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बीएचयू की लड़कियों ने पूछा- क्या वोट तक ही सीमित हैं मां, बहन, बेटी?
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, वाराणसी से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पिछले एक हफ़्ते से मचे हंगामे के बाद वहां महिला छात्रावासों की तमाम समस्याएं सामने आ रही हैं.
छात्रावासों में रहने वाली छात्राओं का कहना है कि न सिर्फ़ हॉस्टल की बल्कि कैंपस के भीतर तमाम छात्राओं की परेशानियां हैं, जिन्हें अक़्सर उठाया जाता है लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती.
इन छात्राओं को इस बात का भी मलाल है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी शहर से लोकसभा में गए हैं बावजूद इसके वो परिसर में ख़ुद को असुरक्षित महसूस करती हैं.
छात्राओं का ये भी कहना है कि परिसर में तमाम तरह की बंदिशें हैं और उनका जरा सा भी उल्लंघन होने पर गार्ड्स और वॉर्डन की ओर से ये कहा जाता है कि अब उनकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं है.
बीएचयू की कुछ छात्राओं ने विश्वविद्यालय परिसर और छात्रावासों के अपने कुछ अनुभव बीबीसी से साझा किए हैं. इन छात्राओं का कहना है कि उनकी बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक भी पहुंचनी चाहिए ताकि वो यहां की छात्राओं के 'मन की बात' जान सकें.
वैद्रूमि तिवारी
पिछले दिनों बीएचयू की छात्राएं यदि आंदोलन और प्रदर्शन के लिए मजबूर हुईं तो वो सिर्फ़ एक दिन की अकेली घटना नहीं थी. सच्चाई ये है कि छेड़छाड़ की घटना यहां आए दिन होती है.
विश्वविद्यालय की छात्राएं अक़्सर ये महसूस करती हैं कि वो यहां सुरक्षित नहीं हैं क्योंकि न तो यहां रोशनी की उचित व्यवस्था है, न ही कहीं सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और सुरक्षा गार्डों का असहयोगात्मक रवैया तो और भी हैरान करने वाला है.
पिछले दिनों जब छेड़छाड़ से पीड़ित अपनी साथी के समर्थन में हम लोग सड़क पर उतरे तो हम पर लाठीचार्ज किया गया, मानो छात्राएं कोई अपराधी हों.
हम सिर्फ़ ये चाहते हैं कि परिसर में और छात्रावासों में ऐसी व्यवस्था हो जिससे कि छात्राओं को आंदोलन और प्रदर्शन का रास्ता न अपनाना पड़े. ये क़दम लड़कियों ने इतनी आसानी से नहीं उठाया, लोगों को समझना चाहिए कि कितनी परेशान होने के बाद छात्राएं सड़कों पर आईं.
नेहा, शोध छात्रा, आयुर्वेद विभाग
मोदी जी मन की बात अक़्सर करते हैं, लेकिन हमारा आग्रह है कि कम से कम हमारे मन की बात तो सुन लीजिए. बीएचयू में छेड़छाड़ के विरोध में लड़कियों का आक्रोश वीसी के बात न सुनने के कारण सड़कों पर उतर आया और हम सभी अपने मन की बात उसके अगले दिन उसी रास्ते से बनारस आने पर मोदी जी को बताना चाहते थे, लेकिन अपने ही संसदीय क्षेत्र की छात्राओं की पीड़ा सुने बिना ही मोदी जी रास्ता बदलकर चले गए.
क्या केंद्रीय विश्वविद्यालय में आत्म सुरक्षा मांगने पर उसे लाठीचार्ज से दबा देना सही है? क्या हमारे रक्षक नेता केवल वोट मांगने तक ही मां बहन बेटी बोलते हैं? उसके बाद उन्हें उनकी मांगें केवल भीड़ का हिस्सा दिखती हैं?
हमारे मन की बात सुनने की बात तो दूर, मोदी जी ने सांत्वना के दो शब्द भी नहीं बोले. आखिर क्यों?
हमारे वीसी और प्रधानमन्त्री के ईगो में कोई अंतर नहीं. दोनों ही लोग शांत रहे, जब आंदोलन बढ़ा तब लाठीचार्ज कराकर लड़कियों को कमज़ोर कर दिया.
जिस बनारस को क्योटो बनाने चले थे, उस बनारस की टेढ़ी मेढ़ी गलियों में कभी झूला खाने आइए.
शायद चुनाव जीतने के बाद आप केवल उद्घाटनों के फ़ीते काटने ही आए, कभी बनारस की जनता का दर्द सुनने का समय नहीं मिला, आखिर क्यों?
हमारी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी आखिर घर से बाहर किसकी है? आपसे बस इतना ही निवेदन है की बनारस ही नहीं बल्कि पूरे भारत को जुमला देना अब बंद करिए.
हमें अपना देश ईमानदार, सुरक्षित और सभी विचारधाराओं से सिंचित चाहिए.
एकता सिंह, विधि छात्रा
बचपन से ही बीएचयू में पढ़ने का सपना जब 2015 में साकार हुआ तो मैं बहुत खुश थी. रैंक अच्छी होने की वजह से मुझे हॉस्टल भी मिल गया था. महामना जी की बगिया का वैभव सोच के अनुरूप ही था.
मैं वकील बनने जा रही थी, सबके हक़ के लिए लड़ने की प्रेरणा मुझमें चरम पर थी पर धीरे-धीरे चीजें बदलती गईं. कुछ बहुत ग़लत हो रहा था.
महामना की बेटियां असुरक्षित थीं. कुछ ही दिनों में लड़ाई, झगड़ा, छेड़छाड़ सब देखने को मिल गया.
ये सब करने वाले को पहचान कर मैं एकदम शेरलॉक होल्म्स की तरह गर्व के साथ गार्ड के पास जाती, मैं बता सकती हूं यह सब किसने किया, यह देखिए आपके सामने से जा रहा है, पकड़िए इसे.
लेकिन जवाब मिलता, "तुम हॉस्टल जाओ, बाहर क्यों घूम रही हो?" और वो उनके सामने से चचा पायलागूं करके निकल जाता. मेरी आत्मा रो जाती, मेरा साहसी होना व्यर्थ था.
हॉस्टल में कहा जाता कि लंका पर रूम ले लो, इतनी समस्या है तो. मेरी रिपब्लिक डे स्पीच में इन सब बातों को बोलने की वजह से दबाव बनाया जाता.
लड़के कभी भी बाहर जाते और हम ठंड में शाम 6:30 बजे और गर्मियों में 7 बजे जेल में बंद कर दिए जाते.
कितने बेरहम थे महामना जिन्होंने सिर्फ़ लड़कों के लिए लाइब्रेरी बनाई. मेस में खाओ या न खाओ पैसे उतने ही देने होते.
8 सितम्बर 2016 और 4 मार्च 2017 को ज्ञापन भी दिया पर इनके कानों पर जूं नहीं रेंगी. 21 सितम्बर की शाम भी ऐसा ही हुआ. पानी सिर से ऊपर जा चुका था.
पहली बार इतनी संख्या में लड़कियां लंका पर अपने हक़ के लिए ज़िद पर अड़ गई थीं, पर उन्हें हक़ की जगह लाठी मिली.
बेटियों का ये हश्र तो नहीं चाहा होगा महामना ने. काश! कि आज वो ज़िंदा होते और हमारी बातें सुन पाते!
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