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कश्मीर प्रेस रिव्यू: 'भारत का ख़ुद को सबसे बड़ा लोकतंत्र कहना ठीक है?'
- Author, शायिस्ता फ़ारूक़ी
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
एक कश्मीरी नौजवान को आर्मी जीप पर बांधने वाले सैन्य अफ़सर को भारतीय फ़ौज द्वारा सम्मानित किए जाने के फ़ैसले की भारत प्रशासित कश्मीर से छपने वाले समाचार पत्रों ने कड़ी आलोचना की है.
भारतीय फ़ौज ने मेजर एल गोगोई को 22 मई के दिन सम्मानित किया था.
मेजर गोगोई ने कश्मीरी युवक को जीप पर बांधने को लेकर यह दावा पेश किया था कि उन्होंने स्थानीय लोगों के 'जीवन को बचाने' के लिए यह रणनीति अपनाई थी.
कश्मीरी अख़बारों ने सवाल उठाया है कि एक सैन्य अफ़सर को, जिसके ख़िलाफ़ जांच की जा रही है, उसे सम्मानित करना कितना वाजिब है?
एक दैनिक अख़बार ने सवाल किया है कि भारत ऐसे फ़ैसले लेने के बाद कैसे ख़ुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कह सकता है?
यह पूरा मामला पिछले महीने एक वीडियो वायरल होने के बाद सामने आया था, जिसे कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी सोशल मीडिया पर शेयर किया था.
इसके बाद भारतीय फ़ौज ने इस घटना की जांच शुरू की थी.
"यह निंदनीय फ़ैसला है"
अंग्रेज़ी अख़बार 'कश्मीर मॉनिटर' ने अपने संपादकीय में लिखा है कि भारतीय सरकार ने यह जानबूझकर किया है. किसी भी सैनिक के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई है. भारत के इसी रवैये को देखते हुए कश्मीरी लोगों के जेहन में कोई आशंका नहीं रह गई कि सशस्त्र बलों के अपराधों की जब बात आती है, तो उन्हें कभी न्याय नहीं मिलने वाला.
उर्दू दैनिक अख़बार 'चट्टान' का कहना है कि यह घटना कश्मीर के सैन्य इतिहास में अपनी तरह का पहला मामला है.
अख़बार ने लिखा है कि कश्मीरी युवक को कार पर बांधने वाले सैन्य अधिकारी का सम्मान करना एक कोरा मज़ाक है. इसकी निंदा की जानी चाहिए.
उर्दू दैनिक 'कश्मीर उज़्मा' का मानना है कि यह कदम एक "खुली चेतावनी" है.
अख़बार ने लिखा है कि दिल्ली से चल रही भारतीय सरकार कश्मीरी लोगों को यह स्पष्ट संदेश दे देना चाहती है कि व्यवस्था बहाल करने के लिए उनके पास एक रणनीति है, चाहें इस रणनीति के तहत मानवाधिकार का उल्लंघन होता रहे."
अंग्रेज़ी दैनिक 'कश्मीर रीडर' ने कहा है कि यह एक "भयावह घटना" है और इसका मतलब यही निकाला जा सकता है कि कश्मीर में किसी भी शख़्स की आज़ादी ख़तरे में है, क्योंकि सत्ता में बैठे लोग कभी भी आज़ादी छीन सकते हैं.
उर्दू दैनिक श्रीनगर टाइम्स ने संदेह जताया है कि सैन्य जांच आयोग का गठन महज़ एक नाटक था.
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