You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
यशपाल: जिन्होंने बताया, साइंस पढ़ना क्यों ज़रूरी
- Author, अमिताभ पांडेय
- पदनाम, विज्ञान मामलों के जानकार
शिक्षाविद और वैज्ञानिक यशपाल का दिल्ली से सटे नोएडा में सोमवार को निधन हो गया. वो 90 वर्ष के थे.
प्रोफ़ेसर यशपाल के बारे में सबसे बड़ी बात ये है कि वे छोटे से छोटे बच्चे से भी जब साइंस के बारे में बात करते थे तो उसके स्तर पर आकर करते थे.
उनको सबसे ज्यादा खुशी इस बात से मिलती थी कि लोग उनसे सवाल करें और उन्होंने इसके लिए अपने फ़ोन, ई-मेल सबके लिए खुले रखे थे.
कोई भी उनको सवाल पूछ सकता था और वे सभी को बहुत प्यार से जवाब देते थे, चाहे वो सवाल कितना ही बेतुका क्यों न हो.
वे पूरे इन्वॉल्व होकर लोगों के सवालों के जवाब दिया करते थे. उन्होंने कई किताबें भी लिखी थीं.
हिंदुस्तान के इतिहास में इस मुल्क को जड़ से सींचने वालों में से जिन लोगों का भी नाम लिया जाएगा, प्रोफेसर यशपाल उनमें से एक थे.
नेहरू के साथ...
वे पार्टिकल फिजिक्स के जबर्दस्त साइंटिस्ट थे, जब हिंदुस्तान आज़ाद हुआ और भाभा इंस्टिट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च की स्थापना हुई तो यशपाल इसकी नींव रखने वाले लोगों में से थे.
वे बड़े गर्व से बताया करते थे कि मैं वहां रिसर्च कर रहा हूं.
एक दिन भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू वहां आ गए और कहा कि मैं ये देखने के लिए यहां आया हूं कि तुम लोग क्या करते हो.
प्रोफेसर यशपाल पंडित नेहरू को अपनी लैब ले गए और दिखाया कि कॉस्मिक रेज़ की गतिविधियों को कैसे रिकॉर्ड करते हैं. पंडित नेहरू बच्चों की तरह उत्साहित हो गए थे.
प्रोफेसर यशपाल में भी बच्चों वाला उत्साह था, जीवन के आखिरी दिनों में उनका ये उत्साह बरकरार था.
कीमियोथैरेपी के साइड इफेक्ट्स
साइंस की एक बहुत ख़ास बात होती है कि आप में चीजों को जानने की इच्छा हो, आपने जो देखा है, इस प्रकृति का जो अनुभव आपने हासिल किया है, उसको लोगों को बताने का आनंद, प्रोफेसर यश पाल की शख्सियत के ये दो ख़ास आयाम थे.
यशपाल ज़िंदगी के आखिरी दिनों में कैंसर से जूझ रहे थे. कीमियोथैरेपी से वे ठीक तो हो गए लेकिन उनका स्वास्थ्य इससे बहुत कमज़ोर हो गया था.
उन्हें चलने-फिरने में दिक्कत होती थी, बात करने में असुविधा होती है. वे कैंसर से तो रिकवर कर गए, लेकिन कीमियोथैरेपी के साइड इफेक्ट्स से रिकवर नहीं कर पाए.
प्रोफेसर यशपाल को यश पाल कमिटी की रिपोर्ट के लिए जाना जाता है. उनकी ज़िंदगी का बहुत बड़ा फोकस इस बात पर था कि लोगों तक साइंस का ज्ञान कैसे पहुंचे.
स्कूल एजुकेशन पर उन्होंने कई सिफारिशें दीं. उनमें से कुछ सिफारिशें सरकारों ने लागू कीं. जिन सिफारिशों को लागू किया गया, उनका स्तर क्या है, ये हम सब लोगों को मालूम है.
यशपाल कमिटी की रिपोर्ट
कमिटी की सिफारिशें लिखते वक्त प्रोफेसर यशपाल लोगों से पूछते थे कि ये मैं लिख रहा हूं और ये बात ठीक है या नहीं.
लोग आम तौर पर अपने सामाजिक और राजनीतिक दायरे में लोकतांत्रिक होते हैं लेकिन निजी दायरे में डेमोक्रेटिक नहीं होते.
लेकिन प्रोफेसर यशपाल अपने निजी दायरे में भी ऐसे ही थे. वे अपने स्टूडेंट्स के साथ, अपने घर के अंदर हर जगह डेमोक्रेटिक थे.
वे चाहते थे कि शिक्षा में भी लोकतांत्रिक चरित्र को बढ़ावा मिले. उन्होंने ये बताया कि हमें साइंस क्यों पढ़ना चाहिए. वे कहते थे कि साइंस हमारी ज़िंदगी का पर्सपेक्टिव देती है.
इस विशाल ब्रह्मांड में जो हमने विज्ञान के जरिए जाना है, उसमें हमारी औकात क्या है, हमारी हैसियत क्या है. विज्ञान हमें इसे समझने का नज़रिया देता है.
(बीबीसी संवाददाता विभुराज से बातचीत पर आधारित)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)