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हॉकी खिलाड़ी जिसके लिए गावस्कर मसीहा हैं
- Author, नीरज सिन्हा
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
भारतीय क्रिकेट के स्तंभ सुनील गावस्कर गुमनाम अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी गोपाल भेंगरा की 17 सालों से आर्थिक मदद करते रहे हैं.
हाल ही में रांची में उनकी मुलाकात सुनील गावस्कर से हुई. इसके बाद लगता है कि उनके घर-आंगन में खुशियों की बहार आ गई है.
धूल भरी गर्म हवा के बीच जब हम आदिवासी बहुल तोरपा इलाके के सुदूर उयुर गुरिया गांव पहुंचे तो वहां एक नौजवान से उनका पता पूछकर उनके घर तक पहुंचते हैं.
साधारण सा खपरैल और एसबेस्टस वाले घर के सामने शहतूत, आम, बेल, कटहल के पेड़ और एक किनारे बैलों की मस्त जोड़िया बंधी है.
दरवाजे के ठीक सामने लुंगी और नीली जर्सी पहने वह आदिवासी शख़्स नातिन-पोते से घिरे हैं.
गुमनाम अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी गोपाल भेंगरा यही थे.
71 साल के गोपाल भेंगरा कहते हैं, "सच कहूं, गावस्कर साहब मेरे मसीहा हैं. उनका साथ नहीं मिलता, तो परिवार नहीं संभलता और बुढ़ापे में पत्थर तोड़ने की बेबसी से निकल नहीं पाते. टी शर्ट दिखाते हुए वो कहते हैं यह उन्हें मुलाकात के दौरान मिला है."
वो बताने लगे खूंटी, सिमडेगा, गुमला जैसे आदिवासी इलाकों की मिट्टी में हॉकी सालों से रची- बसी है, इसका असर उन पर भी था. बचपन में माड़-भात खाकर बांस के स्टिक और गेंद से घंटों खेलते. लिहाजा बाबा ( पिता) उनकी स्टिक छिपा देते. गरीबी की वजह से वे तीसरी कक्षा तक ही पढ़े. उस वक्त भी दिहाड़ी खटते थे.
इस बीच साल 1963 में कद-काठी और दौड़- कूद के बूते वे फ़ौज में भर्ती हो गए. पहली पोस्टिंग मेरठ थी.
फ़ौज की हॉकी टीम में उन्हें शामिल कर लिया गया. उनके दमखम को देखकर प्रख्यात हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह जब शॉर्ट कॉर्नर हिट की घंटों अभ्यास कराते तो, उंगलियां छिल जाती पर वे ऊफ नहीं करते.
उस जमाने के मशहूर खिलाड़ी सुरजीत सिंह भी उनके प्रदर्शन पर दाद देते.
झारखंड के वरिष्ठ खेल पत्रकार अजय कुकरेती बताते हैं, "70-80 के दशक में वाकई गोपाल भेंगरा का जलवा था. उनका शॉर्ट कॉर्नर हिट जबरदस्त होता था."
इस बीच उनकी निगाहें, मिट्टी की दीवार पर रखे इनामों पर टिकती है.
अपने बेटे से वो एक फ़ाइल लाने को कहते हैं, जिनमें कुछ तस्वीरें अख़बार के कतरन और सर्टिफिकेट उन्होंने सहेज कर रखे हैं.
सुनील दत्त, दारा सिंह, समेत कई हस्तियों के साथ टीम की तस्वीरें दिखाते हुए कहते हैं कि कई नामी टूर्नामेंट में उन्होंने गोल दागे. 1978 के विश्व कप में भारतीय टीम से भी खेला.
1979 में वे फ़ौज से रिटायर हुए. फिर पश्चिम बंगाल ने उन्हें खेलने को बुलाया. छह सालों तक वहां भी वाहवाही बटोरी. इस दौरान घुटने में दर्द और पत्नी समेत तीन बेटे- दो बेटियों की बेहतर परवरिश की चिंता के साथ गांव लौट गए.
