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कश्मीर की राजनीतिक शून्यता पर क्या कह रहे हैं विश्लेषक
जम्मू-कश्मीर से 5 अगस्त को धारा 370 हटाए जाने के बाद से आम जनजीवन बुरी तरह प्रभावित है.
राज्य में अब भी संचार की सुविधा बाधित है. आम लोग दुकानें नहीं खोल पा रहे हैं, बच्चे स्कूल नहीं भजे जा रहे और लोगों को ठीक से इलाज मुहैया नहीं हो पा रहा है.
बीते करीब 50 दिनों से जम्मू-कश्मीर में मुख्यधारा के राजनेता नज़रबंद हैं या हिरासत में हैं. कश्मीर जाने तक के लिए नेताओं को सुप्रीम कोर्ट की इजाज़त लेनी पड़ रही है.
अलगाववादी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नेता भी नज़रबंद हैं. इस सबके बीच जम्मू-कश्मीर में एक राजनीतिक शून्य जैसी स्थिति बन गई है.
इस मुद्दे पर शनिवार (21 सितंबर) को बीबीसी हिंदी के रेडियो कार्यक्रम 'इंडिया बोल' में चर्चा हुई और पूरे देश भर से लोगों ने अपनी राय रखी. साथ ही कश्मीर टाइम्स की एग्जिक्यूटिव एडिटर अनुराधा भसीन ने भी हालात का विश्लेषण किया. यहां पढ़िया पूरी चर्चा के अंश-
मुख्यधारा के नेताओं की भूमिका
अनुराधा भसीन का मानना है जम्मू-कश्मीर में जो हुआ है उसका तरीका सही नहीं है. यहां के राजनीतिक दलों का अपना महत्व है.
वह कहती हैं, ''जो कुछ हो रहा है या जिस तरह से हुआ है, ये किसी भी प्रजातंत्र के लिए सही नहीं है. क्योंकि प्रजातंत्र में शक्ति लोगों के पास होती है और इसमें सियासी दल एक अहम कड़ी का काम करते हैं. आज पूरे जम्मू-कश्मीर में जितनी भी राजनीतिक आवाजें हैं उन्हें बंद कर दिया गया है.''
''छोटे-बड़े जो भी राजनीतिक दल हैं जब वो यहां मुख्यधारा की राजनीति में उतरते हैं तो भारतीय संविधान और भारतीय होने की बात ही कहते हैं. हिंदुस्तान का झंडा उनकी वजह से आज तक लहराता रहा है. उसके पीछे सिर्फ़ सुरक्षा बल ही कारण नहीं हैं.''
वहीं, भारत प्रशासित कश्मीर से वरिष्ठ पत्रकार ताहिर मोईनुद्दीन का कहना है कि यहां के राजनीति केंद्र सरकार और जनता के बीच पुल का काम करते थे लेकिन अब इसकी कमी हो गई है.
ताहिर मोईनुद्दीन ने कहा, ''कश्मीर में आवाम को मुख्यधारा की राजनीति से कई तरह की शिकायते हैं लेकिन मुख्यधारा के नेता भारत सरकार और आवाम के बीच एक बफ़र का काम कर रहे थे. लोगों को जो भी शिकायत या मसले होते थे उसके लिए वो मुख्यधारा के नेताओं के पास जाते थे. मुख्यधारा वाले प्रशासन के साथ मिलकर उनको राहत देने का काम करते थे. दूसरा उनका दिल्ली से भी संपर्क रहता था. लेकिन, अब ये बफ़र या एक पुल बीच में नहीं है.''
''इस वक़्त बड़ी अजीब स्थिति है कि एक तरफ़ चरमपंथी हैं और दूसरी तरफ़ भारतीय सेना. अब दोनों आमने-सामने हैं बीच में कोई बफ़र नहीं है. इन हालातों में अतिवाद में इज़ाफ़ा हो सकता है.''
क्या बाहर से आएंगे नेता
लेकिन, कश्मीर के हालात को लेकर सरकार के अपने तर्क हैं. सरकार कह रही है कि कश्मीर एक बहुत ही संवेदनशील इलाक़ा है और वहां विरोध प्रदर्शनों में लोगों की जानें भी जाती रही हैं. इस बार कम से कम जान-माल का नुक़सान नहीं हुआ और फिर सरकार के पास दूसरा क्या रास्ता था.
इस पर अनुराधा भसीन कहती हैं कि आप किसी इलाक़े में एक फैसला लेकर जा रहे हैं और वो इतना अलोकप्रिय है कि आपको वहां के लोगों को, तमाम नेताओं को जेलों में बंद करना पड़ रहा है. वो क़दम ही जनतंत्र के हित में नहीं है. आपने लोगों की राय लिए बिना इतना बड़ा फ़ैसला किस बुनियाद पर लिया.
वहीं, राजनीतिक विज्ञानी प्रोफे़सर नूर अहमद बाबा संदेह जताते हैं कि इस क़वायद के ज़रिए बाहर से जम्मू-कश्मीर पर नेता थोप दिए जाएंगे.
वह कहते हैं, ''जब आप पूरी तरह बंद लागू करते हैं तो उससे एक ख़तरनाक शून्य पैदा होता है. एक तरह की अराजकता पैदा करते हैं. ऐसा लगता है कि कुछ लोग यहां-वहां से लाकर थोप दिये जाएंगे. ये एक दमन का तरीका होगा. उससे नाराज़गी और अविश्वास पैदा होगा.''
अनुराधा भसीन ने भी ये माना कि जब मुख्यधारा के सभी नेताओं की गतिविधियों पर रोक लगाई गई है उसी समय बीजेपी के नेताओं की राजनीतिक सक्रियता बढ़ गई है. सिर्फ़ एक ही पार्टी के लिए राजनीति करने की जगह बची है.
क्या कहते हैं लोग
इस पूरे मसले पर देश के अलग-अलग राज्यों से भी लोग ने अपनी राय रखी. किसी ने कश्मीर के हालात सुधारने की बात कही तो किसी ने कहा कि बड़े बदलावों में कुछ परेशानियां तो आती ही हैं. उन्हें सहन करना चाहिए.
महाराष्ट्र से अरुण दवे ने कहा, ''इस शून्य को बने हुए बहुत दिन हो गए हैं. लोगों थोड़ी रियायत देनी चाहिए.''
उत्त प्रदेश में ज़िला फ़र्रुखाबाद से राजेश कुमार वर्मा ने कहा, ''कश्मीर में ग़रीब लोगों के लिए कोई साधन होना चाहिए.''
राजस्थान में कोटा से सूरज सिंह यादव कहते हैं, ''सालों से वहां भारी हिंसा हो रही थी. उसके समाधान के लिए लोगों को कुछ परेशानी तो झेलनी पड़ेगी.''
कस्बा पुर्णिया बिहार से एमडी अहरावदम ने कहा कि कश्मीर की समस्या को सुलझाया जाना चाहिए. पाकिस्तान कश्मीर को न देखे, वो भारत का है और भारत का ही रहेगा. मैं दुआ करता हूं प्रधानमंत्री जी से कि कश्मीर का दिल जीते हैं और अमन व शांति हो.
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