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कांशीराम के बिना कहां पहुंची बसपा?
- Author, नवीन जोशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
नौ अक्टूबर को कांशीराम का देहांत हुए दस वर्ष हो गए हैं. क्या यह सिर्फ संयोग है कि इस समय उनकी राजनैतिक उत्तराधिकारी मायावती और बहुजन समाज पार्टी सबसे कठिन दौर से गुजर रही है या इसके पीछे कांशीराम का न होना भी एक कारण है?
मायावती को भी शायद इस समय कांशीराम की बहुत जरूरत है. तभी तो वे उनके निर्वाण दिवस पर लखनऊ में 'विशाल रैली' कर रही हैं. पिछले तीन साल इस दिन उन्होंने कोई रैली नहीं की, जैसा कि उससे पहले करती रही थीं. पूरे दलित समाज को एकता का संदेश देने और अपना एकछत्र नेतृत्व दिखाने की आज उन्हें बड़ी जरूरत जो आन पड़ी है.
कांशी राम के कई पुराने साथी और बसपा को खड़ा करने में भागीदार रहे प्रमुख नेता-कार्यकर्ता इस बीच बसपा छोड़ चुके हैं या हाशिए पर हैं. पिछले तीन-चार महीने में आर के चौधरी और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे पुराने नेताओं ने पार्टी छोड़ी है. पार्टी को अलविदा कहने वालों में करीब दर्जन भर विधायक, सांसद और पूर्व सांसद भी हैं. सभी ने मायावती पर अम्बेडकर और कांशी राम के मिशन की अनदेखी करने और टिकट बंटवारे में भारी रकम वसूलने के आरोप लगाए हैं.
पार्टी छोड़ कर जाने वालों ने उन्हें 'दलित की बेटी' की बजाय 'दौलत की बेटी' तक कहा है. ये आरोप मायावती के लिए नए नहीं हैं और पार्टी छोड़ कर जाने वालों का आरोप लगाना भी अजूबा नहीं है. लेकिन यह देखना मौजूं होगा कि क्या कांशीराम के बिना बसपा उनके मिशन से भटक गई है? आक्रामक नेतृत्व की क्षमता देख कर जिस मायावती को कांशीराम ने अपना वारिस घोषित किया था और उम्मीद की थी कि वे मेरे अधूरे कामों को आगे पूरा करेंगी, क्या वह मायावती अब बदल गई हैं?
एक सच तो यह है कि कांशीराम की मृत्यु के अगले ही वर्ष, 2007 के विधान सभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की विधान सभा में पूर्ण बहुमत पाप्त करके मायावती ने कांशीराम का एक बड़ा स्वप्न साकार कर दिखाया था. कांशी राम बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज होने को वह कुंजी मानते थे जिससे दलितों की मुक्ति का ताला खुलता है. विरोधाभास यह कि मायावती ने यह 'कुंजी' उस 'सोशल इंजीनियरिंग' के जरिए हासिल की जिसमें सवर्णों, खासकर ब्राह्मणों का साथ लिया गया और नारे बदले गए.
इस 'सोशल इंजीनियरिंग' से मायावती ने कांशीराम के 'बहुजन' को 'सर्वजन' में बदल दिया था. इसके साथ ही उन्होंने अपनी भाषा और व्यवहार की आक्रामकता बहुत कम कर दी थी ताकि सवर्ण समाज अपमानित महसूस नहीं करे. उनकी बहुमत वाली सरकार में सवर्णों को महत्वपूर्ण भागीदारी दी गई. इससे दलित समाज में बेचैनी फैली. 2012 के विधान सभा चुनाव और 2014 के लोक सभा चुनाव में बसपा की पराजय के लिए इस प्रयोग को भी जिम्मेदार ठहराया गया.
क्या यह कांशीराम के दिखाए रास्ते से विचलन था? क्या कांशीराम इस सोशल इंजीनियरिंग की इजाजत देते? दलित समाज और राजनीति पर शोध करने वाले समाज विज्ञानी बद्री नारायण अपनी पुस्तक "कांशीराम- लीडर ऑफ दलित्स" में लिखते हैं कि मायावती का 'सर्वजन' वास्तव में कांशीराम के प्रयोगों का ही नतीजा था. कांशीराम के 'भागीदारी' सिद्धांत में सभी जातियों और समुदायों को राजनैतिक प्रतिनिधित्व देना शामिल था. 'मनुवादी पार्टी' भाजपा के समर्थन से दो बार यूपी की सत्ता हासिल करने का प्रयोग भी कांशीराम ने ही किया था, जिसकी अम्बेडकरवादियों और वामपंथियों ने कड़ी आलोचना की थी. तब कांशी राम का जवाब होता था- 'अगर हमने भाजपा का सिर्फ एक सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया तो क्या गलत है?'
अपने 'साहिब' के उदाहरणों से सबक लेकर ही सही, 'सर्वजन' की सरकार बनाने के बाद क्या मायावती ने दलितों की मुक्ति का वह ताला खोलने की कोशिश की जो कांशीराम चाहते थे? क्या व्यापक दलित समाज का वास्तविक विकास होना शुरू हुआ?
