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अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत
वर्ष 2003 में अगर भारत की अर्थव्यवस्था की बात की जाए तो चाहे प्रकृति की कृपा कहिए या फिर सरकार की नीतियाँ कि देश की आर्थिक स्थिति में सुधार की बात कही जा रही है. एक तरह जहाँ देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा है तो वहीं अच्छे मॉनसून की वजह से उत्पादन भी बढ़ा ही है. इसके साथ ही लगभग 33 महीने के बाद पहली बार मुंबई स्टॉक एक्सचेंज 5000 का आँकड़ा पार कर गया. मगर विनिवेश पर जिस तरह देश के उच्चतम न्यायालय का आदेश आया है उसके बाद आर्थिक सुधार कार्यक्रम प्रभावित हुआ है. इसके अलावा इसी साल उच्चतम न्यायालय ने हड़ताल करने के मज़दूरों के अधिकारों पर भी रोक लगाते हुए प्रतिबंध को ग़ैर-क़ानूनी घोषित कर दिया था. इस बीच सरकार की मध्यवर्षीय समीक्षा में अनुमान व्यक्त किया गया कि सात प्रतिशत से भी अधिक की विकास दर पाने में क़ामयाबी मिलेगी. अर्थशास्त्री राम उपेन्द्रदास शास्त्री का कहना है कि सेवा क्षेत्र तो अच्छा प्रदर्शन कर ही रहा है उद्योग ने भी इस साल अच्छा प्रदर्शन किया है. वैसे अगले साल के बजट में किसानों को भी राहत मिलने की उम्मीद है और देश के वित्त मंत्री का कहना है कि देश को अब दूसरी कृषि क्रांति की ज़रूरत है. उच्चतम न्यायालय ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड और भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड के विनिवेश पर रोक लगा दी और कहा कि इसके लिए संसद की सहमति ज़रूरी है.
इसके बाद अब विनिवेश को लेकर सरकार उहापोह की स्थिति में है. इसके अलावा देश के सामने वित्तीय घाटा नियंत्रित रखना एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. इस मामले में सरकार को जहाँ आय के साधनों के बारे में सोचना होगा वहीं उसे ये भी देखना होगा कि ख़र्च किस तरह कम हो सकता है. अब ख़र्च कम करने में भी ये देखना होगा कि ख़र्च विकास के कार्यक्रमों पर कम न हो बल्कि अनियोजित ख़र्चों में कमी लाई जाए. इसके अलावा सरकार का लक्ष्य है कि वह निर्यात में 12 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी करे मगर इस वित्त वर्ष के पहले छह महीने में यह 10 प्रतिशत ही रहा. वैसे निर्यात में भारत के सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र का बड़ा हिस्सा रहा है. इस साल अप्रैल से सितंबर महीने के बीच इससे 6.5 अरब डॉलर कमाए गए. इस साल कई विदेशी कंपनियों ने आउटसोर्सिंग के ज़रिए नौकरियाँ भारत ले जाने की पहल की है जिससे विदेशों में यूँ तो हायतौबा मची है मगर भारत में सस्ते श्रमिक लगातार कंपनियों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं. साल ख़त्म होते-होते भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने दक्षेस देशों के लिए साझा मुद्रा का प्रस्ताव रखा. ये काफ़ी महत्त्वाकाँक्षी प्रस्ताव है और इस पर अभी कोई फ़ैसला होने की संभावना भी नहीं लगती है. देश में बेरोज़ग़ारी हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है सरकार की कोशिश है कि वर्ष 2007 तक एक करोड़ से भी ज़्यादा रोज़ग़ार के अवसर पैदा किए जाएँ. मगर इसमें सफलता कितनी मिलने के बारे में सोचना एक सुखद स्वप्न की तरह लगता है. वैसे भारत में विकास दर को लेकर जितना ध्यान दिया जा रहा है उसे देखते हुए ये भी कहा जाने लगा है कि कहीं ऐसा न हो कि ये विकास एक 'रोज़ग़ारविहीन विकास' बन जाए. |
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