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ग्राउंड रिपोर्टः असम नागरिकता रजिस्टर से कितने हिंदू बाहर
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, तिनसुकिया (असम) से
भारत-म्यांमार को जोड़नेवाली स्टिलवेल रोड पर है डमरू उपाध्याय की मोमो की दुकान, और पास ही घर, जहां बीजेपी विधायक भास्कर शर्मा और अपनी तस्वीर के पास बैठे 'गोरखाली' डमरू कहते हैं, "गोरखा लोगों को सिर्फ़ मरने के लिए तैयार किया जाता है, आओ देश के लिए मर जाओ, हम आपको देंगे कुछ नहीं."
परिवार का नाम नागरिकता रजिस्टर में न आने पर डमरू अगर भन्नाए हुए हैं तो 22 सालों से संघ और बीजेपी से जुड़े मूलत: बिहार के चंद्र प्रकाश जायसवाल के मुताबिक़ लोगों में डर है कि अगर फ़ाइनल एनआरसी में भी नाम नहीं आया तो क्या होगा?
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के संसद में दिए '40 लाख घुसपैठिये' वाले बयान पर लोग ऐतराज़ जता रहे हैं और यकीन भी नहीं, क्योंकि समय बीतने के साथ-साथ ये साफ़ हो रहा है कि एनआरसी से बाहर रखे गए 40 लाख लोगों में से ज़्यादातर संख्या हिंदुओं की है.
हालांकि अभी कोई आधिकारिक आंकड़ा मौजूद नहीं है और ये संख्या 20-22 लाख तक बताई जा रही है, लेकिन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ नेता ओशीम दत्ता असम नागरिकता रजिस्टर से बाहर रह गए हिंदुओं की संख्या 30 लाख तक बताते हैं.
'हिंदू हितों' की बात करनेवाली बीजेपी के लिए ये एक मुश्किल स्थिति है.
'ब्रितानी-काल के बाद की बड़ी ट्रेजडी'
पिता और चाचा की जायदाद साझी थी इसलिए श्याम सुंदर जायसवाल के पास कोई दस्तावेज़ नहीं, जो थे वो 1950 के असम भूकंप की भेंट चढ़ गए जब सादिया और पास के इलाक़े की आबादी का बड़ा हिस्सा नदी में समा गया था.
पान और पंचर लगाने की दुकान चलाने वाले 51-साल के श्याम सुंदर जायसवाल का परिवार तीन पीढ़ी पहले असम आया था, लेकिन अब उनका सवाल एक ही है असम से निकाले गए तो जाएंगे कहां?
"और अगर निकाले न भी गए तब लोग कह रहे हैं कि एनआरसी में नाम नहीं शामिल होने पर न राशन का कोटा मिलेगा, न वोटर कार्ड और न ही बैंक खाता खुल सकेगा, और ना ही जायदाद ले पाएंगे," वो बड़े फिक्रमंद लहजे में कहते हैं.
पास बैठे बेटे मिंटू जायसवाल कहने लगते हैं कि शादीशुदा बहन की नौकरी का बुलावा आ गया है, उसे एनआरसी सर्टिफिकेट जमा करना है, सुसराल से बार-बार तकाज़ा आ रहा है मगर कुछ समझ में नहीं आ रहा क्या करें?
हेडगवार, गोलवलकर और शिवाजी की तस्वीरों वाले अपने कार्यालय में बैठे चंद्र प्रकाश जायसवाल कहते हैं, "आज तीन रुपये किलो पर ग़रीब परिवार के प्रत्येक सदस्य को मिल रहा पांच किलो चावल, बीपीएल गैस कनेक्शन, सभी सरकारी योजनाओं का लाभ, यहां तक कि जाति प्रमाण पत्र तक बनाना नामुमकिन हो जाएगा."
साइनाकी गांव में चाय के बागान में काम कर रहीं लोक्खी घटवार के पास "ख़ाली पैन कार्ड और राशन कार्ड है, वोटर कार्ड मालिक के पास है" जिसने उसे भरोसा दिलाया है कि वो उसका एनआरसी बनवा देगा.
लोक्खी को तो ये भी मालूम नहीं कि वो मूलत: कहां से हैं हालांकि उसकी मां सावित्री घटवार कहती है कि उसके बाबा बिहार दुमका (पहले बिहार और झारखंड एक ही राज्य थे) से असम आए थे.
आदिवासियों की दिक्कतें
असम जो कभी मुग़ल साम्राज्य का भी हिस्सा नहीं रहा, ब्रितानियों के क़ब्ज़े में 1826 में आया जिसके बाद यहां चाय की खेती शुरू हुई और झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से बड़े पैमाने पर आदिवासी यहां लाए गए.
मगर एक झोले में समा जानेवाली कुल जमा-पूंजी के मालिक इन आदिवासियों में से काफ़ी के पास वो दस्तावेज़ ही नहीं जो आवेदन के लिए ज़रूरी हैं, न इनके पास उन्हें जुटाने की समझ या आर्थिक सामर्थ्य है और न ही किसी तरह का संगठनात्मक सहयोग, तो बहुतों ने तो एनआरसी के लिए दरख्वास्त ही नहीं दिया, तो ज़ाहिर है, हज़ारों आदिवासियों के नाम एनआरसी में नहीं हैं.
कहा जाता है कि बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल जैसे सूबों से 'ग्रो मोर फूड' के नाम पर खेतिहर मज़दूर भी ब्रितानियों के दौर में ही लाए गए थे. और बहुत सारे लोग वहां से भी असम आये जो पहले पूर्वी पाकिस्तान और अब बांग्लादेश के नाम से जाना जाता है.
