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लालू यादव की आरजेडी को कहां ले जाएंगे तेजस्वी?- नज़रिया
- Author, मणिकांत ठाकुर
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
बिहार में लालू यादव के राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) पर तेजस्वी यादव का नेतृत्व रूपी नियंत्रण एक ही चुनावी झटके में लड़खड़ाया हुआ-सा दिखने लगा है.
पार्टी के जिन नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने उन्हें लालू यादव की राजनीतिक विरासत संभालने में सक्षम मान कर अपना नेता क़बूला था, उन्हें ज़्यादा निराशा हुई है.
आरजेडी का यह युवा हीरो लोकसभा चुनाव की परीक्षा में ज़ीरो अंक लाएगा और तब अचानक सियासी परिदृश्य से खुद को ओझल कर लेगा, ऐसा किसी ने शायद ही सोचा होगा.
उनका इस तरह रहस्यपूर्ण तरीक़े से महीना भर अज्ञातवास पर रहना, उनके सियासी सरोकार ही नहीं, उनकी नेतृत्व-क्षमता पर भी कई सवालों को जन्म दे चुका है.
इस ग़ैरमौजूदगी को 'रहस्यपूर्ण' इसलिए कहा जा रहा है, क्योंकि महीना बीत जाने के बाद अब उन्होंने ट्वीट कर के यह ख़ुलासा किया है कि लिगामेंट में चोट का वह इलाज़ करा रहे थे.
ताज्जुब है कि इतनी-सी बात को इतने लंबे समय तक उन्होंने सब से छिपाया और फिर भी यह नहीं बताया कि दरअसल वो अभी भी हैं कहाँ या अबतक थे कहाँ! जानकार बता रहे हैं कि उनकी इस 'मामूली बीमारी' का इलाज़ तो पटना में भी हो सकता था.
मुज़फ़्फ़रपुर त्रासदी
आरजेडी के प्राय: सभी छोटे-बड़े नेता बार-बार पूछे जा रहे इस सवाल से परेशान होते रहे कि तेजस्वी कहाँ हैं?
किसी ने सीधा जवाब नहीं दिया. सिर्फ़ रघुवंश प्रसाद सिंह ने एकबार संकेत में ही कहा था कि हो सकता है क्रिकेट में रुचि के कारण तेजस्वी वर्ल्ड कप मैच देखने लंदन गए हों.
इस बीच, कई ऐसे राजनीतिक या सार्वजनिक मसले उभरे, जिन पर उनकी राय या प्रतिक्रिया उनके ही हक़ में होती.
ख़ासकर ऐसे समय, जब जानलेवा दिमाग़ी बुख़ार से मर रहे बच्चों को ले कर शोकाकुल बिहार में हाहाकार मचा हो, तब राज्य के प्रतिपक्ष का नेता कहीं नज़र न आए, तो इसे क्या माना जाए?
बच्चों की मौत पर राज्य की नीतीश सरकार ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार भी जिस समय गंभीर सवालों/आलोचनाओं से घिरी थी, उस समय यहाँ का नेता-प्रतिपक्ष अपना दायित्व और ज़रूरी भूमिका निभाने से क्यों चूका?
बिहार विधानसभा का सत्र
आरजेडी के बाक़ी नेता इस बाबत मजबूरी में या खानापुरी की शक्ल में जो कुछ कर सकते थे, करते रहे. लेकिन अंदर से ये लोग कितने व्यथित थे, इसका अंदाजा 'तेजस्वी कहाँ हैं' वाले सवाल पर इनकी झुँझलाहट से लग जाता था.
इतना ही नहीं, इसी बीच बिहार विधानसभा का सत्र शुरू हो गया और सदन में विरोधी दलों के नेता तेजस्वी यादव फिर भी नहीं दिखे. दिखा उनका ट्वीट, कि 'जल्दी आ रहा हूँ और तब अपने ग़ायब रहने को लेकर मीडिया की गढ़ी हुई मसालेदार कहानी भी सुनूँगा.'
ये तो सचमुच हद हो गयी. इतने गंभीर और स्वाभाविक रूप से उपजे प्रश्न को भी अगर तेजस्वी बच्चों के खेल वाले सवाल की तरह हलके में लेंगे तो अपने पिता से जुड़ी पार्टी को वह कहाँ पहुँचाएँगे?
ज़ाहिर है कि इनके हालिया रवैये से आरजेडी का सियासी वज़न घटा है. यानी गत लोकसभा चुनाव में मिली पराजय से पार्टी को उबारने वाला नेतृत्व ही पार्टी की नज़र से उतरता हुआ लग रहा है.
तेजस्वी की प्राथमिकता सूची
विधानसभा में प्रतिपक्ष का नेता होने के नाते तेजस्वी यादव को कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त है. उन्हें राज्य सरकार की तरफ़ से सुरक्षाकर्मी और सहायक उपलब्ध हैं.
लेकिन हैरत वाली बात है कि ऐसा पदासीन व्यक्ति महीना भर अज्ञातवास में रह लेगा और संबंधित सरकारी महकमे को इसका कोई अता-पता नहीं होगा?
देश या विदेश में अपनी बीमारी का इलाज़ कराने तो नेता जाते रहे हैं. वो अपने रोग के बारे में न बताएँ, इसका अधिकार होता है उन्हें. पर वो हैं कहाँ, इसे गुप्त रखना तभी ज़रूरी हो सकता है, जब सुरक्षा का मामला हो.
प्रश्न यह भी है कि अपने सियासी कर्मक्षेत्र में आपदा के समय आ जाना और विधानसभा अधिवेशन में ज़िम्मेदारी निभाने के लिए मौजूद रहना क्या तेजस्वी की प्राथमिकता सूची में है?
लालू परिवार के बाहर की आरजेडी में इन दिनों अंदर से जो क्षोभ छन-छन कर बाहर आता है, उसमें तेजस्वी से मोहभंग वाला दर्द ही ज़्यादा दिखता है.
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