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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साख बढ़ाने की कोशिश
दुनिया भर के देशों से रिश्ते सुधारने के मामले में भारत का यह साल काफ़ी व्यस्त गुज़रा. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कई देशों की यात्रा की और इराक़ के मसले ने अमरीका के साथ भारतीय रिश्तों की और सत्ता पक्ष की एक तरह से कड़ी परीक्षा भी ली. वर्ष की शुरुआत में ही इराक़ पर अमरीका और सहयोगी देशों के हमले के दौरान भारत में बहस गर्म हुई कि भारत किस ओर है. ऐसे में भारत ने अनुमान के मुताबिक़ ही तटस्थ रवैया अपनाया. उसने इराक़ पर हमले का विरोध बहुत मुखर रूप से नहीं किया और सरकार पर आरोप लगे कि उसने कड़ा रुख़ नहीं अपनाया है. इसके बाद इराक़ में सैनिक भेजने के मसले पर भी काफ़ी राजनीति हुई. अमरीका की ओर से भारत पर काफ़ी दबाव था कि वह इराक़ में सैनिक भेजे मगर घरेलू राजनीति के दबावों के चलते भारत सरकार ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी की अमरीका यात्रा के दौरान ये मसला काफ़ी ज़ोर-शोर से उठा मगर भारत अपने रुख़ पर क़ायम रहा. फिर सद्दाम हुसैन की गिरफ़्तारी के बीद भी भारत के लिए स्थिति दुधारी तलवार पर चलने जैसी हो गई थी. मगर सरकार ने तटस्थ रवैया ही रखा.
वर्ष की शुरुआत में ही प्रधानमंत्री वाजपेयी 22 से 25 फ़रवरी के बीच गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन में हिस्सा लेने मलेशिया गए और वहाँ विभिन्न मसलों पर बातचीत हुई. इसके बाद 27 मई से तीन जून के बीच प्रधानमंत्री जर्मनी, रूस और फ़्रांस की यात्रा पर गए जहाँ इराक़ का मसला भी काफ़ी प्रमुखता से उठा. इन सभी देशों ने इराक़ पर अमरीकी हमले का विरोध किया था. फिर हुई प्रधानमंत्री वाजपेयी की ऐतिहासिक चीन यात्रा जिसमें सीमा विवाद सहित कई मसलों पर चर्चा हुई. माना जा रहा है कि सिक्किम के मसले पर भारत को चीन के रुख़ से कुछ राहत मिली है. पिछले दस साल में भारत के किसी प्रधानमंत्री की ये पहली चीन यात्रा थी. इसके बाद प्रधानमंत्री 16 से 28 सितंबर के बीच तुर्की से होते हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में हिस्सा लेने न्यूयॉर्क गए. वहाँ उनकी मुलाक़ात अमरीकी राष्ट्रपति बुश सहित कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय नेताओं से हुई. प्रधानमंत्री ने पाँच से 12 अक्तूबर के बीच इंडोनेशिया और थाईलैंड की भी यात्रा की.
वाजपेयी के विदेश दौरे का कार्यक्रम अगले माह भी जारी रहा और उन्होंने 11 से 16 नवंबर के बीच रूस, ताजिकिस्तान और सीरिया की यात्रा की. इसके बाद वर्ष के अंत में चार से सात दिसंबर के बीच प्रधानमंत्री राष्ट्रमंडल देशों के प्रतिनिधियों के सम्मेलन में हिस्सा लेने नाइजीरिया भी गए. इस तरह प्रधानमंत्री का साल भर का कार्यक्रम काफ़ी व्यस्त रहा और उन्होंने भारत को एक मज़बूत आर्थिक शक्ति के रूप में दिखाने की कोशिश भी की. वर्ष की एक विवादास्पद यात्रा रही इसराइल के प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन की. हालाँकि इसराइल में एक हमले की वजह से शेरॉन को ये यात्रा बीच में ही छोड़नी पड़ी मगर फिर भी भारत ने इस यात्रा को काफ़ी गंभीरता से लिया सफल भी माना. भारत पारंपरिक तौर पर फ़लस्तीन का समर्थन करता रहा है इसलिए देश के वामपंथी दलों ने इसराइल से बढ़ती इस दोस्ती का विरोध किया. जबकि सरकार का कहना था कि भारत ‘आतंकवाद’ के प्रति इसराइल के सख़्त रवैये से सीख लेने की कोशिश कर रहा है. वैसे सरकार पर ये आरोप भी लगे हैं कि वह अमरीका से रिश्ते सुधारने के लिए बाक़ी देशों से और परंपरागत मित्र राष्ट्रों से रिश्तों को ताक़ पर रख रहा है. इसके अलावा पड़ोसी देशों से भी भारत ने संबंध सुधारने की कोशिश की है. श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों और सरकार के मध्य तनातनी के बीच हमेशा की ही तरह भारत ने इस साल भी मसले के शांतिपूर्ण हल की अपेक्षा जताई. वहीं भूटान नरेश के भारत दौरे में भारत ने उसे मदद करने का वायदा भी किया. इसके बाद भूटान ने अपने देश में अड्डा बनाए पूर्वोत्तर के भारतीय विद्रोहियों के विरुद्ध सख़्त सैनिक कार्रवाई भी की. साल के अंतिम हिस्से में ब्रिटेन के युवराज चार्ल्स भी भारत दौरे पर आए और इस दौरान उन्होंने अनौपचारिक तरीक़े से भारत के विभिन्न हिस्सों का दौरा करके भारत के लिए अपना प्यार ज़ाहिर किया. कुल मिलाकर भारत के लिए विभिन्न देशों से रिश्ते बनाए रखने और संबंध सुधारने के मामले में ये वर्ष काफ़ी व्यस्त गुज़रा. |
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