तो क्या पहले से ही दयनीय स्थिति में काम कर रहे चाय मज़दूरों की स्थिति, नागरिकता के बिना, किसी बंधुआ मज़दूर सी होने का डर है, और बाक़ी लोगों का क्या होगा जिसमें से बड़ी तादाद आर्थिक रूप से बहुत सक्षम नहीं है?
हाल में हुई ख़ुदकुशी के कई मामलों को इससे जोड़ा जा रहा है जबकि प्रशासन का कहना है कि इनकी वजहें और हो सकती हैं.
इन सवालों पर डिब्रुगढ़ यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर कौस्तुभ डेका कहते हैं, "ये शायद अंग्रेज़ों के जाने के बाद से होनेवाली बड़ी त्रासदियों में से एक है हालांकि इसकी बहुत सी परतें अभी खुल ही रही हैं."
अलग-अलग नज़रिया
शायद इसलिए अभी इन मुद्दों पर बहुत चर्चा सुनने में नहीं आ रही कि, उनका क्या होगा जो नागरिकता रजिस्टर से बाहर रह जाएंगे, ख़ासतौर पर उनका जो मूल रूप से भारत के दूसरे प्रदेशों से यहां आए या लाए गए, या फिर आर्थिक और सामाजिक तौर पर इसके दूरगामी परिणाम क्या हो सकते हैं?
या उन कथित बांग्लादेशियों का क्या होगा क्योंकि बांग्लादेश के मंत्री हसनुल हक़ साफ़ तौर पर कह चुके हैं कि ये भारत का आंतरिक मामला है और बांग्लादेश का इससे कुछ लेना-देना नहीं.
फ़िलहाल अलग-अलग समूह इसे अपने-अपने नज़रिये से देख रहे हैं - एनआरसी से बाहर रह गए बांग्ला भाषी इसे बंगालियों के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह का नतीजा मान रहे, तो मुस्लिम इसे मज़हब से जोड़कर देख रहे हैं.
वहीं ख़ुद को मूल असमिया मानने वाला एक बड़ा तबक़ा अंदेशा जता रहा है कि "एनआरसी का काम ठीक ढंग से नहीं हुआ," और बाहर रखे गए लोगों की तादाद 40 लाख से और अधिक होनी चाहिए थी.
जानी-मानी पत्रिका प्रांतिक के संपादक प्रदीप बरुआ कहते हैं, "जैसे-जैसे बातें सामने आ रही हैं एनआरसी के फुलप्रूफ़ होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं."
बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, जिन्होंने एनआरसी पर कांग्रेस को चैलेंज करने वाले लहजे में कहा था "हममें हिम्मत है तो हम कर रहे हैं," की पार्टी के प्रांतीय नेता और यहां तक कि ख़ुद मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल इस मामले पर कुछ कहने से बचते हैं.
जाति, माटी, भेटी यानी संस्कृति और ज़मीन के नारे पर सूबे में चुनाव जीतने वाली बीजेपी के लिए अब मुश्किल ये है कि मूल असमिया किसी भी 'बाहरी' को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं चाहे वो हिंदू ही क्यों न हों.
ओशीम दत्ता कहते हैं कि हिंदू चाहे वो पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफ़ग़ानिस्तान कहीं से भी आया हो उसे जगह देनी होगी, वहीं प्रदीप बरूआ का कहना है, "जो भी बाहरी है चाहे वो हिंदू ही क्यों न हो स्वीकार्य नहीं, बीजेपी को ये बात पसंद आए या न आए असमिया लोगों की यही भावना है."
इधर, गुवाहाटी में विधानसभा सत्र के पहले ही दिन पक्ष और विपक्ष दोनों ने साथ आकर एनआरसी संयोजक प्रतीक हजेला के ख़िलाफ़ पुनर्वेदन के लिए पांच दस्तावेज़ों को कम करने के मामले पर झंडा उठा लिया.
संसदीय कार्य मंत्री चंद्र मोहन पटवारी ने बयान दिया कि राज्य सरकार अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के सामने ये मामला उठाएगी और साथ ही कहा कि बॉर्डर पुलिस को नए मामले फॉर्नर्स ट्राइब्यूनल में भेजने से रोक दिया गया है.
कांग्रेस राज्य सरकार से नागरकिता संशोधन बिल पर रुख़ साफ़ करने को कह रही है क्योंकि उसके अनुसार ये 1985 के असम समझौते की मूल भावना के ख़िलाफ़ है जिसमें उन्हीं लोगों को नागरिकता देने की बात है जो 24 मार्च 1971 तक या उससे पहले असम आ चुके थे.
मूल लोगों को विशेष अधिकार
कौस्तुभ डेका कहते हैं, "एनआरसी एक तरह की दुविधा बनकर उभरा है जिसमें कोई विजयी नज़र नहीं आ रहा," और एक सोच ये उभरती दिख रही कि क्या एनआरसी उस लक्ष्य को हासिल कर पाया जिसके लिए ये तैयार हुआ था.
दूसरी और हिंदुत्व से जुड़े संगठन समुदाय के भीतर जाकर सबके नाम शामिल करवाए जाने का भरोसा दिला रहे हैं.
डेका के मुताबिक़ धर्म के आधार पर विभाजन की रणनीति की सीमित सफ़लता के बाद बीजेपी में मूल असमियों को विशेष अधिकार देने का विचार प्रबल हो रहा है.
पार्टी पहले भी बोडो, दीमा और दूसरे समुदायों से नज़दीकियां बढ़ाती रही है.
हालांकि असम में जहां सदियों से दूसरी जगहों से लोगों का आगमन जारी रहा है वहां मूल निवासी किस आधार पर चिन्हित किए जाएंगे ये भी कुछ नए सवाल खड़े कर सकता है.
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