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नरेंद्र मोदी से ‘ब्रांड मोदी’ तक

ज़ुबैर अहमद

22 जनवरी को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रोच्चार की गूंज के बीच श्रीराम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की तो बिल्कुल साफ़ था कि वो अपनी ‘हिंदू हृदय सम्राट’ की छवि पर पूरी तरह खरे उतरे हैं.

भारत में बहुत से लोग ये मानते हैं कि उन्होंने अपनी ये छवि बहुत सोच-समझकर गढ़ी है. ये एक बड़े नैरेटिव का हिस्सा है. इसका मक़सद आबादी के उस बड़े तबक़े से जुड़ाव बनाना है जो उनके हिंदू राष्ट्रवाद को बहुत पसंद करती है.

टीवी पर लाइव दिखाए गए इस धार्मिक समारोह को उनके आलोचकों और विपक्षी दलों ने ‘हिंदू मतदाताओं को रिझाने की कोशिश’ कहा.

बहुत जल्दी ही भारत के क़रीब 90 करोड़ मतदाता आम चुनावों में हिस्सा लेंगे, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक आयोजन कहा जाता है. नरेंद्र मोदी ने बीजेपी को पिछले दो चुनावों में जीत दिलाई है. उन्हें पार्टी के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर पेश किया जाता है. आख़िर क्या वजह है कि मोदी इतने लोकप्रिय और कामयाब हैं जबकि उनकी राजनीति को कई लोग ‘धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने वाला’ मानते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक ये मानते हैं कि उनकी ज़िंदगी का सबसे गर्व भरा लम्हा वो था जब पिछले साल जून में उन्हें व्हाइट हाउस में सम्मानित किया गया. अमेरिकी संसद के संयुक्त सदन में उनके भाषण के दौरान बार-बार तालियां बजती रहीं.

यह सम्मान उनके लिए निश्चित रूप से निजी जीत जैसा था क्योंकि गुजरात के दंगों के बाद मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप में इसी अमेरिका ने उनके प्रवेश पर रोक लगा दी थी.

मोदी के समर्थकों ने देखा कि अमरीका में मोदी की शान में क़सीदे पढ़े गए, उनके ज़ोरदार स्वागत ने दुनिया को दिखा दिया कि कभी बहिष्कृत रहे मोदी को पश्चिमी देश सलाम कर रहे हैं.

मोदी पर चर्चित किताब ‘मोदीज़ इंडिया’ लिख चुके फ़्रांस के प्रोफ़ेसर क्रिस्टॉफ़ जैफ़रलो कहते हैं कि पश्चिमी देशों में प्रधानमंत्री मोदी को लेकर मिली-जुली राय है.

क्रिस्टॉफ जैफरलो

क्रिस्टॉफ जैफरलो

प्रोफ़ेसर जैफ़रलो कहते हैं:

“जब पिछले साल जुलाई में वे फ़्रांस के दौरे पर आए थे तो उनको लेकर मिली-जुली राय ही थी. उसी दौरान यूरोपीय संसद ने मणिपुर की हिंसा को लेकर प्रस्ताव पारित किया था जिसकी भाषा काफ़ी सख़्त थी. दूसरी बात, उनको पश्चिमी देशों में जो समर्थन मिल रहा है, वो उनकी निजी उपलब्धि नहीं है. पश्चिमी देश चीन के मुक़ाबले भारत को खड़ा देखना चाहते हैं.”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग मायने रखते हैं. कुछ लोगों के लिए वो भारत के ‘सबसे ताक़तवर पीएम’ हैं. वहीं कुछ लोगों की नज़र में वो एक ‘निरंकुश नेता’ हैं. ऐसा मानने वाले लोगों की तादाद काफ़ी बड़ी है कि उनके नेतृत्व में दुनिया में भारत की हैसियत बहुत बढ़ी है.

लेकिन मोदी के आलोचक कहते हैं कि उनकी सरकार ने ‘विरोध की आवाज़ों को दबाकर’ और ‘मीडिया की स्वतंत्रता पर लगाम लगाकर’ भारत में लोकतंत्र को बहुत कमज़ोर कर दिया है. मोदी के आलोचक कहते हैं कि हिंदुत्व और उग्र राष्ट्रवाद पर उनका ज़ोर देना भारत की विविधता भरी संस्कृति के अनुरूप नहीं है.

बहुत से लोग मानते हैं कि मोदी ख़ुद को एक ऐसे टेक्नोक्रैट की तरह पेश करते हैं जिनके काम-काज का तरीक़ा कारोबार, पूंजी निवेश और विकास को बढ़ावा देने वाला है. वैसे पश्चिमी देशों में भारत के बढ़ते दबदबे की बड़ी वजह भारत का विशाल बाज़ार होना भी है.

विरोधी हों या समर्थक, मोदी दोनों के बीच उग्र भावनाएँ जगाते हैं, उनका संयत और संतुलित विश्लेषण शायद ही कभी देखने को मिलता है. 

नरेंद्र मोदी क़रीब दस सालों से सत्ता में हैं. कहा जाता है कि उन्होंने दूसरे नेताओं के लिए कहीं कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी है. वो सब जगह नज़र आ जाते हैं. वो सोशल मीडिया के हर प्रमुख प्लेटफ़ॉर्म पर हैं. वो सरकार के हर मंत्रालय की वेबसाइट के पहले पेज पर हैं. वो रेडियो पर सुनाई देते हैं, टीवी पर भी छाए रहते हैं.

