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नागरिकता संशोधन विधेयक: नीतीश कुमार से सेक्युलर हल्ला बोल की उम्मीद कितनी सही?- नज़रिया
- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का अपनी बातों से पलट जाना या अपने घोषित स्टैंड से यू-टर्न ले लेना अब शायद ही किसी को चौंकाता है.
ऐसा इसलिए, क्योंकि इनकी राजनीति के दो परस्पर विरोधी पहलू बार-बार उभर कर सामने आ जाते हैं.
यानी एक तरफ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सहारे राज्य की सत्ता में बने रहना और दूसरी तरफ़ सेक्युलर राजनेता वाला तेवर भी दिखाते रहना.
नीतीश कुमार के सियासी रंग बदलने का एक ताज़ा नमूना इन दिनों चर्चा में है.
हाल तक जिस नागरिकता संशोधन विधेयक (कैब) के विरोध में वह बोलते आ रहे थे, अब अचानक उसके समर्थन में उतर आए हैं.
इस तरह स्टैंड बदलना उनके दो करीबी सहयोगियों को नहीं सुहाया. जेडीयू के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर और पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन वर्मा ने दलीय नेतृत्व के इस बदले रुख़ पर अपने एतराज़ को सार्वजनिक कर दिया.
पार्टी नेताओं की अहसमति के मतलब
लेकिन सवाल यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ जेडीयू की सत्ता की दोस्ती में सेक्युलर रुझान की हैसियत है ही कितनी?
धारा 370, तीन तलाक़ और राम मंदिर से लेकर नागरिकता संशोधन बिल तक, जो भी मुद्दा बीजेपी के अनुकूल और मुस्लिम समाज के प्रतिकूल माना गया, उसे लेकर जेडीयू की सेक्युलर कूद-फांद अंतत: ऐन मौक़े पर मंद पड़ती गयी.
जेडीयू की सियासी धारा में मौसमी ज़रूरत के तहत जोड़े गए पवन वर्मा और प्रशांत किशोर भी समझ ही रहे होंगे कि विचारधारा की बलि लिए बिना अब 'सत्तादेवी' प्रसन्न नहीं होती.
लोग तो ये भी शंका ज़ाहिर करने लगे हैं कि नीतीश कुमार की अनुमति या सहमति से ही उनके दोनों बौद्धिक सलाहकार और प्रवक्ता ने पार्टी लाइन से अलग बयान दिये होंगे.
शायद यह सोच कर कि विपक्षी जमातों, ख़ासकर मुस्लिम समाज में इस कारण जेडीयू के ख़िलाफ़ रोष को नरम किया जा सके.
या यह भी कि इसे सत्तालोभ में संपूर्ण समर्पण नहीं, भविष्य में इरादा बदलने का भी इशारा समझा जाए.
हालाँकि मेरे ख़याल से इस बात में ज़्यादा दम है कि नीतीश कुमार के निर्णय पर सवाल उठा कर पवन वर्मा और प्रशांत किशोर ने दलीय दायरे से बाहर अपनी स्वतंत्र चेतना का संकेत दिया है.
वैसे इसकी पुष्टि तब होगी, जब इन दोनों के प्रति नीतीश कुमार की नाराज़गी किसी-न-किसी रूप में ज़ाहिर हो. परोक्ष रूप से इस दिशा में कुछ बातें छन-छन कर बाहर आ भी रही हैं.
जैसे कि पार्टी की मुख्य धारा के दो प्रमुख नेता और नीतीश के बेहद करीबी राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह और आरसीपी सिंह (दोनों सांसद) इस बाबत पवन और प्रशांत की सार्वजनिक बयानबाज़ी पर ख़फ़ा बताए जाते हैं.
नीतीश के सामने 'शाही शर्त'
जो भी हो, मूल बात यहाँ दूसरी है. असली सवाल तो नीतीश कुमार का वह राजनीतिक रवैया बना है, जो उनकी विश्वसनीयता पर ही चोट करता है.
लेकिन ग़ौरतलब ये भी है कि अपने इसी राजनीतिक रवैये के साथ नीतीश कुमार बिहार में अपनी सत्ता के चौदहवें साल में हैं और उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा.
सीधी बात ये है कि बीजेपी से तालमेल बिठा कर एक और टर्म यहाँ राज्य की सत्ता पर क़ायम रहने के लिए उन्हें जो सही लग रहा है, वो कर रहे हैं.
जब मुसलमानों के वोट के भरोसे उन्हें रहना नहीं है और हिंदुत्व वाली राष्ट्रवादी बयार ही उन्हें अपने सियासी हक़ में जान पड़ती है, तो सेक्युलर-सेक्युलर खेलते रहने से क्या फ़ायदा?
आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को बीजेपी से, यानी अमित शाह और नरेंद्र मोदी से दिल मिला कर ही अपने दल के लिए अधिक-से-अधिक सीटें हथियानी हैं.
इस चुनाव में बीजेपी से ज़्यादा सीटें नहीं लाएँगे तो राज्य के सत्ता-शीर्ष पर फिर बैठने का उनका दावा ख़तरे में पड़ सकता है.
इसलिए नागरिकता संशोधन बिल के पक्ष में डट कर खड़ा रहने की 'शाही शर्त' पर नीतीश को अपना स्टैण्ड बदलना पड़ा है. पहले भी अन्य ऐसे मुद्दों पर वो अपना रुख़ बदलते ही रहे हैं.
बीते लोकसभा चुनाव में तो बीजेपी की सलाह पर इन्होंने अपने दल का चुनावी घोषणापत्र जारी करना टाल दिया, क्योंकि उसमें दल के घोषित सेक्युलर इरादों का उल्लेख करना पड़ता.
जो नीतीश कुमार बीच में कुछ समय के लिए बीजेपी को झटक कर लालू प्रसाद से गलबहियां कर लेने और फिर पलट जाने वाला दृश्य लोगों को दिखा चुके हैं, उनसे खुल कर सेक्युलर हल्ला बोल की उम्मीद कोई क्यों कर रहा है?
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)
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