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लोकसभा चुनाव 2019: सुमित्रा महाजन- एक रामकथा वाचिका से लोकसभा स्पीकर तक
- Author, अनिल जैन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
आख़िरकार लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की तीन दशक लंबी संसदीय राजनीति की पारी पर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व ने पूर्ण विराम लगा ही दिया.
लोकसभा चुनाव में उम्मीदवारी हासिल करने की तमाम कोशिशें नाकाम हो जाने के बाद इंदौर की सांसद सुमित्रा महाजन ने आख़िरकार पार्टी नेतृत्व की सलाह पर अपनी विदाई का सम्मानजनक रास्ता निकालते हुए ख़ुद ही चुनाव न लड़ने का ऐलान कर दिया.
हालांकि, पार्टी नेतृत्व बहुत पहले ही उन्हें यह संकेत साफ़तौर पर दे चुका था कि इस बार पार्टी उन्हें लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनाएगी.
लेकिन महाजन उन संकेतों को नज़रअंदाज़ करते हुए टिकट हासिल करने की कोशिशों में जुटी हुई थीं.
अपनी तमाम कोशिशें नाकाम हो जाने के बाद महाजन ने शहीदाना अंदाज़ में यह ऐलान कर दिया कि पार्टी नेतृत्व उनकी उम्मीदवारी तय करने के मामले में संकोच कर रहा है. लिहाज़ा उन्होंने ख़ुद ही तय किया है कि अब वह चुनाव नहीं लड़ेंगी.
उन्होंने यह ऐलान इंदौर में मीडिया के लिए जारी एक संक्षिप्त बयान में किया.
हालांकि, पार्टी नेतृत्व की ओर से मिल रहे तमाम संकेतों के आधार पर पार्टी में बहुत पहले से ही आमतौर पर माना जा रहा था कि उम्र के लिहाज़ से पार्टी के 'मार्गदर्शक' नेताओं की श्रेणी में शुमार हो चुकीं 76 वर्षीय सुमित्रा महाजन की राजनीतिक पारी अब समाप्त हो गई है.
लेकिन ख़ुद सुमित्रा महाजन ऐसा मानने को तैयार नहीं थीं. वह ख़ुद को इंदौर में पार्टी के लिए ज़रूरी मानते हुए पिछले दो महीने से चुनाव की तैयारियों में जुटी हुई थीं.
इस सिलसिले में अपने निर्वाचन क्षेत्र के पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थक वर्गों के नेताओं से उनके मिलने-जुलने का सिलसिला जारी था.
रामकथा वाचन से हुई शुरुआत
इंदौर नगर निगम में वरिष्ठ पार्षद से लेकर शहर की उप-महापौर, केंद्रीय मंत्री और लोकसभा अध्यक्ष के पद तक पहुंचीं सुमित्रा महाजन दरअसल मूल रूप से कभी भी राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं रहीं.
महाराष्ट्र के चिपलूण कस्बे में 12 अप्रैल 1943 को एक कोंकणस्थ ब्राह्मण परिवार में जन्मीं सुमित्रा (साठे) 1965 में जयंत महाजन से ब्याह कर इंदौर आई थीं.
इंदौर में ही उन्होंने एमए और एलएलबी की पढ़ाई पूरी की. अपनी पढ़ाई के दिनों में ही वह रामायण पर रोचक अंदाज़ में प्रवचन करने वाली इंदौर की मैना ताई गोखले के संपर्क में आईं.
जब मैना ताई अपनी वृद्धावस्था के चलते बीमार रहने लगीं तो उनकी जगह प्रवचन करने का काम सुमित्रा महाजन ने संभाल लिया.
उनका यह प्रवचन कर्म ही एक तरह से उनके सार्वजनिक जीवन की शुरुआत थी.
इसी दौरान वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महिला शाखा राष्ट्र सेविका समिति और महाराष्ट्रीय महिलाओं के संगठन भगिनी मंडल में सक्रिय हुईं.
राजनीति में रखा क़दम
साल 1982 में इंदौर नगर के चुनाव में भाजपा ने बहुमत हासिल किया. इसके बाद पार्टी ने उन्हें वरिष्ठ पार्षद मनोनीत किया और 1984 में उन्हें उप-महापौर बनाया.
इसी संक्षिप्त राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ 1985 में उन्होंने इंदौर क्रमांक तीन से भाजपा के टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ा, जिसमें वह इंदौर के कांग्रेसी दिग्गज महेश जोशी से हार गईं.
चुनाव में हारने के बाद वह फिर से अपने पुराने काम प्रवचन तथा महाराष्ट्रीय ब्राह्मण समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में जुट गईं.
किसी को भी अंदाज़ा नहीं था, खुद सुमित्रा महाजन को भी नहीं कि राजनीति उनका इंतज़ार कर रही है और उसमें उन्हें लंबी पारी खेलनी है.