हर जगह होर्डिंग और कट-आउट में वही दिखते हैं. अगर आप उनके साथ अपनी तस्वीर चाहते हैं तो बहुत-से रेलवे स्टेशनों पर सेल्फ़ी-प्वाइंट मौजूद हैं. साइट और ऐप भी हैं. शहरों के चौराहों, हवाई अड्डों, पेट्रोल पंपों, सरकारी संस्थानों और रेलवे के प्लेटफ़ॉर्म तक, हर जगह उनकी मुस्कुराती हुई तस्वीरें नज़र आती हैं. चप्पे-चप्पे पर ऐसी मौजूदगी उनसे पहले किसी और पीएम की कभी नहीं रही.

दिसंबर महीने में उन्होंने अपनी पार्टी को तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत दिलाई. और अब वो अगले कुछ महीनों में होने वाले आम चुनावों की तैयारी में जुट गए हैं.

उनके विरोधी मोटे तौर पर बिखरे हुए हैं और कई बार आपस में ही भिड़ते नज़र आते हैं. पिछले साल जुलाई में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दलों ने आपस में मिलकर विपक्ष की लगभग दो दर्जन पार्टियों का एक गठबंधन बनाया ताकि सब मिलकर उन्हें चुनौती दे सकें. इस गठबंधन ने अपना नाम ‘इंडिया’ रखा यानी इंडियन नेशनल डेवेलपमेंटल इनक्लूसिव अलायंस.

बीजेपी के लिए वे स्टार प्रचारक हैं और उन्हें अकेले ही काफ़ी माना जाता है. 73 बरस के प्रधानमंत्री मोदी का सोशल मीडिया पर ऐसा दबदबा है कि उनका कोई विरोधी उनकी बराबरी नहीं कर सकता.

अमरीका के जाने-माने रिसर्च संस्थान प्यू रिसर्च सेंटर के अगस्त 2023 में किए गए सर्वे के मुताबिक़, भारत में हर दस में से लगभग आठ लोग, प्रधानमंत्री मोदी के बारे में सकारात्मक राय रखते हैं. इनमें वो 55 फ़ीसद लोग भी शामिल हैं जो उन्हें ‘सबसे अच्छा’ या फिर ‘बहुत अच्छा’ मानते हैं. 

अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने उनका एक नायक की तरह स्वागत किया था, इससे पहले डोनाल्ड ट्रंप की गर्मजोशी भी लोगों ने देखी है. लेकिन मोदी को लेकर किए गए प्यू रिसर्च के सर्वे में अमेरिका के 37 प्रतिशत लोगों की राय उनके बारे में अच्छी नहीं है जबकि 21 प्रतिशत लोग उनके बारे में सकारात्मक सोच रखते हैं. वहीं इस सर्वे में शामिल 42 प्रतिशत लोगों ने उनके बारे में कोई राय नहीं दी.

तो सवाल ये है कि भारत में मोदी की लोकप्रियता क्या उनकी अगली चुनावी जीत में तब्दील होगी? मोदी के समर्थकों को कोई शक ही नहीं है कि वो अगला चुनाव भारी बहुमत से जीतने जा रहे हैं. 

लेकिन प्रोफ़ेसर क्रिस्टॉफ़ जैफ़रलो इस आत्मविश्वास को लेकर आगाह करते हैं. वो कहते हैं कि कोई भी लोकप्रिय नेता अजेय नहीं है और तर्क देते हैं:

“(ब्राज़ील में) बोलसोनारो चुनाव हार गए. ट्रंप चुनाव हार गए. अगर ग़रीबी बढ़ती है, असमानता में इज़ाफ़ा होता है, तब लोग शायद ये सोचने को मजबूर हो जाते हैं कि उन्हें सरकार बदलने की ज़रूरत है. ये किसी भी लोकतंत्र का बुनियादी उसूल है. इसे जवाबदेही कहते हैं. कोई भी नेता हमेशा जवाबदेही से परे नहीं हो सकता या अगर कहीं कोई नेता जवाबदेही से परे है तो इसका मतलब है कि वहाँ लोकतंत्र नहीं है.”

मोदी को चुनौती कौन दे सकता है?

इस समय कोई भी नेता इतना मज़बूत नहीं दिखता जो उनकी लोकप्रियता के लिए ख़तरा बन सके. चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर कहते हैं कि उनकी अजेय छवि की वजह विपक्ष का कमज़ोर होना है.

राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के बड़े नेता हैं और वो शायद पीएम मोदी को चुनौती देने वाले विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे भी हैं. लेकिन राहुल गांधी, दो आम चुनावों और कई विधानसभा चुनावों में पहले ही उनके हाथों पराजित हो चुके हैं. मगर वो अब तक सियासी तौर पर उन्हें नुक़सान पहुंचा पाने में नाकाम रहे हैं. हालाँकि कर्नाटक, हिमाचल, तेलंगाना जैसे कुछ राज्यों में उनकी पार्टी को चुनावी जीत मिली है.

ब्रांड बिल्डिंग में संतोष देसाई एक जाना-माना नाम हैं. वो कहते हैं:

“पीएम को चुनौती देने के मामले में राहुल गांधी ईमानदार हैं. उन्होंने अपनी तरफ़ से पुरज़ोर कोशिश की है. लेकिन राहुल में वो बात नहीं दिखती जिससे वो जनता से स्वाभाविक रूप से जुड़ सकें. उनकी कोशिश में कोई कमी नहीं है लेकिन वो क़ुदरती तौर पर जनता से नहीं जुड़ पाते.”

