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कुलियों को भी है अच्छे दिन की आस
- Author, प्रीति मान
- पदनाम, पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
एक फ़रवरी को 2017 का आम बजट पेश होने जा रहा है. इस साल से रेल बजट अलग से पेश नहीं होना है. इसे आम बजट में ही शामिल कर दिया गया है. बजट से कुलियों को भी काफी उम्मीदें हैं.
सोचिये आप रेलवे स्टेशन पहुँचे और वहाँ आपको मदद करने के लिए कोई कुली न मिले तो कैसा लगेगा? कुलियों को रेल से अलग करके नहीं देखा जा सकता. आख़िर मुस्तैदी से यात्रियों की मदद करने वाले इस तबके के जीवन में क्या समस्याएं होती हैं-
स्टेशन पर कुलियों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. कुलियों को रेलवे स्टेशन पर विश्रामगृह की कमी और उचित देखभाल न होने जैसी दिक्कतें आती हैं.
साल भर का पारिवारिक रेलवे पास न होना, किसी तरह की बीमा योजना का न होना, किसी दुर्घटना या मृत्यु के बाद रेलवे की तरफ से कुली के परिवार को कोई मदद न मिलना जैसी परेशानियां भी उन्हें झेलनी पड़ती हैं.
सलीम खान राजस्थान के रहने वाले हैं. वे हज़रत निज़ामुद्दीन रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करते हैं.
उन्होंने कहा, "हम घर-बार छोड़कर इस उम्मीद में यह काम कर रहे हैं कि परिवार को सहारा मिले. साल भर में दो महीने का पास है वो भी सिर्फ मियां-बीवी का. अगर कहीं सफर करना हो तो बच्चों को कहाँ छोड़कर जाएँ?"
"रेलवे की तरफ से हमें कोई मेडिकल सुविधा नहीं मिलती. अगर बीमार पड़े या चोट लग जाए तो इसका सीधा असर हमारे परिवार पर पड़ता है."
पिछले रेल बजट में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने इनके लिए कुछ बदलाव किए थे. उन्हें कुली नहीं सहायक बुलाया जाएगा. वर्दी का रंग बदला जाएगा, कुलियों को यात्रियों से बेहतर ढंग से पेश आने की ट्रेनिंग दी जाएगी. सामान ढोने के लिए ट्रॉली दी जाएगी, लेकिन इनमें से कोई भी सुविधा ऐसी नहीं थी जिससे इनकी आर्थिक परेशानी का हल निकल सके.
कुली को रेलवे कर्मचारी का दर्जा नहीं मिला है. वे सामान ढोने वाले मजदूर हैं जिन्हें इस काम के लिए लाइसेंस दिया जाता है. रेलवे की तरफ से इन कुलियों को साल भर के लिए दो वर्दी का जोड़ा दिया जाता है. साल भर में दो महीने का पास दिया जाता है, लेकिन सामान ढुलाई का भत्ता कम होने की वजह से इन्हें इस महंगाई में अपना घर चलाना मुश्किल होता है.
नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर कुली किशन सहाय मीणा कहते हैं, "अब लोग ज़्यादातर ट्रॉली वाले बैग लेकर सफर करते हैं. इससे उन्हें अगर बहुत ज्यादा सामान न हो तो कुली करने की ज़रूरत नहीं पड़ती." इलेक्ट्रिक सीढ़ियां लगने से पैसेंजर को तो सुविधा हो गई, पर कुली का काम कम हो गया. इससे हमारी कमाई पर असर पड़ा है."
वो कहते हैं"कई सालों से रेट कार्ड में कोई बदलाव नहीं हुआ है जिसकी शिकायत हम कई बार रेलवे बोर्ड में कर चुके हैं पर अब तक कोई सुनवाई नहीं हुई है"
रेलवे कुलियों की कई माँगें हैं. वे चाहते हैं कि उन्हें प्रमोशन देकर ग्रुप डी में नौकरी, पेंशन की सुविधा, आवास की व्यवस्था, मुफ्त इलाज की सुविधा मिले और पूरे परिवार के लिए उन्हें साल भर का पास दिया जाए.
इसके अलावा बच्चों को केंद्रीय विद्यालय में शिक्षा की सुविधा, मृत्यु के बाद उनके आश्रितों को रेलवे में नौकरी और रेट कार्ड में बदलाव किए जाएं.
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर कुली का काम करने वाले हाशिम अपने पिता के बैज पर यह काम कर रहे हैं.
हाशिम कहते हैं, "नौकरी नहीं मिली तो मुझे ये काम करना पड़ा. इस बजट से हमें बहुत उम्मीदें हैं. अगर सरकार हमें नौकरी दे देती है तो हम अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलवा पाएंगे. उन्हें हमारी तरह पीढ़ी दर पीढ़ी मजदूरी नहीं करनी पड़ेगी."
पिछले रेल बजट से कुलियों को बहुत निराशा हुई थी. इस बार उन्हें उम्मीद है सरकार उनकी परेशानी को समझेगी और उनकी माँगों पर कोई ठोस क़दम उठाएगी.
163 साल पहले रेलगाड़ी भारतीय व्यवस्था का हिस्सा बनी तभी से कुली इस रेल व्यवस्था का अहम हिस्सा रहे हैं.