फिर वही सवाल, इस लड़की से शादी कौन करेगा?

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- Author, सिन्धुवासिनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
वो रसोई में बेलन नहीं संभालती और न ही काजल लगाती है. वो कुर्ते की बांह मोड़कर पहनती है. स्कर्ट पहन लेती है तो उसके लिए चलना मुश्किल हो जाता है.
'स्टार प्लस' पर शुरू होने जा रहा सीरियल 'इक्यावन' एक ऐसी ही लड़की की कहानी बयां करता है. इस लड़की को घर के पुरुषों ने पाल-पोसकर बड़ा किया है. उसकी ज़िंदगी में पिता तो कई हैं लेकिन मां एक भी नहीं.
शो के ट्रेलर में सवाल पूछा जा रहा है कि ऐसी लड़की से आख़िर शादी कौन करेगा? सवाल कई हैं. पहला तो ये कि किसी लड़की की ज़िंदगी को हमेशा शादी से जोड़कर क्यों देखा जाता है?

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दूसरा, जन्म से एक जैसे लड़के और लड़की को इतना अलग क्यों और कैसे कर दिया जाता है?
सीरियल में लीड रोल करने वाली प्राची तेहलान कहती हैं कि बात सिर्फ़ एक लड़की और उसकी शादी तक ही सीमित नहीं है.
उन्होंने कहा,''हम उस लड़की के संघर्ष को दिखाना चाहते हैं जिसे ख़ुद से प्यार है. जो समाज की रूढ़ियों को तोड़ने की कोशिश करती है और जो ये साबित करना चाहती है कि लड़के और लड़की में कोई फ़र्क नहीं है.''
ये तो रही सीरियल की बात. दिल्ली में रहने वाली पूजा की असल ज़िंदगी का अनुभव कुछ ऐसा ही रहा है.

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वो ढीले-ढाले कुर्ते और जींस पहनती हैं, मेकअप भी नहीं करतीं और लोग उन्हें कई बार यह कहकर टोक देते हैं कि 'कुछ तो लड़कियों जैसी चीज़ें किया करो!'
वो पूछती हैं,''मर्द काले रंग का बड़ा सा छाता लेकर चलेगा और औरत गुलाबी रंग की छोटी सी छतरी. ये कौन तय करता है? लड़कियों और लड़कों को अलग तरीके से क्यों पाला जाता है?''
पूजा का मानना है कि हमें 'लड़कों जैसा' और 'लड़कियों जैसी' का ज़िक्र करना बंद करना होगा.
सीरियल, सिर्फ़ लड़कों और लड़िकयों के लिए लोगों के भेदभावपूर्ण रवैये की बात ही नहीं करता. इसके अलावा भी कई मानवीय पहलू इसमें देखने को मिलेंगे.

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उस लड़की की परवरिश कैसे होती है जिसकी देखभाल करने के लिए घर में कोई महिला नहीं है. पिता या घर के पुरुष सदस्यों के लिए असल ज़िंदगी में यह कैसा अनुभव होता है?
उत्तर प्रदेश के सोनभद्र में रहने वाले अयोध्या ने अपनी पत्नी के गुज़रने के बाद अकेले ही पांच बेटियों को पाला है.
वो कहते हैं,''मेरी कोशिश हमेशा यही रही कि मेरी बेटियों को मां की कमी महसूस न हो. मैंने वो सब किया जो एक मां अपनी बेटियों के लिए करती है.''

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अयोध्या की बड़ी बेटी ख़ुशबू इस वक़्त बीए फ़र्स्ट इयर की छात्रा हैं. वो याद करती हैं कि लोग पापा को दूसरी शादी करने की नसीहतें देते थे और कहते थे कि एक मर्द बच्चों को अकेले नहीं संभाल सकता.
ख़ुशबू ने कहा,''मेरे पापा ने सबको ग़लत साबित किया. उन्होंने हमें बेहतरीन परवरिश दी.''
शो में लीड रोल करने वाली प्राची कहती हैं,''पिता को बच्चे की नैपी बदलते, उसे दूध पिलाते और सुलाते देखना हमें हैरत भरा लगता है क्योंकि ऐसा बहुत कम होता है.''
ऐसे में बच्ची और घर के पुरुष सदस्यों के बीच कैसा रिश्ता विकसित होता है, यह देखने लायक होगा.
समाज ने औरतों और मर्दों के लिए जो काम निर्धारित किए हैं उन्हें अलग-अलग तरीके से चुनौती देने की कोशिशें हो रही हैं.

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ऐसी ही एक कोशिश कर रहे हैं मुंबई में रहने वाले अरशद जमाल. वो सोशल मीडिया पर कभी रेड लिपस्टिक लगाकर तस्वीरें डालते हैं तो कभी नोज़ रिंग पहनकर.
अरशद ने बताया,''शुरू में लोगों ने मेरा खूब मज़ाक उड़ाया लेकिन धीरे-धीरे बात उनकी समझ में आ रही है.''
लेकिन आख़िर में फ़िर वही सवाल है कि बराबरी आएगी कैसे?
पूजा के पास एक सुझाव है. वो कहती हैं,''हमें बेटों को खेलने के लिए किचन सेट देना होगा. बेटियों को बाज़ार जाकर सब्जी लाने को कहना होगा.''
उनका मानना है कि जब हम लड़कों के गुलाबी शर्ट और लड़कियों के खादी कुर्ता पहनने पर हंसेंगे नहीं, बराबरी तभी आएगी.
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