संतोष देसाई

संतोष देसाई

हालांकि, विश्लेषक कहते हैं कि राहुल गांधी ने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के ज़रिए गाँवों और क़स्बों में आम लोगों से जुड़ने की कोशिश की है, और बड़ी हद तक कामयाब भी रहे हैं. बीजेपी उनकी यात्रा को ‘राहुल गांधी को एक बार फिर से लॉन्च करने का रोडशो’ कहकर ख़ारिज करती है. लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि इससे उनकी छवि बेहतर हुई है. 14 जनवरी को राहुल गांधी ने भारत न्याय यात्रा की शुरुआत की. उनकी ये यात्रा पिछली वाली से ज़्यादा दूरी तय करेगी और ये माना जा रहा है कि उन्हें इस यात्रा के ज़रिए आम चुनावों से ठीक पहले जनता से जुड़ने का काफ़ी मौक़ा मिलेगा.

पांच साल पहले हुए आम चुनावों के बाद दिल्ली के एक थिंक टैंक सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ डेवेलपिंग सोसाइटीज़ (सीएसडीएस) ने एक सर्वे कराया था. इस सर्वे में पता चला था कि अगर मोदी अपनी पार्टी की तरफ़ से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होते तो एक-तिहाई मतदाताओं ने बीजेपी को वोट नहीं दिया होता.

भारत जैसे देश में जहां सियासत में कामयाबी अक्सर पारिवारिक रिश्तों की वजह से मिलती है. वहां उनके सेल्फ़-मेड होने की छवि मतदाताओं को ख़ूब लुभाती है. वो उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं क्योंकि वे एक ग़रीब परिवार से आते हैं. उनकी शुरुआती ज़िंदगी ऐसी नहीं थी जो भविष्य में उनकी राजनीतिक सफलता के संकेत देती. युवावस्था में वे अपने गृह राज्य गुजरात में पार्टी के एक मामूली से कार्यकर्ता थे. उनकी निजी वेबसाइट के मुताबिक़, वो गुजरात में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के क्षेत्रीय मुख्यालय में ‘ऑफ़िस ब्वॉय’ थे.

आरएसएस को संघ परिवार का अभिभावक संगठन कहा जाता है. बीजेपी इसका अटूट अंग है. निजी साइट के मुताबिक़, ‘ऑफ़िस ब्वॉय’ का काम था कि वो दफ़्तर को साफ़-सुथरा रखे और रोज़ाना वहां के लिए ज़रूरी सामान ख़रीदकर ले आए.

वे ख़ुद भी अपने अतीत के बारे में कई बातें बताते रहे हैं जिनकी पुष्टि नहीं हो सकी है. मसलन, बचपन के दिनों में वो रेलवे स्टेशन पर चाय बेचा करते थे.

तो वो कौन सी बात है जो उन्हें बाक़ी राजनेताओं से अलग खड़ा करती है? भारत के आम लोगों की भीड़ से उठकर वे कैसे देश के सबसे ताक़तवर व्यक्ति बन गए?

शानदार वक्ता और पोलिटिकल शोमैन?

उनके समर्थक मानते हैं कि वो एक ज़बरदस्त वक्ता हैं. लेकिन उनके विरोधी कहते हैं कि वो बड़े आयोजनों को अपने निजी फ़ायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं. हालांकि, दोनों ही पक्ष ये मानते हैं कि वे एक शोमैन हैं जबकि उनके विरोधी दावा करते हैं कि वे अदृश्य टेलीप्रॉम्पटर के बिना नहीं बोलते. आम लोगों से जुड़ने में उन्हें महारत हासिल है. उन्होंने असरदार सियासी अभियान चलाने के कई नए नुस्ख़े ईजाद किए हैं, जैसे ‘चाय पर चर्चा’ और ‘परीक्षा पर चर्चा’. यहां तक कि उनके राजनीतिक विरोधी भी उनकी भाषण कला का लोहा मानते हैं.

कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने जब मोदी की तारीफ़ की थी तो उन्हें अपनी पार्टी की नाराज़गी झेलनी पड़ी थी. थरूर ने कहा था:

“प्रधानमंत्री बहुत असरदार भाषण देते हैं. वो नए-नए नारे गढ़ते हैं. जुमले ईजाद करने और तस्वीरों से समां बांधने में उनका कोई सानी नहीं है. इसमें कोई शक नहीं है कि हम मोदी के रूप में एक ज़बरदस्त वक्ता को अपने हुनर की नुमाइश करते देख रहे हैं.”

शशि थरूर

शशि थरूर

लेकिन ये भी सच है कि वे एक साधारण कार्यक्रम को भी भव्य आयोजन में तब्दील कर देते हैं. मिसाल के तौर पर पिछले साल अक्टूबर में जब प्रधानमंत्री ने दिल्ली में ‘नमो ट्रेन सेवा’ की शुरुआत की थी तो वो ट्रेन में सफ़र कर रहे लोगों से बात करते दिखाई दिए थे. इनमें स्कूली छात्राएं भी शामिल थीं. एक बार फिर उन्होंने ये संदेश दिया कि वो आम लोगों में कितनी आसानी से घुल-मिल जाते हैं और उनकी परेशानियां समझ लेते हैं.

संतोष देसाई के मुताबिक़, वे किसी भी कार्यक्रम का राजनीतिक फ़ायदा उठाने में माहिर हैं. वो कहते हैं:

“जी-20 के शिखर सम्मेलन को ही लीजिए. सदस्य देशों को बारी-बारी से इसकी अध्यक्षता करने और शिखर सम्मेलन की मेज़बानी का मौक़ा मिलता है. शिखर सम्मेलन की मेज़बानी को किसी भी तरह से उपलब्धि नहीं कहा जा सकता. भारत से पहले इंडोनेशिया में जी-20 शिखर सम्मेलन हुआ था, और भारत के बाद ये मौक़ा ब्राज़ील को मिलेगा लेकिन उन्होंने शिखर सम्मेलन को एक मेगा इवेंट में तब्दील कर दिया.”

