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दूसरा उपन्यास लिखने में इतना वक़्त क्यों लगा अरुंधति को?
अपनी पहली ही किताब 'गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स' से अंतरराष्ट्रीय साहित्य जगत में नाम दर्ज करवाने वाली अरुंधति रॉय अब अपनी दूसरी किताब 'द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस' लेकर आई हैं. 1997 में बुकर जीतने के बीस साल बाद दूसरा उपन्यास लेकर आईं अरुंधति इस बीच अख़बारों, पत्र-पत्रिकाओं में लगातार समसामयिक मुद्दों पर लिखती रही हैं.
बीते दो दशकों में उन्होंने आठ नॉन-फिक्शन किताबें लिखीं और अलग-अलग विषयों पर निबंध भी लिखे. मसलन परमाणु बम, कश्मीर, बड़े बांध और वैश्वीकरण से लेकर दलित नायक भीम राव अंबेडकर, माओवादियों से अपनी मुलाकातें, एडवर्ड स्नोडेन और एक्टर जॉन क्यूसैक से बातचीत तक.
अरुंधति रॉय ने बीबीसी रेडियो-4 को दिए इंटरव्यू में अपना दूसरा उपन्यास लिखने में लिया गया वक़्त और उस बीच विचारों और लेखन की यात्रा और नॉन फ़िक्शन को लेकर विवादों के बारे में चर्चा की.
सवाल : दूसरे उपन्यास के लिए इतना वक्त क्यों लगा है?
अरुंधति रॉय : मैंने कभी ख़ुद को एक ऐसे व्यक्ति की तरह नहीं देखा है, जिसे इसलिए दूसरी किताब लिखनी है क्योंकि मेरी पहली किताब कामयाब रही थी. मैंने हमेशा कहा है कि अगर मेरे पास लिखने के लिए कुछ होगा तभी मैं अगली क़िताब लिखूंगी. मैं जिस तरह के उपन्यास लिखती हूं वो बहुत सीधा-सपाट नहीं होता, उसकी परतों को रचने में काफ़ी समय लगता है जिससे मुझे खुशी मिले. जो सिर्फ़ एक कहानी कहने के लिए नहीं होता है. मैं एक कहानी को सिर्फ़ जल्दी से और सुंदर तरीके से कह देना भर नहीं चाहती बल्कि चाहती हूँ कि इसमें कुछ गहराई हो. इस क़िताब ने दस साल पहले आकार लेना शुरू किया था.
सवालः फ़िक्शन लिखने में आपने इतना लंबा समय लिया लेकिन परमाणु मुद्दे, नक्सल, कश्मीर, वैश्वीकरण जैसे मुद्दों पर आपने इन अंतराल में बहुत कुछ लिखा जो चर्चा में भी रहा है.
अरुंधति रॉय: फ़िक्शन और नॉन फ़िक्शन के साथ मैं क्या करती हूं इसमें बहुत बड़ा फ़र्क है. पिछले बीस सालों में भारत काफ़ी बदला है, और ये प्रबल बदलाव है. मेरे लिए ये बदलाव 1998 में तब से आया जब परमाणु परीक्षण हुआ था. ये वो समय था जब मैं एक बहुत जानी-मानी लेखिका बन रही थी. ये वो समय था जब मैंने उन मुद्दों पर बात करना शुरू किया, जो चीज़ें हो रही थीं उन पर मैंने अपनी राय रखना शुरू किया लेकिन ये सब योजनाबद्ध नहीं था.
बाहर के लोगों के लिए ये समझना आसान नहीं था कि मैं उन (परमाणु परीक्षण, बड़े बांध जैसे ) मुद्दों पर क्यों बोल रही थी, वो लोग अंदर के उस माहौल को नहीं समझ रहे थे जिसमें मैं लिख रही थी. उदाहरण के तौर पर 'द एंड ऑफ़ इमैजिनेशन' लिखी थी, तब परमाणु परीक्षण को लेकर बहुत भद्दा जश्न मनाया जा रहा था, वो देशभक्ति और 'हिंदू बम' का भद्दा जश्न था, वैसे ही पाकिस्तान में 'मुस्लिम बम' कहा जा रहा था. लेकिन माहौल काफ़ी कठोर होता जा रहा था, तब मैं जो लिखती जा रही थी वो मुझे एक अन्य धरातल पर ले आता था. हमेशा ये हस्तक्षेप उस वक्त ज़रूरी था क्योंकि चीज़ें एकदम बदल रही थीं.
('द एंड ऑफ़ इमैजिनेशन', भारत में 1998 के परमाणु परीक्षण पर अरुंधति का निबंध है)
सवाल : आपको कई बार नक्सलियों, किसानों, कश्मीर के मुद्दों पर अपने समर्थन को लेकर विरोध और विवादों का सामना करना पड़ा है? क्या आपके नए उपन्यास में भी इन मुद्दों की झलक दिखेगी?
अरुंधति रॉय: जब मैं गुरिल्ला लड़कों के साथ जंगलों में गई थी, ये वो समय था जब भारत के मध्य हिस्से में भारत सरकार ने दरअसल युद्ध का ऐलान कर दिया था. और उस इलाके के सबसे ग़रीब लोगों को 'आतंकवादी' कहा जाने लगा. तो आप उस समय विमर्श में बदलाव की उम्मीद से शुरुआत करते हैं लेकिन फिर लिखने की इस प्रक्रिया में, हर बार जब मैं लिखती थी तब मैं सोचती थी कि अब नहीं लिखूंगी क्योंकि मुझे कई बार काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था. लेकिन अपनी इन यात्राओं में मेरे भीतर काफ़ी कुछ ऐसा जमा होता गया जिसे मेरे लिए नॉन-फ़िक्शन में लिखना संभव नहीं था.
सवालःक्यों?
अरुंधति रॉय: नहीं, उदाहरण के तौर पर कश्मीर के मुद्दे को ले लीजिए. सिर्फ़ मानवाधिकार रिपोर्ट में ये बताकर कि इतने लोगों की मौत हुई, इतने लोगों का शोषण किया गया, या इतने लोगों को जेल में डाला गया, किसी को ये समझाना संभव नहीं है कि हवा में आतंक के बीज होने का अर्थ क्या होता है, बीस साल तक लोगों के लिए सेना के दबाव में रहने का अर्थ क्या होता है, ये सब आपके कोषिकीय ढांचे के साथ क्या करता है, क्या होता है लोगों का, ऐसी जगहों पर फ़िक्शन ही सच बन जाता है.
सवाल : आज आप दुनिया में कहीं भी रह सकती हैं, आप भारत में क्यों रहती हैं?
अरुंधति रॉय: अगर आप 'द मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस' पढ़ेंगे तो आप समझेंगे कि क्यों (मैं भारत में रहती हूं). क्योंकि वहाँ आतंक के साथ बहुत खूबसूरती, गहरी समझ, विवेक और प्रतिरोध भी है, ये मेरा घर है. बहुत सारे लोग हैं वहां, हम ऐसे लोग नहीं है जैसा पश्चिमी देशों में होता है, जहां ये कहना आसान है कि हम न्यूयॉर्क रहने चले जाएंगे या टेक्सास रहने चले जाएंगे, हम पेड़ों की तरह हैं, हमारी जड़ें हैं यहां, हम एक दूसरे में उलझे हैं.
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