नागरिकता संशोधन विधेयक: राज्यसभा में कहां बिगड़ा विपक्ष का गणित

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नागरिकता संशोधन बिल 2019 बुधवार को राज्यसभा में भी पारित हो गया. लोकसभा में इसे पहले ही मंज़ूरी मिल चुकी है.
संसदीय कार्यमंत्री प्रह्लाद जोशी ने बताया कि उच्च सदन में 125 सदस्यों ने बिल के पक्ष में जबकि 99 सांसदों ने विरोध में अपने मत दिए.

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शिवसेना ने क्या बोल कर विधेयक को समर्थन नहीं दिया?
वोटिंग के दौरान शिवसेना के सदस्य अनुपस्थित रहे.
शिवसेना ने लोकसभा में बिल का समर्थन किया था लेकिन राज्यसभा में पार्टी ने बायकॉट किया. शिवसेना नेता संजय राउत ने इससे पहले कहा था कि उनकी पार्टी राज्यसभा में बिल का समर्थन तभी करेगी जब उन्हें उनके सारे सवालों के जवाब मिलेंगे.
संजय राउत ने कहा कि राज्यसभा, लोकसभा से बिल्कुल अलग है. उन्होंने वोटिंग का बायकॉट करते हुए कहा, "लोकसभा का गणित अलग है और राज्यसभा का अलग. वोट बैंक की राजनीति ठीक नहीं है."
उन्होंने कहा कि शिवसेना अगर बिल के पक्ष में वोट नहीं कर रही तो विरोध में भी नहीं करेगी.
ऐसा माना जा रहा था कि विपक्ष मज़बूती से खड़ा रहेगा लेकिन शिवसेना का बायकॉट करना उसे भारी पड़ा. हालांकि सदन की कार्यवाही समाप्त होने के बाद कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने शिवसेना के राज्यसभा में उठाए कदम की तारीफ़ की. शिवसेना ने लोकसभा में बिल के पक्ष में वोट दिया था.
पीटीआई की ख़बर के अनुसार, बीजेपी बहुत पहले से सुनिश्चित थी कि उसे 124 से 130 वोट मिलेंगे ही. सदन में 240 सदस्य मौजूद थे.
टीआरएस के छह सदस्यों ने राज्यसभा में बिल के विरोध में वोट किया.

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विधेयक पर समर्थन में कौन कौन पार्टी?
बीजेपी की गठबंधन पार्टी जेडीयू के छह और अकाली दल के तीन सदस्यों के अलावा एआईएडीएमके के 11 सांसदों, बीजेडी के सात, वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के दो और टीडीपी के दो सदस्यों ने बिल के समर्थन में वोट किया. खुद बीजेपी के राज्यसभा में 83 सदस्य हैं.
सात निर्दलीय और निर्वाचित सदस्यों ने भी बिल के समर्थन में वोट किया.
विरोध में वोट डालने वालों में कांग्रेस, टीएमसी, बीएसपी, सपा, डीएमके, आरजेडी, लेफ़्ट, एनसीपी और टीआरएस के सदस्यों ने वोट किया.
विधेयक पर चर्चा के दौरान कई संशोधन प्रस्ताव रखे गए लेकन उन्हें ख़ारिज कर दिया गया. यहां तक कि इसे सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने के प्रस्ताव पर भी वोटिंग कराया गया. उसे भी बहुमत से ख़ारिज कर दिया गया. इसके समर्थन में 99 वोट पड़े, जबकि सेलेक्ट कमेटी में भेजने के ख़िलाफ़ 124 सदस्यों ने मतदान किया.
इस संशोधन विधयक के जरिए नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन करते हुए अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के छह समुदायों (हिन्दू, सिख, बुद्ध, जैन, पारसी और ईसाई) के अवैध प्रवासियों को भारत की नागरिकता देने की पात्रता प्रदान की गई है.

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अमित शाह ने क्या कहा?
राज्यसभा में विधयक के संदर्भ में गृहमंत्री अमित शाह ने इस बात पर जोर दिया कि यह संशोधन बिल कहीं से भी मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं है. उन्होंने कहा कि किसी भी मुसलमान को डरने की ज़रूरत नहीं है.
इस संशोधन बिल के विरोध में पूर्वोंत्तर राज्यों में बीते कुछ दिनों से प्रदर्शन हो रहे हैं.
पूर्वोत्तर राज्यों की आशंकाओं को दूर करते हुए अमित शाह ने कहा कि इस बिल से किसी के भी हित प्रभावित नहीं होंगे. उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार उनकी सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है.
गृह मंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि यह यह नया क़ानून उन लोगों के लिए राहत लेकर आएगा जिनका पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश में उत्पीड़न किया गया है.
इस तरह नागरिकता संशोधन विधेयक को दोनों सदनों की मंज़ूरी मिल गई है.

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पीएम मोदी ने भी दिया भरोसा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गुरुवार को पूर्वोत्तर के लोगों से अपील करते हुए कहा कि केंद्र सरकार उनके हितों के लिए हमेशा खड़ी है.
उन्होंने ट्वीट कर लिखा, "मैं असम के अपने भाई बहनों को यह आश्वस्त करता हूं कि उन्हें कैब के पास होने पर चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. मैं लोगों को आश्वस्त करना चाहता हूं कि आपके अधिकार, विशिष्ट पहचान और खूबसूरत संस्कृति को आपसे कोई छीन नहीं सकता. यह पहले की तरह ही चलता रहेगा और विकसित होता रहेगा."
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उन्होंने एक और ट्वीट में लिखा, "केंद्र सरकार और मैं पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं कि असम के लोगों के राजनीतिक, भाषाई, सांस्कृतिक और ज़मीन के अधिकार को संविधान के क्लॉज़ 6 की मूल भावना के अनुसार रक्षा की जाएगी."
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क्या है नागरिकता संशोधन विधेयक 2019?
इस विधेयक में बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के छह अल्पसंख्यक समुदायों (हिंदू, बौद्ध, जैन, पारसी, ईसाई और सिख) से ताल्लुक़ रखने वाले लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रस्ताव है.
मौजूदा क़ानून के मुताबिक़ किसी भी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना अनिवार्य है. इस विधेयक में पड़ोसी देशों के अल्पसंख्यकों के लिए यह समयावधि 11 से घटाकर छह साल कर दी गई है.
इसके लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 में कुछ संशोधन किए जाएंगे ताकि लोगों को नागरिकता देने के लिए उनकी क़ानूनी मदद की जा सके.
मौजूदा क़ानून के तहत भारत में अवैध तरीक़े से दाख़िल होने वाले लोगों को नागरिकता नहीं मिल सकती है और उन्हें वापस उनके देश भेजने या हिरासत में रखने के प्रावधान है.
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