विपक्ष का कहना है कि सरकार ने जी-20 शिखर सम्मेलन को प्रधानमंत्री की निजी सफलता के तौर पर प्रचारित किया जबकि सच्चाई तो ये है कि भारत को जी-20 का अध्यक्ष बनना ही था, फिर चाहे देश का प्रधानमंत्री कोई और ही क्यों न होता.

विपक्ष के नेताओं ने जी-20 जैसे गंभीर शिखर सम्मेलन से सियासी फ़ायदा उठाने की कोशिश के लिए मोदी की आलोचना भी की. कांग्रेस के नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि उन्होंने भारत के जी-20 का अध्यक्ष बनने और शिखर सम्मेलन की मेज़बानी को ‘एक हाई-वोल्टेज ड्रामे’ में तब्दील कर दिया.

मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जोयोजीत पाल कहते हैं:

“आप दिल्ली मेट्रो के बारे में सुनते हैं कि ई श्रीधरन नाम के एक शख़्स ने इसे बनाया था. अगर दिल्ली मेट्रो का निर्माण आज होता तो हम कभी नहीं जान पाते कि ये शख़्स कौन था. हमें यही बताया जाता कि मेट्रो मोदी ने बनवाई है.”

प्रोफ़ेसर जोयोजीत पाल

प्रोफ़ेसर जोयोजीत पाल

ऐसा नहीं है कि मोदी केवल अपने भाषण और बॉडी लैंग्वेज से ही अपने लोगों से संवाद करते हैं. वो सार्वजनिक रूप से अपने जज़्बात का भी इज़हार करते हैं और अलग-अलग तरह के लिबास और क्षेत्रों की ख़ास पगड़ियां-टोपियाँ पहनकर उनके ज़रिए भी सियासी संदेश देते हैं. मोदी बहुत सहजता से जनसभाओं में भावुक हो जाते हैं. रोने से वे आम लोगों की नज़र में एक साधारण इंसान बन जाते हैं मगर इससे उनकी एक ताक़तवर नेता होने की इमेज कमज़ोर नहीं होती. उनकी ऐसी भावुकता मतदाताओं को प्रभावित करने में बहुत कारगर साबित हुई है. कभी वो किसी हिंदू साधु की तरह केसरिया चोग़ा पहनते हैं तो कभी मौक़े के मुताबिक़ सैनिक पोशाक में भी नज़र आते हैं.

उनके आलोचक भी ये मानते हैं कि एक साधारण कार्यकर्ता से वैश्विक राजनेता बनने का उनका सियासी सफ़र एक असाधारण उपलब्धि है लेकिन ये सब कुछ यूं ही नहीं हो गया.

दर्शन देसाई गुजरात के एक वरिष्ठ पत्रकार हैं. वो मोदी को उन दिनों से जानते हैं जब वो बीजेपी के एक साधारण नेता थे. दर्शन देसाई कहते हैं कि वे ही अपने राजनीतिक करियर के इकलौते निर्माता हैं और उन्होंने ही बड़ी सतर्कता से अपने इस सफ़र की योजना बनाई और ख़ुद को एक राजनीतिक ब्रांड के तौर पर स्थापित किया. दर्शन देसाई कहते हैं:

“नरेंद्र मोदी बहुत दूर की सोचते हैं. वो बहुत ज़्यादा आगे की सोचते हैं. मुझे पता है कि उन्होंने प्रधानमंत्री बनने के इस सफ़र की योजना बहुत पहले ही तैयार कर ली होगी.”

दर्शन देसाई

दर्शन देसाई


वे 2001 से 2014 के बीच तीन बार गुजरात के मुख्यमंत्री रहे थे. उनके मुख्यमंत्री का पद संभालने के एक साल के भीतर ही 2002 में गुजरात में दंगे हुए थे जिसमें एक हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे, उनमें से अधिकतर मुसलमान थे. उन पर आरोप लगे थे कि उन्होंने इन हत्याओं को रोकने के लिए पर्याप्त क़दम नहीं उठाए, आगे चलकर भारत के सुप्रीम कोर्ट ने उनको तमाम आरोपों से बरी कर दिया.

दर्शन देसाई कहते हैं कि सीएम मोदी ने अपने विरोध में खड़े किए जाने वाले इस मुद्दे से निपटने के लिए गुजरात की जनता में गौरव की भावना जगाई. वो बताते हैं:

“वो सीधे जनता के पास गए और कहा कि ये गुजरात के गौरव का सवाल है. उनके ऊपर किया जा रहा हमला असल में गुजरात के लोगों पर हमला है”.

इमेज बदलने का अभियान

2003 के आस-पास से उन्होंने अपनी छवि बदलने पर काम शुरू किया. इमेज मेकओवर की इस कोशिश में कई बातें शामिल थीं:

वाइब्रेंट गुजरात

ये दुनिया भर के निवेशकों को रिझाकर गुजरात को विश्व मंच पर पेश करने की कोशिश थी.

मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जोयोजीत पाल कहते हैं कि दंगों से पहले उन्होंने अपनी छवि ‘हिंदू हृदय सम्राट’ की बना ली थी. पाल कहते हैं कि उन्होंने अपनी ब्रांडिंग ऐसे नेता के तौर पर की जो हिंदुत्व के लिए लड़ाई लड़ रहा था. प्रोफ़ेसर जोयोजीत पाल कहते हैं:

“ये बेहद असरदार सियासी नारा था और इससे उन्हें ग़ैर-मामूली राजनीतिक सफलता मिली.”

