'सरहदों पर लड़कियां तैनात, तो खदान में क्यों नहीं'

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- Author, रवि प्रकाश
- पदनाम, धनबाद से, बीबीसी हिंदी के लिए
''जब दुनिया के दूसरे देशों में लड़कियां खदान के अंदर जा सकती हैं. वहां काम कर सकती हैं. माइनिंग इंजीनियरिंग पढ़ सकती हैं, तो फिर भारत में यह क्यों नहीं हो सकता.''
आईआईटी (आइएसएम) धनबाद के माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग में बीटेक प्रथम वर्ष की छात्रा श्वेता सुमन ये सवाल करती हैं तो उनका जोश देखते ही बनता है.
वे उन तीन लड़कियों में शामिल हैं, जिन्होंने माइनिंग इंजीनियरिंग ट्रेड में लड़कियों के नामांकन से प्रतिबंध हटने के बाद यहां एडमिशन लिया है. उनके साथ स्निग्धा और साक्षी सिंह भी माइनिंग इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही हैं.
श्वेता आगे कहती हैं, ''आप फौज में हथियार देकर लड़कियों को सीमाओं पर तैनात कर देते हैं तो इंजीनियर बनाकर खान में क्यों नहीं भेज सकते. पढ़ाई में जेंडर डिस्क्रिमिनेशन क्यों. इसलिए मैंने माइनिंग इंजीनियरिंग चुना है. मुझे तब सबसे अधिक खुशी होगी, जब मैं पुरुषों के एकाधिकार वाली खदानों में उऩके बराबर काम कर सकूंगी.''

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90 साल में पहली बार
इंडियन स्कूल आफ माइंस (अब आईआईटी, धनबाद) के 90 साल के इतिहास में पहली बार यहां लड़कियों को माइनिंग इंजीनियरिंग में पढ़ाई की इजाज़त मिली है.
खनन की पढ़ाई के लिए साल 1926 में स्थापित इस मशहूर संस्थान में माइनिंग इंजीनियरिंग कोर्स में लड़कियों को दाखिला नहीं मिलता था.
आईआईटी बन जाने के बाद साल 2016 में ये प्रतिबंध हटा लिया गया लेकिन किसी लड़की ने माइऩिंग इंजीनियरिंग में एडमिशन नहीं लिया. तब एक लड़की ने माइनिंग मशीनरी की च्वाइस दी, लेकिन सीट आवंटित हो जाने के बाद भी उन्होंने एडमिशन नहीं लिया.
इसके बाद सत्र 2017-18 में तीन लड़कियों ने एडमिशन के लिए माइनिंग इंजीनियरिंग की च्वाइस दी और नामांकन के बाद वे पहली तीन छात्राएं बन गयीं, जिनका इस कोर्स में दाखिला हुआ.

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संशोधन जरूरी है
दरअसल, माइंस एक्ट 1952 और कोल माइंस रेगुलेशन 1957 के प्रावधानों के मुताबिक यहां माइनिंग इंजीनियरिंग में लड़कियों के दाखिले की मनाही थी.
आईआईटी (आइएसएम) धनबाद के डायरेक्टर दुर्गा चरण पाणिग्रही ने बताया कि इस एक्ट में सुरक्षा कारणों से महिलाओं को माइंस में नियोजित करने की कई शर्तें हैं. इस कारण हमारे संस्थान में लड़कियों को ऐसे कोर्स के लिए प्रतिबंधित किया गया था.
डी सी पाणिग्रही ने बीबीसी से कहा, ''माइंस एक्ट के सेक्शन 46 (1) के अनुसार महिलाओं को अंडरग्राउंड माइंस में जाने की मनाही है. सरफेस या ओपेन कास्ट माइंस में भी वे सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे तक ही काम कर सकती हैं. इस कारण देश भर के इंजीनियरिंग कालेजों में माइनिंग इंजीनियरिंग में लड़कियों का एडमिशन नहीं लिया जाता था.''
वे आगे बताते हैं, ''अब हमने प्रतिबंध हटा लिया है. आईआईटी खड़गपुर और आईआईटी (बीएचयू) वाराणसी समेत देश के कुछ और संस्थान भी माइनिंग इंजीनियरिंग में लड़कियों का एडमिशन ले रहे हैं. वैसे भी जब लड़कियां अंतरिक्ष में जा सकती हैं, तो अंडरग्राउंड माइंस में क्यों नही जा सकतीं. मेरा सरकार से अनुरोध है कि वह माइंस एक्ट 1952 में ज़रूरी संशोधन करे.''

