस किया.
भारत में रोकने के लिए की परवीन से शादी
अपनी पहली पत्नी परवीन मुराद के बारे में लिखते हैं कि जब वह पांच साल की थीं तो माता-पिता अलग हो गए और पिता बेटी को लेकर पाकिस्तान चले गए और इस तरह परवीन का बचपन कराची में गुज़रा जिसके बाद वह एजुकेशन वीज़े पर माता के साथ रहने भारत आ गई थीं. यहां रुकने के लिए वो एक विभाग के बाद दूसरे विभाग में दाख़िला लेती थीं.
नसीरुद्दीन शाह और परवीन मुराद की उम्र में साढ़े 14 वर्ष का अंतर था.
अपनी शादी का ज़िक्र करते हुए लिखते वो हैं, ''उन दिनों पाकिस्तान और भारत के बीच बहुत तनाव था, इस तनाव की वजह से दोनों तरफ़ शक बहुत ज़्यादा था, बांग्लादेश का विवाद शुरू हो चुका था और पाकिस्तान का ख्याल था कि मुक्तिवाहिनी के ज़रिए भारत वहां दंगों को हवा दे रहा है. भारत के दौरे पर आये हुए पाकिस्तानियों को पंजीकरण कराना पड़ता था और पुलिस स्टेशन में हफ़्ते में एक बार रिपोर्ट करने के लिए पाबंद किया जाता था."
"परवीन भी पाकिस्तानी ही थीं, उनका वीज़ा ख़त्म होने के संबंध में एक नोटिस भी जारी कर दिया गया था मगर परवीन को भारत में रहना था जो किसी भी भारतीय के साथ शादी करके ही हो सकता थी इसलिए अपनी मोहब्बत को भारत में रोकने के लिए उनसे शादी करने का फ़ैसला कर लिया."
नसीरुद्दीन शाह और परवीन मुराद की शादी ज्यादा समय तक नहीं टिक सकी और वो उनकी बेटी हिबा शाह को लेकर लंदन शिफ़्ट हो गईं.
हिबा शाह बाद में बॉलीवुड की अदाकारा बनीं.
हिंदू लड़की से शादी
नसीरुद्दीन शाह ने दूसरी शादी थियेटर और फ़िल्म की अदाकारा रत्ना पाठक से की.
उन्होंने अपनी आत्मकथा को अपने बेटों को समर्पित किया है और लिखा है कि यह दोनों लोग इस किताब में कहीं नज़र नहीं आएंगे लेकिन इनकी माँ से मुलाक़ात और शादी का ज़िक्र विस्तार से मौजूद है.
नसीरुद्दीन शाह लिखते हैं, "मैंने पहली बार जब अम्मी से इस बात का ज़िक्र किया था कि वह एक हिंदू लड़की से शादी करने का इरादा कर रहे हैं तो उन्होंने पूछा कि तुमने क्या उसको इस्लाम क़ुबूल करने को कहा है, क्या वह इस्लाम क़ुबूल करने पर तैयार है?"
"मैंने अम्मी से कहा कि नहीं मैं रत्ना को इस्लाम क़ुबूल करने को बिल्कुल नहीं कहूंगा मेरे इस जवाब पर अम्मी ने मेरी तरफ़ देखा और आहिस्ता आहिस्ता अपने सिर को कुछ देर तक हिलाती रहीं. मौन सहमति की तरह उस दिन मुझे लगा कि अम्मी ने रत्ना से मेरी शादी वाली बात को नापसंद नहीं किया."
नसीरुद्दीन शाह के बड़े भाई ज़मीरुद्दीन शाह भारतीय फ़ौज के उप सेनापति तैनात हुए और बाद में अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बने. इसके अलावा कई भतीजे भांजे और दूसरे रिश्तेदार फ़ौज और इंडियन सिविल सर्विस में रहे.
नसीरुद्दीन शाह फ़िल्म फ़ेयर अवॉर्ड और नेशनल फ़िल्म अवार्ड ले चुके हैं. इसके अलावा भारत सरकार उन्हें पद्मश्री और पद्मभूषण अवॉर्ड दे चुकी है.
उनकी गिनती उन कलाकारों में होती है जो भारत की धर्मनिरपेक्ष पहचान में यक़ीन रखते हैं.
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