दर्शन देसाई कहते हैं कि इसके बाद वक़्त आया जब वे अपनी ब्रांडिंग ‘विकास पुरुष’ के तौर पर करने लगे इसीलिए 2003 में वाइब्रेंट गुजरात इन्वेस्टमेंट समिट की शुरुआत की गई जो आज भी चल रही है. देसाई कहते हैं, “उन्होंने सोचा कि अगर गुजरात में निवेश आता है तो गुजरात के साथ-साथ उनकी छवि निखरेगी.”

प्रोफ़ेसर जोयोजीत पाल इस कोशिश को इस तरह समझाते हैं:

“जब सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को गुजरात के प्रचार में लगाया गया तो दरअसल सीएम मोदी की छवि को बदलने की कोशिश की जा रही थी. इसके बाद उद्योगपति रतन टाटा गुजरात गए और उसके बाद नारायण मूर्ति भी गए.”

इस तरह उनकी स्वीकार्यता बढ़ती चली गई.


मीडिया मैनेजमेंट

मोदी जब मुख्यमंत्री थे तब से ही उनकी इस बात के लिए अक्सर आलोचना की जाती थी कि वो पत्रकारों के सवालों के जवाब देने के लिए शायद ही कभी प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते हैं. पीएम बनने के बाद पिछले तक़रीबन दस सालों में एक बार भी उन्होंने प्रेस कॉन्फ़्रेंस के ज़रिए पत्रकारों के सवालों के जवाब नहीं दिए हैं.

दर्शन देसाई पुराने दिनों को याद करते हैं:

“गुजरात में जब मोदी मुख्यमंत्री थे तब कुछ संवाददाता सम्मेलन होते थे. शायद एक या दो बार. गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए ही मोदी मीडिया का हर तरह से उपयोग करते थे. यहाँ तक कि आज भी उन्होंने शानदार तरीक़े से मीडिया को मैनेज किया हुआ है. मैं ये बात किसी नकारात्मक अर्थ में नहीं कह रहा हूँ. असल में मीडिया ही फ़रमाबरदार है. वो वही करता है, जो मोदी चाहते हैं.”

उनके आलोचक कहते हैं कि उनके राज में भारत में मीडिया की आज़ादी पर भयंकर ख़तरा मंडरा रहा है. पत्रकारों को ट्रोल किया जा रहा है. उन्हें परेशान किया जा रहा है और यहां तक कि अपना काम करने के लिए उन्हें गिरफ़्तार भी किया जा रहा है. पिछले दस सालों के दौरान, वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम सूचकांक में भारत की रैंकिंग लगातार गिरती जा रही है. पेरिस स्थित ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ ने अपनी 2023 की रिपोर्ट में कहा था कि एक साल पहले की तुलना में मीडिया की आज़ादी के मामले में भारत 180 देशों की लिस्ट में 150वें से गिरकर 161वें पायदान पर आ गया है.

हाल ही में मोदी सरकार ने फ़ैक्ट चेकिंग के लिए एक इकाई स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है. इसका मक़सद सोशल मीडिया की निगरानी करना बताया गया है. हालांकि बहुत से पत्रकारों को डर है कि इसके ज़रिए सरकार सेंसरशिप का दायरा बढ़ाएगी. लेकिन सरकार कहती है कि इस फ़ैक्ट चेक यूनिट का मक़सद फ़ेक न्यूज़ को फैलने से रोकना है. कुछ पत्रकारों ने इस फ़ैसले को क़ानूनी चुनौती दी है.

भारत की मीडिया तो ग़ैर-बीजेपी शासित राज्यों में भी उत्पीड़न का शिकार होती रही है. पहले के ज़माने में भी मीडिया को मुश्किल हालात से गुज़रना पड़ा था, ख़ास तौर से इंदिरा गांधी के शासनकाल में.

प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में परिवर्तन

2011 या इसके आस-पास वो ख़ुद को अपनी पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश करने के लिए तैयार हो रहे थे. ये बहुत बड़ी चुनौती थी क्योंकि उस वक़्त पार्टी के क़द्दावर नेता और उनके राजनीतिक गुरु लालकृष्ण आडवाणी को देश में हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे के तौर पर देखा जाता था. उन्हें भी पार्टी के भीतर आडवाणी की इस हैसियत का एहसास था इसीलिए वे अपने-आपको इतना बड़ा राजनीतिक ब्रांड बनाने में मसरूफ़ थे ताकि उन्हें आडवाणी के विकल्प के रूप में स्वीकार कर लिया जाए.

उनके इस इमेज मेकओवर और राजनीतिक ब्रांडिंग के अभियान में कुछ ऐसे वीडियो और तस्वीरें भी शामिल थीं जिनमें उनको एक क़द्दावर नेता के तौर पर पेश किया गया था.

एक पुराने फ़ोटो सेशन की इन तस्वीरों को ही लीजिए. ये फ़ोटोशूट 2011-12 में उस वक़्त किया गया था, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे. इन तस्वीरों में धुंध भरी सुबह दिखती है. शांत माहौल नज़र आता है और इर्द-गिर्द बत्तख़ें तैरती दिखाई देती हैं, जो शांति का आभास देती हैं. इन तस्वीरों में ऐपल का एक लैपटॉप और एक डीएसएलआर कैमरा भी देखा जा सकता है. उनकी इन तस्वीरों में अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा की किताब भी दिखती है. इन तस्वीरों में मोदी पेड़ के नीचे आराम से बैठकर इकोनोमिक टाइम्स अख़बार पढ़ रहे हैं.

प्रोफ़ेसर जोयोजीत पाल ने 2016 में अपने एक कैम्पस लेक्चर में इन तस्वीरों को अपने छात्रों को दिखाकर ये बताया था कि उन्होंने किस तरह ‘ख़ास तौर से तैयार’ संदेश लोगों तक पहुंचाया. इन तस्वीरों के ज़रिए वे बता रहे थे कि वो आज के दौर के नेता हैं, जो शांति को बढ़ावा देते हैं और टेक्नोलॉजी के साथ क़दम मिलाकर चलते हैं.

