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देश में पुलिसकर्मियों के 5 लाख पद ख़ाली, सरकारें भर क्यों नहीं रहीं?: नज़रिया
- Author, प्रकाश सिंह
- पदनाम, पूर्व आईपीएस अधिकारी, बीबीसी हिंदी के लिए
गृह मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें उसने बताया है कि देश के अलग-अलग राज्यों में करीब 5.28 लाख पुलिसकर्मियों के पद खाली हैं, इनमें से सबसे ज़्यादा पद उत्तर प्रदेश और बिहार में खाली हैं.
उत्तर प्रदेश में 1.29 लाख पद खाली हैं तो बिहार में यह संख्या करीब 50 हज़ार और पश्चिम बंगाल में 49 हज़ार.
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार सभी राज्यों में पुलिस बलों के स्वीकृत पद 23 लाख 79 हजार 728 हैं, जिनमें से 18 लाख 51 हज़ार 332 पद एक जनवरी 2018 तक भर लिए गए थे.
मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक फिलहाल सभी राज्यों में कुल 5 लाख 28 हज़ार 396 पद खाली पड़े हैं.
इन आंकड़ों की संजीदगी समझने से पहले यह समझना होगा कि देशभर में पुलिसकर्मियों की जितनी संख्या होनी चाहिए थी, उतनी नहीं है.
यह भी समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय मानक क्या हैं और भारत उसकी तुलना में कहां खड़ा है. अंतरराष्ट्रीय मानक के मुताबिक प्रति एक लाख लोगों पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए.
जबकि भारत में जो स्वीकृतियां हैं वो 182 पुलिसकर्मी प्रति लाख की है. यह संख्या भी पूरी तरह भरी नहीं है. जमीन पर यह मापदंड 139 की ही है.
यानी भारत में एक लाख लोगों की सुरक्षा के लिए महज 139 पुलिस बल मौजूद हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि बड़ी संख्या में पद खाली हैं, जिसका ज़िक्र गृह मंत्रालय ने अपनी हालिया रिपोर्ट में किया है.
मंत्रालय ने जिस 5.28 लाख खाली पदों की बात की है, उसे अगर भर भी दिया जाए तो भी देश अंतरराष्ट्रीय मानकों को पूरा नहीं कर पाएगा.
कुल मिलाकर पुलिस के सामने जो सबसे बड़ी समस्या है वो है संख्या बल की. देश में अंतरराष्ट्रीय मानक से प्रति लाख लोगों पर 83 पुलिसकर्मियों की कमी है.
असर
कम संख्या बल का सबसे पहला असर पुलिस के कामकाज पर पड़ता है. कभी-कभी देखा गया है कि थानों में विपरीत परिस्थितियों के वक़्त पुलिस कम पड़ जाते हैं. ऐसी स्थिति में रिज़र्व पुलिस बल की मांग की जाती है. वो भी उपलब्ध नहीं हो पाई तो केंद्रीय रिज़र्व पुलिस को तैनात करना पड़ता है.
संख्या बल के अलावा पुलिस के सामने संसाधनों की भी घोर कमी है. संसाधन से मेरा मतलब ट्रांसपोर्टेशन, कम्यूनिकेशन, फ़ोरेन्सिक सपोर्ट आदि से है.
संख्या बल बहुत ही मूलभूत ज़रूरत है, इसके बाद ही संसाधनों पर बात की जा सकती है.
अपराध की समस्या दिनों-दिन जटिल होती जा रही हैं. हमलोगों के वक़्त में हत्या और डकैती को बहुत बड़ा अपराध समझा जाता था.
अब आंतकवाद की समस्या एक बड़ी चुनौती है, जो पहले थी ही नहीं. फिर संगठित अपराध शुरू हो गए. संगठित अपराध से मेरा मतलब ड्रग और हथियार की तस्करी, मनी लॉन्ड्रिंग, साइबर क्राइम आदि से है.
यह पहले नहीं हुआ करते थे. होता भी था तो मामले बहुत कम हुआ करते थे, अब ये अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए जा रहे हैं.