मायावती के चार बार यूपी की मुख्यमंत्री बनने से, जिसमें पांच साल का एक पूरा कार्यकाल भी शामिल है, दलितों का सामाजिक सशक्तीकरण जरूर हुआ. उन्होंने अपने दमन का प्रतिरोध करना और हक मांगना शुरू किया, लेकिन आर्थिक स्तर पर कुछेक दलित जातियां ही लाभान्वित हुईं. 60 से ज्यादा दलित जातियों में से सिर्फ तीन-चार यानी चमार, पासी, दुसाध और मल्लाह जाति के लोगों के हिस्से ही सत्ता के लाभ, विधायकी, मंत्री पद, नौकरियां, ठेके, आदि आए. कांशीराम ने दलितों के लिए अपना घर-परिवार छोड़ा था और कोई सम्पत्ति अर्जित नहीं की, लेकिन मायावती पर इसके विपरीत खूब आरोप लगे.
मायावती के खिलाफ यह बात प्रमुखता से कही जाती है कि दलित स्वाभिमान की लड़ाई को आर्थिक सशक्तीकरण और दूसरे जरूरी मोर्चों तक ले जाना और सभी दलित जातियों को उसमें शामिल करना उनसे सम्भव नहीं हो पाया या इस तरफ उनका ध्यान नहीं है.
कांशीराम दलितों में महिला-नेतृत्व विकसित करने पर काफी जोर देते थे. मायावती के चयन के पीछे यह भी एक कारण था और वे कहते भी थे कि बसपा में कई मायावतियां होनी चाहिए, लेकिन खुद मायावती के नेतृत्व में कोई नेत्री नहीं उभरी. उन पर आरोप यह भी है कि वे पार्टी में नेताओं को उभरने नहीं देतीं. कांशीराम जिस तरह दौरे करते थे, कार्यकर्ताओं और नेताओं से मिलते थे, मायावती का व्यवहार ठीक उसके उलट है. विधायकों-नेताओं से वे मुश्किल से मिलती हैं और कार्यकर्ता तो उन्हें सभाओं के मंच पर दूर से ही देख पाते हैं.
बसपा में मायावती से नाराजगियां कांशीराम के जीते-जी ही उभरने लगी थीं. कांशीराम का पूरा विश्वास हासिल करने और पार्टी में नम्बर दो की जगह लेने के बाद मायावती के व्यवहार से कांशीराम के करीबी नेता-कार्यकर्ता खिन्न रहने लगे थे. जब भी बसपा नेताओं ने कांशीराम से शिकायत की तो उन्होंने मायावती ही का पक्ष लिया. डॉ. मसूद अहमद जैसे कांशीराम के पुराने सहयोगी को मायावती के खिलाफ आवाज उठाने पर न केवल पार्टी और सरकार से बर्खास्त किया गया था बल्कि सरकारी आवास से उनका सामान तक बाहर फिंकवाया गया था. 2001 में आर के चौधरी को इसी कारण पार्टी छोड़नी पड़ी थी. बाबूराम कुशवाहा का भी वैसा ही हश्र हुआ.
यह सिलसिला आज तक चला आ रहा है. कांशीराम ने जिस मेहनत से पार्टी जोड़ी थी और सहयोगी जुटाए थे, मायावती उतनी ही आसानी से नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा देती हैं.
वे कांशी राम के रास्ते से दूर हो गई हैं, इस आरोप का मायावती जोर-शोर से खण्डन करती रही हैं. 2012 का विधान सभा चुनाव हारने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा था कि कुछ लोग मेरे खिलाफ ऐसा दुष्प्रचार कर रहे हैं. सच्चाई यह है कि मैं मान्यवर कांशीराम के सिद्धांतों के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हूं और पूरे दिल से उनका अनुसरण कर रही हूं.
2012 और 2104 की पराजयों के बाद मायावती के रुख में कुछ बदलाव दिखा है. 'सर्वजन' का प्रयोग उन्होंने पूरी तरह छोड़ा नहीं है लेकिन 'बहुजन' की ओर वापसी की है. 2017 के चुनाव के लिए मायावती मुस्लिम समुदाय का समर्थन हासिल करने पर बहुत जोर दे रही हैं. उन्होंने एक सौ के करीब टिकट मुसलमानों को दिए हैं. मुसलमान कांशीराम के बहुजन का महत्वपूर्ण हिस्सा थे लेकिन मायावती की नजर इस बार उन पर खास इसलिए गई है कि वे मुलायम सिंह से नाराज लगते हैं.
इस वर्ष की शुरुआत में एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने घोषणा की थी कि सत्ता में आने पर अब वे मूर्तियां नहीं लगवाएंगी, हालांकि दलित नेताओं की मूर्तियां स्थापित करना कांशीराम के दलित आंदोलन के सांस्कृतिक-राजनैतिक एजेण्डे का महत्वपूर्ण हिस्सा था.
कांशीराम दलित समाज के सर्वांगीण विकास के लिए राजनैतिक सत्ता हासिल करना जरूरी मानते थे. उनकी नजर अल्पकालीन लाभों में न हो कर बहुत दूर तक जाती थी. एक बार फिर सत्ता पाने के लिए मायावती भी प्रयत्नशील हैं, लेकिन कांशीराम जैसे विजन का उनमें अभाव दिखता है. पिछले दस वर्षों में यूपी के बाहर बसपा का प्रभावी विस्तार भी मायावती नहीं कर पाईं.
अब जबकि बसपा बगावतों से कमजोर हुई दिखती है और भाजपा एवं सपा जैसे प्रबल प्रतिद्वंद्वी मुकाबिल हैं, बसपा के लिए 2017 का चुनाव कड़ी परीक्षा साबित होने वाला है.
बसपा के अब तक के पड़ावों में मायावती का महत्वपूर्ण योगदान रहा है. आगे की यात्रा और भी चुनौतीपूर्ण है. क्या कांशीराम की असली वारिस होने को वे साबित कर सकेंगी?