उस वक़्त उनकी छवि बनाने में जुटे ब्रांड गुरुओं के सामने चुनौती ये थी कि वो किस तरह मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के योग्य नेता के तौर पर पेश करें. जैसा कि क्रिएटिव डायरेक्टरों के उस्ताद प्रह्लाद कक्कड़ कहते हैं:

“हमारे पेशे का राज़ ये है कि आप कैसे एक नेता को एक राजनेता में तब्दील कर देते हैं. अब अगर आप किसी राज्य के मुख्यमंत्री हैं, तो आप नेता हैं, मगर राजनेता नहीं. अगर आप किसी राज्य के मुख्यमंत्री हैं, तो ज़ाहिर है कि पूरा देश आपको नहीं जानता.”

प्रह्लाद कक्कड़

प्रह्लाद कक्कड़

प्रह्लाद कक्कड़ उस टीम का हिस्सा थे, जिन्होंने प्रधानमंत्री बनने से पहले उनके प्रचार अभियान के लिए काम किया था. वो कहते हैं कि उस वक़्त उन लोगों ने ‘गुजरात मॉडल’ के विचार को प्रचारित किया था.

कक्कड़ कहते हैं, “हमने सुनिश्चित किया कि लोगों को ये पता चले कि उन्होंने किस तरह गुजरात को इतनी ऊंचाई पर पहुंचाया और अब वो उसी मॉडल के आधार पर पूरे देश को महान बनाने जा रहे हैं.”

उसके बाद से ही गुजरात मॉडल को ख़ूब प्रचारित किया गया. प्रोफ़ेसर जोयोजीत पाल कहते हैं कि जब तक 2014 के चुनाव का प्रचार अभियान शुरू हुआ उस समय तक नरेंद्र मोदी एक राष्ट्रीय ब्रांड बन चुके थे.

सोशल मीडिया का उपयोग

सोशल मीडिया पर नरेंद्र मोदी को फ़ॉलो करने वालों की विशाल फ़ौज है. दुनिया में ऐसे कम राजनेता हैं, जिनके यू-ट्यूब, इंस्टाग्राम, फ़ेसबुक और ट्विटर पर उनसे ज़्यादा फ़ॉलोअर्स हों.

मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर जोयोजीत पाल ने 'ब्रांड मोदी' को आगे बढ़ाने और उसके विस्तार में सोशल मीडिया की अहम भूमिका की बड़ी गहराई से पड़ताल की है. प्रोफ़ेसर पाल ने उनके लगभग छह हज़ार ट्वीटों का विश्लेषण किया है, जो उन्होंने 2009 से 2015 के बीच किए थे. प्रोफ़ेसर पाल कहते हैं कि उस वक़्त सोशल मीडिया पर उनको इस तरह पेश किया जाता था जैसे “देश में उनके जैसा कोई दूसरा नेता नहीं है.”

वो कहते हैं:

“ब्रांड बनाने की इस मुहिम में उन्हें एक ऐसे शख़्स के तौर पर पेश किया, जो सब कुछ कर सकते हैं. वो मन की बात कर सकते हैं. वो योग कर सकते हैं. वो राजनीतिक भाषण दे सकते हैं. वो इम्तिहान में बैठने वाले छात्रों के गुरु बन सकते हैं. वो ऐसे शख़्स हैं जिनकी मेहनत हर काम के पीछे है. तो अगर आज देश आगे बढ़ रहा है, तरक़्क़ी कर रहा है तो ये सिर्फ़ उनकी वजह से मुमकिन हो सका है.”



प्रोफ़ेसर क्रिस्टॉफ़ जैफ़रलो कहते हैं:

“हम पक्के तौर पर तो ये नहीं कह सकते हैं कि मोदी को सोशल मीडिया ने भारत का प्रधानमंत्री बनाया लेकिन हम इस निष्कर्ष पर ज़रूर पहुंच सकते हैं कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने में सोशल मीडिया की भी बड़ी भूमिका रही. ठीक उसी तरह जैसे डोनाल्ड ट्रंप की जीत में या फिर हंगरी में विक्टर ओरबान और ब्राज़ील में बोलसोनारो के जीतने में. लोकप्रिय होने के लिए आम जनता से सीधे तौर पर जुड़ना अहम है और इसके लिए सोशल मीडिया भी एक सटीक हथियार है.”

प्रोफ़ेसर जोयोजीत पाल के मुताबिक़:

“सोशल मीडिया पर उनके सफ़र की शुरुआत ऑर्कुट से हुई थी. सोशल मीडिया का ये प्लेटफ़ॉर्म अब बंद हो चुका है. ट्विटर पर आने के बाद उन्होंने लोगों से सीधे बात करना शुरू कर दिया. मोदी का ट्वीट पढ़ने वाले किसी भी इंसान को लगेगा कि वो उससे सीधे, अपनी आवाज़ में बातें कर रहे हैं.”

अपने रिसर्च में प्रोफ़ेसर पाल इस नतीजे पर पहुंचे कि तीन चरणों में उन्हें एक मज़बूत ब्रांड बनाया गया. वो कहते हैं कि पहले चरण में उनके नाम को आगे बढ़ाने और स्वीकार्यता की मुहर लगवाने के लिए उद्योगपतियों और सेलेब्रिटीज़ का इस्तेमाल किया गया. दूसरे चरण की शुरुआत उस वक़्त हुई जब उन्होंने अपनी सरकार के लिए प्रचार करना शुरू किया. तब 'स्वच्छ भारत', 'डिजिटल इंडिया' और 'बेटी बचाओ' जैसे अभियानों को सोशल मीडिया पर प्रचारित किया गया. उस समय ये दिखाने की कोशिश की गई कि वो सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपने या अपनी पार्टी के फ़ायदे के लिए नहीं, बल्कि देश की बेहतरी के लिए कर रहे हैं. वो ये इशारा कर रहे थे कि वे जो कुछ कर रहे हैं पूरे देश के लिए कर रहे हैं.