फ़ौज की नौकरी फिर हॉकी में तमाम शोहरत के बाद पत्थर तोड़ने की क्या मजबूरी थी, इस सवाल पर वे आदिवासी भोलेपन के साथ कहते है, "वेतन से घर का खर्च निकल जाता था. बाद में पेंशन के मामूली पैसों से घर चलाना बेहद मुश्किल था. बच्चे बड़े हो रहे थे और उन्हें पढ़ाना जरूरी था. घर में कमरों का अभाव था. तब ख्याल हुआ कि अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी हूं, हाथ क्या फैलाना. फिर चौड़ी छाती- मजबूत कलाइयों पर भरोसा कर पत्थर तोड़ने की मजदूरी करने लगे."
हालांकि खूंटी की तत्कालीन सांसद सुशीला केरकेट्टा से एक बार मिलकर मदद मांगी थी, लेकिन मदद मिलने का इंतज़ार ही रहा.
उन्हें इसका भी ग़म है कि बिहार- झारखंड ने कभी उनकी सुध नहीं ली. अब उन्हें हॉकी से प्यार नहीं रहा, अलबत्ता ज्यादा दिलचस्पी के साथ वो क्रिकेट के मैच देखते हैं.
उनके बेटे जितेंद्र भेंगरा बताते हैं कि बाबा के लिए कलेबा पहुंचाने पत्थरों की पहाड़ी पर जब जाते, तब ये जरूर पूछते कि स्कूल तो 'ऐब्सेंट' नहीं किया ना.
पिता से मिले हौसले से जितेंद्र भी फ़ौज में शामिल हो गए हैं, जबकि उनका छोटा भाई अर्जुन भेंगरा भी इन्हीं कोशिशों में जुटा है.
अर्जुन कहते हैं शायद पत्थर तोड़ने के बहाने बाबा की ज़िंदगी नए मोड़ से गुजरने को तैयार थी.
एक मैगज़ीन में उनकी बेबसी की कहानी छपी और इसी के जरिए साल 2000 से सुनील गावस्कर की कंपनी चैंप्स हर महीने आर्थिक मदद करती रही है. यह राशि एक हज़ार से बढ़कर साढ़े सात हज़ार हो गई है.
तोरपा के स्थानीय पत्रकार अजीत जायसवाल बताते हैं कि अक्सर भेंगरा दा दिल की बात साझा करते कि गावस्कर साहब को पत्र भेजता रहा हूं, लेकिन एक बार मिलने की हसरत ना जाने कब पूरी होगी. इसे इत्तेफाक ही कहें, इसका अवसर मिला जब 16 मार्च से रांची में आयोजित भारत- आस्ट्रेलिया टेस्ट मैच में पहुंचे सुनील गावस्कर यहां आए.
झारखंड स्टेट क्रिकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष अजय नाथ शाहदेव बताते हैं कि गोपाल भेंगरा की हसरतों पर छपी ख़बर के बाद उन्होंने अजीत जायसवाल से संपर्क साधा और गोपाल जी को साथ लेकर आने का न्योता दिया.
वो बताते हैं कि सुनील गावस्कर से मिलते ही हॉकी खिलाड़ी की आंखों में आंसू छलक पड़े. गावस्कर साहब भी भावुक हो गए. उन्होंने हॉकी खिलाड़ी के साथ खाना खाया और मैच देखकर जाने को कहा.
भेंगरा की छोटी बहू रूपा कच्छप बताती हैं कि सांझ ढले रांची से जब बाबा घर लौटे, तो फफक कर रो पड़े.
आस- पास के गांवों के बड़े-बुजुर्गों रिश्ते- नाते और दूसरे राज्यों से उनके साथ खेले दोस्तों के फोन आने का सिलसिला भी जारी है. सभी उनसे गावस्कर से हुई मुलाकात के बारे में पूछते हैं.
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