साल 1989 के आम चुनाव में पार्टी ने इंदौर के तमाम दिग्गज नेताओं की दावेदारी को दरकिनार कर सुमित्रा महाजन को अपना उम्मीदवार बनाया.
उनको उम्मीदवार बनाने में भाजपा के तत्कालीन प्रादेशिक अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे की अहम भूमिका रही. ठाकरे को जनसंघ के ज़माने से मध्य प्रदेश में पार्टी का पितृपुरुष माना जाता था.
सुमित्रा महाजन ने इंदौर क्षेत्र का लगातार आठ बार लोकसभा में प्रतिनिधित्व किया. उन्होंने अपने संसदीय जीवन की शुरुआत 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस के दिग्गज नेता और देश के गृह मंत्री रह चुके प्रकाशचंद्र सेठी को हराकर की.
इंदौर लोकसभा सीट पर भाजपा की यह पहली जीत थी. इससे पहले तक इस सीट को कांग्रेस की सबसे सुरक्षित सीट माना जाता था.
इतिहास रचने वाली महिला
हालांकि, दो बार इस सीट पर उसे हार का मुंह भी देखना पड़ा, लेकिन यह हार उसे जनसंघ या भाजपा से नहीं बल्कि वामपंथी और समाजवादी उम्मीदवारों से मिली थी.
पहली बार 1962 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दिग्गज नेता कॉमरेड होमी एफ. दाजी ने और दूसरी बार 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार की हैसियत से समाजवादी नेता कल्याण जैन ने कांग्रेस को हराया था.
प्रकाशचंद्र सेठी इंदौर से चार बार लोकसभा का चुनाव जीते लेकिन पांचवीं बार 1989 में कांग्रेस विरोधी लहर के चलते सुमित्रा महाजन से हार गए.
तब से अब तक महाजन ही लगातार आठ चुनाव जीतकर लोकसभा में इंदौर का प्रतिनिधित्व करती आ रही हैं.
इस दौरान वह 2002 से 2004 तक केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में राज्यमंत्री भी रहीं और 2014 में 16वीं लोकसभा की अध्यक्ष बनीं.
हालांकि, उन्हें चुनाव दर चुनाव मिली सफलता का यह मतलब कतई नहीं है कि वह अपने निर्वाचन क्षेत्र की ज़रूरतों और समस्याओं को लेकर बहुत संवेदनशील और सक्रिय रहीं.
उनकी हर जीत में उनकी पार्टी की चुनावी मशीनरी और बेहतर प्रबंधन का तो योगदान रहा ही लेकिन ज़्यादातर चुनावों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और कांग्रेस के स्थानीय नेताओं की आपसी सिर फुटौवल का भी उन्हें भरपूर फ़ायदा मिला.
जो भी हो, सुमित्रा महाजन के खाते में इस समय देश की पहली ऐसी महिला सांसद होने का गौरव दर्ज है जो अपराजित रहते हुए लगातार आठ बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुईं.
लोकसभा की सबसे उम्रदराज़ महिला सदस्य होने का गौरव भी फ़िलहाल उन्हें ही प्राप्त है.
भारी पड़ा 75 का आंकड़ा
अपनी संसदीय राजनीति के सफ़र के दौरान हर चुनाव में सुमित्रा महाजन की दावेदारी पार्टी में लगभग चुनौतीविहीन रहीं और उन्हें आसानी से टिकट मिलता रहा.
लेकिन इस बार उन्हें टिकट के लिए जबरदस्त संघर्ष करना पड़ रहा था और जिसमें वह अंतत: नाकाम रहीं.
क्योंकि पार्टी ने 75 वर्ष से अधिक की उम्र वाले नेताओं को टिकट न देने का फ़ैसला किया है.
उम्र के इसी निर्धारित मापदंड के चलते पार्टी के संस्थापकों में शुमार लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के अलावा भुवनचंद्र खंडूरी, भगत सिंह कोश्यारी, शांता कुमार और कलराज मिश्र जैसे वरिष्ठ नेताओं को भी पार्टी ने इस बार उम्मीदवार नहीं बनाया है.
ये सभी नेता 75 वर्ष की उम्र को पार कर चुके हैं.
सुमित्रा महाजन भी अपने जीवन के 77वें वर्ष में प्रवेश करने वाली हैं. इसके बावजूद वह ख़ुद को शारीरिक और मानसिक तौर पर पूरी तरह फ़िट मानते हुए अपनी दावेदारी से पीछे हटने को तैयार नहीं थीं.
उन्हें संभवत: यह भी यकीन था कि लोकसभा अध्यक्ष के रूप में उनके कामकाज से प्रधानमंत्री पूरी तरह संतुष्ट और प्रसन्न रहे हैं, लिहाज़ा उम्र का बंधन उनके आड़े नहीं आने देंगे और उन्हें टिकट मिल जाएगा.
इसी विश्वास के भरोसे वह 16वीं लोकसभा का अंतिम सत्र समाप्त होते ही अपने निर्वाचन क्षेत्र में सक्रिय हो गई थीं.