प्रोफ़ेसर पाल कहते हैं, 'ब्रांड को प्रमोट करने का तीसरा दौर उस वक़्त शुरू हुआ, जब 2019 के आम चुनाव क़रीब आ रहे थे. उन्होंने एक बार फिर से अपनी ताक़त दिखानी शुरू की. अब वो पुराने मोदी नहीं रह गए. वो अब ऐसे नेता बन गए थे, जो ये कह रहे थे कि 'ये देश मेरे बग़ैर नहीं चल सकता. मेरे बिना ये देश सुरक्षित नहीं रहेगा.'

प्रोफ़ेसर पाल मानते हैं कि 'ब्रांड मोदी' का अभियान लगातार जारी रहता है. ये अंतहीन सिलसिला है. वो कहते हैं:

“पिछले चार-पाँच साल से 'विश्व गुरु' ब्रांड को प्रचारित करने की शुरुआत की गई है. उन्हें दुनिया भर के नेताओं के साथ बातें करते हुए दिखाया जाता है. वो अब ये संदेश दे रहे हैं कि जिस तरह मैं आपका गुरु हूँ, उसी तरह मैं पूरी दुनिया का गुरु बन सकता हूँ. 2024 के चुनावों में हम इस ब्रांड के प्रमोशन के एक नए दौर को देखेंगे.”

 'ब्रांड मोदी' की कमज़ोरी

आज देश में बहुत से लोगों का ये मानना है कि मोदी इतने बड़े ब्रांड बन गए हैं कि वो अपनी पार्टी से भी बहुत बड़े हो गए हैं. जैसा कि दर्शन देसाई कहते हैं:

“अगर आप राजनीतिक परिदृश्य से उनको हटा दें तो बीजेपी कुछ नहीं है. बीजेपी की नीति उनकी नीति है. जब वो मुख्यमंत्री थे तब मुख्यमंत्री कार्यालय नीतियां बनाता था और सरकार चलाता था. आज वो प्रधानमंत्री हैं तो आज पीएमओ नीतियां बनाता है. पूरी सरकार चलाता है. आज उनको पार्टी की उतनी ज़रूरत नहीं है, जितनी पार्टी को उनकी ज़रूरत है.”

संतोष देसाई की राय में मोदी अपनी कैबिनेट और पार्टी दोनों में, बाक़ी सभी मंत्रियों और नेताओं से ऊपर माने जाते हैं. संतोष देसाई कहते हैं:

“जब वो कैबिनट की बैठकों में भाग लेते हैं, तो भी वो अलग बैठते हैं. वो साफ़ तौर पर दिखाते हैं कि वो नेता हैं और बाक़ी सब उनके अनुयायी हैं. वो संदेश देते हैं कि मैं नेता हूं. मैं तुम सबसे अलग हूं. मैं तुम सबसे ज़्यादा समझता हूं.”

लेकिन प्रोफ़ेसर जैफ़रलो मानते हैं कि मोदी का ये विराट व्यक्तित्व लंबी अवधि में पार्टी के हक़ में नहीं है. प्रोफ़ेसर जैफ़रलो कहते हैं:

“मुझे तो साफ़ तौर पर दिखता है कि मोदी भले ही बेहद लोकप्रिय बने हुए हैं, मगर पार्टी की लोकप्रियता वैसी नहीं है और बीजेपी उन जैसा कोई दूसरा ब्रांड बनाने की स्थिति में भी नहीं है. आज मोदी ही बीजेपी हैं. हम पहले भी कुछ कुछ ऐसा ही नज़ारा देख चुके हैं. साठ और सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को भी इसी तरह बदल डाला था और और बाद में कांग्रेस को इसका बहुत नुक़सान उठाना पड़ा. अब बीजेपी भी उसी रास्ते पर चल रही है. एक दिन ये सवाल भी उठ सकता है कि मोदी के बाद कौन? और तब, वो बदलाव बहुत मुश्किल होने वाला है.”

किसी को भी इस सवाल का जवाब नहीं पता और मोदी के उत्तराधिकारी के बारे में पार्टी की तरफ़ से चुप्पी अख़्तियार की गई है. फ़िलहाल तो ऐसा लगता है कि बीजेपी ने मोदी के बाद के दौर के बारे में सोचना भी नहीं शुरू किया है.

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर तर्क देते हैं कि 'ब्रांड मोदी' की कमज़ोरी की बात करना ख़याली पुलाव पकाना है. प्रशांत किशोर मानते हैं कि मोदी और उनकी पार्टी के पास ऐसी ताक़त है, जो उनके सबसे बड़े विरोधियों के पास नहीं है.

किशोर सवालिया अंदाज़ में कहते हैं कि:

“बीजेपी के बार-बार जीतने के पीछे कौन सी ताक़त है? ये हिंदुत्व पर आधारित विचारधारा है और एक बड़ा हिंदू वोट बैंक है, जो मोदी को हिंदुत्व के नाम पर वोट देता है. उनकी दूसरी ताक़त है नव-राष्ट्रवाद या फिर उग्र राष्ट्रवाद. तीसरी ताक़त है, सरकारी योजनाओं के फ़ायदे सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाना. फिर चाहे वो शौचालय हों, किसानों की मदद हो या फिर आवास योजनाएं. और उनकी चौथी ताक़त चुनाव लड़ने की क्षमता और धन बल है. अगर आप मोदी और बीजेपी को हराना चाहते हैं, तो आपको इनमें से दो या तीन पैमानों पर उनसे बेहतर होना होगा.”

