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नोटबंदी से फीका हुआ शादियों का मौसम!
- Author, नुसरत जहां
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
कामरान इस्लाम अपने सभी करीबी रिश्तेदारों के साथ बहन सादिया की शादी की तैयारियों में जी-जान से जुटे हैं लेकिन शादी के लिए न तो खरीदारी हो रही है और न ही पकवानों पर बात हो रही है, न गहने पसंद किए जा रहे हैं और न ही कपड़े देखे जा रहे हैं.
दरअसल यह पूरा परिवार हर रोज सुबह उठकर बैंकों के बाहर लाइन में खड़ा हो जाता है और थोड़ा-थोड़ा नकदी निकालकर शाम को अपने घर लौटता है.
कामरान का कहना है कि 18 नवंबर को उसकी बहन और भाई दोनों की शादी है और इसके वास्ते पैसे जुटाने के लिए सभी रिश्तेदार उनकी मदद में लगे हुए हैं. क्योंकि न तो शादी हॉल का मालिक पुराने नोट लेने को तैयार है, न बावर्ची और न ही कोई छोटा या बड़ा दुकानदार. हर किसी को नकदी चाहिए और वह भी नई मुद्रा में.
कामरान कहते हैं कि वह अपनी बहन को देने के लिए सामान नहीं खरीद नहीं पा रहे हैं. बारात के खाने की व्यवस्था भी बहुत कम पैसे में करनी पड़ रही है.
सिर्फ कामरान का परिवार ही नहीं बल्कि कई परिवार इस मुश्किल का सामना कर रहे हैं. इस समय शादियों का सीजन है और लोग सरकार के इस अचानक फैसले से बौखला गए हैं.
ये वो लोग हैं जिनके पास 'काला धन' नहीं बल्कि अपने बच्चों की शिक्षा और विवाह के लिए सालों से जमा की गई राशि है जो इस फैसले के बाद रद्दी के टुकड़ों में बदल गया है.
कामरान का कहना है कि शायद उन्हें अब मुंह दिखाई और शगुन भी पुराने नोटों में देनी पड़े.
तैमूर नकदी की कमी के कारण रोजमर्रा की जरूरत की सब्जियां वजन के हिसाब से नहीं बल्कि गिनती में खरीद रही हैं. तैमूर कहती हैं कि अब वह दो प्याज और तीन टमाटर और चार हरी मिर्चों के हिसाब से सौदा खरीद रही हैं. क्योंकि छोटे बच्चों के साथ वह घंटों बैंक के बाहर लाइन में खड़ी नहीं हो सकतीं. इसलिए बची हुई नकदी थोड़ा-थोड़ा कर खर्च कर रही हैं.
हार्डवेयर का काम करने वाले आफताब का कहना है बैंक के बाहर चार घंटे की मशक्कत के बाद बड़ी मुश्किल से उन्हें दो हजार का नोट मिला लेकिन जब अपने एक वर्षीय बच्चे के लिए दूध का डब्बा लेने गए तो दुकानदार के पास वापस देने के लिए नकदी नहीं था.
भारत एक ऐसा देश है जहां ज्यादातर काम नकदी पर होता है और इस समय देश का लगभग 86 प्रतिशत नकद इस्तेमाल के लायक नहीं रह गया है. नए नोट तो बाजार में हैं लेकिन जनसंख्या और उपयोग के अनुपात से यह अपर्याप्त हैं.
दिल्ली के ही सैयद हामिद ख़िज़्र ने मोदी सरकार के इस फैसले का स्वागत तो किया लेकिन उनका कहना है कि दैनिक जीवन इस समय काफी मुश्किल है क्योंकि इस फैसले को ठीक से लागू नहीं किया गया.
23 साल के मोइज एक ट्रैवल एजेंसी में काम करते हैं. उनका वेतन सीधे उनके खाते में आता है इसलिए मोदी सरकार के इस फैसले से वह संतुष्ट हैं. वह काफी समय से एक छोटे सा मकान खरीदने की कोशिश में थे लेकिन मकान के लिए आधी से अधिक राशि ब्लैक में मांगी जा रही थी जो उनकी हैसियत से बाहर था. लेकिन अब वह उम्मीद कर रहे हैं कि कीमतें कम होंगी और ब्लैक में राशि नहीं देनी पड़ेगी.
मोदी सरकार का यह फैसला सही है या नहीं या फिर यह कि इस फैसले के दूरगामी और बेहतर परिणाम सामने आएंगे या नहीं यह एक अलग बहस है और टीवी चैनलों के एंकर और विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ता चीख-चीख कर यह काम करने में व्यस्त हैं.
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