सुबह से लेकर देर रात तक वह अपने संसदीय क्षेत्र के तहत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों का दौरा कर रही थीं. कार्यकर्ताओं की बैठकें ले रही थीं.
अलग-अलग कारणों से नाराज़ कार्यकर्ताओं को मना रही थीं.
इंदौर में उनके आधिकारिक संसदीय प्रतिनिधि अशोक डागा तथा अन्य क़रीबी समर्थक तो बाक़ायदा सोशल मीडिया के ज़रिए लगातार प्रचारित भी कर रहे थे कि इंदौर से सुमित्रा महाजन ही चुनाव लड़ेंगी, कुछ लोग नाहक ही अफ़वाह फैलाकर भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं.
लेकिन पार्टी नेतृत्व की ओर से अपने टिकट को लेकर बनाई जा रही अनिश्चितता की स्थिति से महाजन खिन्न और परेशान भी हो गई थीं.
इसी वजह से पिछले रविवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंदौर सहित देश के विभिन्न शहरों में हुए 'मैं भी चौकीदार' कार्यक्रम में उन्होंने शिरकत नहीं की.
लेकिन इस सबके बावजूद पार्टी नेतृत्व ने उम्र का बंधन शिथिल करने की महाजन की गुहार नहीं मानी.
उन्हें स्पष्ट तौर पर प्रदेश के पार्टी प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे के ज़रिए यह संदेश दे दिया गया कि वह ख़ुद ही टिकट की दावेदारी से हटने का ऐलान कर दें. महाजन को ऐसा ही करना पड़ा.
विवादों से गहरा नाता
महाजन की लंबी संसदीय पारी भले ही निष्कंटक रही हो लेकिन लोकसभा अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका विवादों से परे नहीं रह सकीं.
आमतौर पर लोकसभा अध्यक्ष के पद पर सत्तारुढ़ दल के सदस्य का ही निर्वाचन होता है, लेकिन माना जाता है कि लोकसभा अध्यक्ष बनने के बाद उसकी दलीय संबद्धता औपचारिक तौर पर ख़त्म हो जाती है.
उससे अपेक्षा की जाती है कि वह सदन की कार्यवाही का संचालन दलीय हितों और भावनाओं से ऊपर उठकर करेगा.
इस मान्यता और अपेक्षा के बावजूद देखने में यही आता है कि हर लोकसभा अध्यक्ष की निष्पक्षता का पलड़ा सत्तारुढ़ दल और सरकार की ओर ही झुका रहता है. महाजन भी अपवाद नहीं रहीं.
लोकसभा के इतिहास में सुमित्रा महाजन से पहले तक बलराम जाखड़ ही सर्वाधिक पक्षपाती लोकसभा अध्यक्ष के तौर पर जाने जाते रहे लेकिन सुमित्रा महाजन ने अध्यक्ष के रूप में अपनी भूमिका से जाखड़ को भी पीछे छोड़ दिया.
लोकसभा अध्यक्ष होते हुए भी सदन में हो या सदन से बाहर, उनका व्यवहार प्रतिबद्ध पार्टी कार्यकर्ता जैसा ही रहा.
सदन में विपक्षी सदस्यों के भाषणों के दौरान टोका-टोकी करने और उनकी खिल्ली उड़ाने में भी वह सत्तापक्ष के अन्य सदस्यों से पीछे नहीं रहीं.
कई बार मंत्रियों को सवालों में घिरता देख ख़ुद के बचाव में सामने आईं और प्रश्न, प्रतिप्रश्न तथा पूरकप्रश्न पूछने वाले विपक्षी सदस्यों को नियमों की मनमानी व्याख्या करते हुए हड़काया.
सदन में विपक्षी नेताओं पर प्रधानमंत्री के कर्कश और विवादास्पद कटाक्षों पर उन्होंने सत्तापक्ष के सदस्यों की तरह मेज तो नहीं थपथपाई लेकिन अपनी मंद हंसी या मुस्कुराहट के ज़रिए अपनी प्रसन्नता भी नहीं छुपाई.
पार्टी के अंदरूनी समीकरणों और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की भाव-भंगिमा को समझते हुए कई सार्वजनिक अवसरों पर लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति को भी उपेक्षापूर्वक नज़रअंदाज करने में उन्होंने संकोच नहीं किया. कुल मिलाकर लोकसभा अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका औसत से भी हल्के स्तर की रही.
लोकसभा चुनाव के लिए उनका टिकट कटना स्पष्ट रूप से उनकी संसदीय राजनीति के सफ़र पर पूर्ण विराम है. अगर केंद्र में दोबारा भाजपा की सरकार बनती है तो मुमकिन है कि उन्हें किसी प्रदेश का राज्यपाल बना दिया जाए. अगर ऐसा नहीं होता तो उनके टिकट कटने को उनकी राजनीतिक पारी का अंत समझा जाना चाहिए.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है.)
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