अपराधों का विस्तार और जाल दिनों दिन लंबा हो रहा है. ऐसे में अगर स्थानीय पुलिस सशक्त नहीं हुई तो इन समस्याओं से उनके लिए निबट पाना मुमकिन नहीं होगा.
अगर संख्या बल सुधार भी लिया जाता है तो उसे बेहतर काम करने के लिए संसाधनों की ज़रूरत होगी, जैसे बेहतर गाड़ी, तकनीक की ट्रेनिंग, ख़ुफ़िया तंत्र, फॉरेंसिक जांच इत्यादि.
पद खाली क्यों?
अब सवाल उठता है कि इनती बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों के पद खाली क्यों हैं?
तो इसका बहुत ही सरल जवाब है- सरकार की इच्छा शक्ति और बजट की कमी.
कानून-व्यवस्था का मामला राज्य सरकार के अधीन होता है. कई राज्यों का कहना है कि उनके पास पैसा नहीं है. कुछ हद तक यह बात सही भी है.
दूसरी बात यह है कि कई सरकारें पुलिस पर ज़्यादा खर्च नहीं करना चाहती हैं. वो इसकी जगह पर शिक्षा, कृषि, सड़क की बेहतरी पर खर्च करना चाहती हैं ताकि जनता को बदलाव दिखे और चुनावों में इसका फ़ायदा मिल सके.
सरकारों को यह समझना होगा कि पुलिस की बेहतरी पर खर्च करना भविष्य की चुनौतियों से निबटने जैसा है.
सुधार के लिए क्या हुआ अब तक?
एक भूतपूर्व पुलिस महानिदेशक के तौर पर मेरा यह मानना है कि जिस देश में कोई नई समस्या उभरी हो और उससे निबटने में पुलिस सक्षम महसूस नहीं कर रही है तो माना जा सकता है कि दक्षता बढ़ाने की ज़रूरत है.
लेकिन झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार जैसे राज्यों में नक्सल की समस्या दशकों से है और अभी भी केंद्रीय बलों की मदद के बिना राज्य पुलिस का काम नहीं चलता है तो राज्य सरकारों को इस पर संजीदगी से सोचना चाहिए.
राज्य सरकारें अक्सर केंद्र पर कानून-व्यवस्था में हस्तक्षेप करने के आरोप लगाती रहती हैं, लेकिन वे खुद अंदरुनी समस्या से निबटने के लिए पुख्ता कदम नहीं उठाती हैं. यह बिल्कुल इच्छा शक्ति का मामला है.
मैंने साल 1996 में पुलिस सुधारों के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका डाली थी. इसमें मैंने पुलिस के काम की प्रणाली और स्वायतत्ता दिए जाने की मांग की थी.
अगर आप संख्या बल में सुधार ले आते हैं, संसाधन भी बढ़ा देते हैं लेकिन काम करने की स्वायतत्ता नहीं देते हैं तो सबकुछ निरर्थक साबित होंगे.
साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फ़ैसला सुनाया और सुधारों के आदेश दिए. लेकिन इस पर क्या हुआ, क्या यह लागू हो पाया? 13 साल बाद भी क्या कुछ बदला है, यह देखने की बात है.
समाधान
अगर समाधान की बात करें तो उन चीजों पर बात की जानी चाहिए जो आसानी से पहले किए जा सकते हैं, उसके बाद तकनीकी चीजों पर ध्यान दिया जा सकता है.
रिक्तियां भरने में न गृह मंत्रालय को कोई परेशानी है और न ही राज्य सरकारों को. जिन राज्यों को बजट की परेशानी है, उसे केंद्र से मदद दी जानी चाहिए.
और दूसरा कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान देने की ज़रूरत है, मसलन ट्रांसपोर्ट सिस्टम, कम्यूनिकेशन और फॉरेंसिक सपोर्ट को दुरुस्त किए जाने की ज़रूरत है.
(बीबीसी संवाददाता अभिमन्यु कुमार साहा से बातचीत पर आधारित)
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