ऐसी अनेक योजनाएँ हैं जिनके ज़रिए उन्होंने करोड़ों लोगों तक पहुँच बनाई है, ये लोग पहले सरकार की नज़रों से ओझल थे. ऐसे लोगों की तादाद करोड़ों में है जिनके जीवन का पहला बैंक खाता खुला. ऐसे लोगों की तादाद बहुत बड़ी है जिन्हें अपना मकान मिला और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं के तहत लोगों तक सीधे पैसा पहुँच रहा है, वहीं सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ 80 करोड़ ज़रूरतमंद लोगों तक मुफ़्त अनाज पहुँच रहा है. इन कल्याणकारी योजनाओं को मोदी की गारंटी कहकर पहले से ही मज़बूत ब्रांड को और ताक़त दी जा रही है.

अपनी विरासत पर काम कर रहे हैं

एक बार हरियाणा के एक मंत्री ने दावा किया था कि मोदी तो महात्मा गांधी से भी ‘बड़े ब्रांड’ हैं. पीएम मोदी चाहते हैं कि नए आत्मनिर्भर भारत के निर्माता के तौर पर उन्हें याद किया जाए. अगर नेहरू आज़ाद भारत के निर्माता थे तो मोदी चाहेंगे कि उन्हें आधुनिक, आत्मनिर्भर, आत्मविश्वास और समृद्धि से भरे भारत के निर्माता के तौर पर याद किया जाए.

प्रोफ़ेसर क्रिस्टॉफ़ जैफ़रलो कहते हैं, “जिस तरह मुंबई को अपग्रेड किया जा रहा है, जिस तरह दिल्ली में बड़े पैमाने पर निर्माण हो रहा है, तो इस बात के संकेत तो पहले ही दिख रहे हैं कि आने वाली नस्लों के लिए ये एक संदेश छोड़ जाएंगे. इतिहास में पहले के लोगों ने जो कुछ किया, ये उसी का नया संस्करण है जिस पर वे अपनी छाप छोड़ना चाहते हैं.”
'द क्रुकेड टिम्बर ऑफ़ न्यू इंडिया' के लेखक पराकला प्रभाकर ज़ोर देकर कहते हैं कि मोदी के नेतृत्व में भारत की राजनीति हिंदुत्व की तरफ़ झुक गई है. वो कहते हैं कि आज तो पूरी चर्चा ही धर्मनिरपेक्षता से बदलकर हिंदुत्व वाली हो गई है.

हाल ही में करण थापर को दिए एक इंटरव्यू में पराकला प्रभाकर ने कहा:

“दस पंद्रह साल पहले हमारे देश में राजनीतिक संवाद धर्मनिरपेक्षता के इर्द-गिर्द हुआ करता था. बीजेपी तब कहा करती थी कि वो सेक्यूलर हैं, सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष हैं. कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता नक़ली है, बाक़ी सारी पार्टियां भी छद्म धर्मनिरपेक्ष हैं. मैं कहना ये चाहता हूं कि बीजेपी ने धर्मनिरपेक्षता को हाशिए पर नहीं धकेला. मोदी के राज में धर्मनिरपेक्षता को पूरी तरह किनारे लगा दिया गया है.”

अपनी किताब में वो लिखते हैं:

“ये हैरानी की बात है कि हिंदू बहुसंख्यकवाद की विचारधारा जितनी ज़्यादा आज स्वीकार्य है, इतनी तो वो आज़ादी के तुरंत बाद के वर्षों में भी नहीं थी. मौजूदा सरकार अपनी सियासी वैधता को अपने काम-काज से हासिल नहीं करती. वो अपनी उपलब्धियों से सत्ता पर दोबारा क़ाबिज़ नहीं होती. असल में उसे ये ताक़त हिंदू पहचान पर ज़ोर देने और ग़ैर-हिंदू समुदायों को निशाना बनाने से मिलती है.”

प्रह्लाद कक्कड़ लोकतंत्र के समर्थक हैं और वो ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जो आज के भारत से कहीं अधिक संतुलित हो. लेकिन वो ये भी कहते हैं कि लोगों को मोदी पर बहुत अधिक भरोसा है. कक्कड़ कहते हैं, “मध्यम वर्ग जो आम तौर पर मोदी भक्त नहीं है, वो भी मोदी पर गहराई से विश्वास करता है क्योंकि इस तबक़े को लगता है कि उन्होंने इस देश को मज़बूती से एकजुट किया है.”

इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी की विरासतों में से एक ताक़तवर नेता की छवि आने वाले समय में भी बनी रहेगी.

बड़ा सवाल तो ये है कि उनकी ये विरासत भारत को किस मोड़ पर ले जाकर खड़ा करेगी? सवाल ये भी है कि एक अरब चालीस करोड़ आबादी वाला भारत जैसा व्यापक जातीय, धार्मिक, भाषाई और सामाजिक विविधताओं से भरा देश, उस वक़्त किस मक़ाम पर खड़ा होगा? कुछ लोग हैं जिन्हें डर है कि तब तक भारत की अनेकता और विविधता हमेशा के लिए तबाह हो चुकी होगी. वहीं, कुछ दूसरे लोगों को लगता है कि असल में तो ये देश की उस मूल पहचान का उभार है जिसका लंबे समय से इंतज़ार था.

रिपोर्ट: ज़ुबैर अहमद
इलस्ट्रेशन: पुनीत बरनाला
प्रोडक्शन: शादाब नज़्मी
फ़ोटो: गेटी