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दूर हुई बाधा
आईआईटी (आइएसएम) धनबाद के रजिस्ट्रार एम के सिंह का मानना है कि भले ही अभी तीन लड़कियां ही माइनिंग पढ़ रही हैं लेकिन अब इस कोर्स के लिए अधिक लड़कियां आएंगी.
उन्होंने बीबीसी से कहा कि डायरेक्टर जनरल आफ माइंस सेफ्टी (डीजीएमएस) की सिफारिशें इस कोर्स में लड़कियों के नामांकन में बाधक थीं. अब नामांकन की अनुमति मिल चुकी है और हमारी लड़कियां इतिहास रचने को तैयार हैं. लड़कियों के लिए 14 प्रतिशत का कोटा भी उनकी मदद करेगा.

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खुद को साबित करना है
आईआईटी (आइएसएम) धनबाद में माइनिंग इंजीनियरिंग पढ़ रही स्निग्धा सिंह मानती हैं कि सरकार को इस कोर्स में लड़कियों को एडमिशन लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, न कि इस पर बंदिशें लगानी चाहिए.
स्निग्धा सिंह ने बीबीसी से कहा, ''माइनिंग इंजीनियरिंग में सिर्फ अंडरग्राउंड माइऩिंग ही तो नहीं होती. इसमें सॉफ्टवेयर का भी काम होता है.''
''वैसे भी, ऐसा कौन-सा काम है, जो हम नहीं कर सकते. हमें दरअसल ट्रेंड सेटर बनना है, इसलिए मैंने जानबूझ कर माइऩिंग इंजीनियरिंग को पढ़ने के लिए चुना. हमलोग खुद को साबित करना चाहती हैं. माइंस एक्ट में संशोधन के बाद हमलोग अंडरग्राउंड माइंस मे भी जाएंगे.''

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देश की पहली माइनिंग इंजीनियर
महाराष्ट्र की रहने वाली डा चंद्राणी प्रसाद वर्मा को देश की पहली माइनिंग इंजीनियर बनने का गौरव प्राप्त है. बीते 20 जनवरी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें साल 2018 के इंडियन वूमेन अचीवर अवार्ड से भी सम्मानित किया है.
यह अवार्ड देश की उन 112 महिलाओं को दिया गया, जो भारत में अपने-अपने क्षेत्र की पहली महिला हैं.
डा चंद्राणी प्रसाद वर्मा को नागपुर विश्वविद्यालय ने कोर्ट में एक साल तक चली लड़ाई के बाद साल 1996 में स्पेशल केस के तौर पर माइनिंग इंजीनियरिंग में नामांकन की इजाजत दी थी.

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यहां से बीटेक करने के बाद उन्होंने एमटेक (2006) और पीएचडी (2015) भी की. इस प्रकार वे माइनिंग इंजीनियरिंग में पीएचडी करने वाली देश की पहली महिला बन गयीं. इन दिनों वे सेंट्रल इंस्टीट्यूट आफ माइनिंग एंड फ्यूल रिसर्च (सिम्फर) में वैज्ञानिक हैं.
झारखंड के जाने-माने करियर काउंसलर विकास कुमार मानते हैं कि भारत सरकार को 1952 में बने माइंस एक्ट में संशोधन कर महिलाओं को अंडरग्राउंड माइंस में जाने की इजाजत दे देनी चाहिए क्योंकि तब और आज की परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं.
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