ராகுல் காந்தியால் ஒரு பிராண்டாக மாற முடிந்ததா?


राहुल गाँधी: क्या एक ब्रांड बन पाए हैं?
फ़ैसल मोहम्मद अली
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में कम होती सर्दी के बीच चुनावी पारा बढ़ता जा रहा है. एक तरफ़ एनडीए दिन-ब-दिन मज़बूत होता दिख रहा है, तो दूसरी तरफ़ विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' की गांठ ढीली पड़ने की बात कही जा रही है.
2024 के आम चुनाव में मुख्य मुक़ाबला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ताधारी बीजेपी और 50 से कम सीटों तक सिमट चुकी कांग्रेस पार्टी के बीच ही दिख रहा है.
और शायद यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ज़्यादातर राजनीतिक भाषणों को नेहरू-इंदिरा-राहुल गाँधी और कांग्रेस पर केंद्रित रखा है.
मोदी और उनकी पार्टी के दूसरे नेता कांग्रेस और ख़ास तौर पर राहुल गाँधी पर लगातार प्रहार करते रहे हैं. राहुल गाँधी की एक ख़ास तरह की इमेज बनाने की भी कोशिश करते रहे हैं. सवाल है कि आख़िर ऐसा करने के पीछे क्या कारण हो सकता है?

एक वजह तो यह हो सकती है कि कांग्रेस अब भी सत्तारूढ़ बीजेपी के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को सीटें कम मिलीं लेकिन उन्हें तक़रीबन 20 प्रतिशत वोट मिले थे.
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तारिक़ अनवर बीबीसी से बातचीत में राहुल गाँधी पर लगातार सियासी हमले के बारे में कहते हैं:
"वर्तमान समय में राहुल गाँधी ही उन गिने-चुने नेताओं में से हैं जो मुल्क के हालात को लेकर दूर तक सोच रहे हैं और बीजेपी को चैलेंज कर रहे हैं."
ब्रांड गुरु संदीप गोयल मानते हैं कि राहुल गाँधी
“कुछ न कुछ सही कर रहे हैं. और कांग्रेस अगर आज भी मैदान में है तो उसकी बहुत बड़ी वजह 'ब्रांड राहुल' है.”

मुंबई से टेलीफ़ोन पर बीबीसी से बात करते हुए संदीप गोयल कहते हैं:
“नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले हालांकि 'ब्रांड राहुल' बहुत ही छोटा ब्रांड है.”

नरेंद्र मोदी से ‘ब्रांड मोदी’ तक
मगर इसके साथ ही वो एक सवाल भी जोड़ देते हैं कि वर्तमान समय में राजनीति के मैदान में क्या कोई भी व्यक्ति नरेंद्र मोदी की तुलना में खड़ा हो सकता है?
तारिक़ अनवर के दावे या फिर संदीप गोयल की बात को अगर सही मान लें तो अगला सवाल उठता है कि राहुल गाँधी किस तरह से बीजेपी को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं?
जब प्रधानमंत्री मोदी भी चौंक गए

बात कोई छह साल पुरानी है, लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस जारी थी. राहुल गाँधी कह रहे थे:



"आपके अंदर मेरे लिए नफ़रत है. आपके अंदर मेरे लिए ग़ुस्सा है. आपके लिए मैं पप्पू हूँ. आप मुझे अलग-अलग गाली दे सकते हैं. मगर मेरे अंदर आपके ख़िलाफ़ इतना सा भी ग़ुस्सा, इतनी सी भी नफ़रत, इतना सा भी क्रोध नहीं है क्योंकि मैं कांग्रेस हूँ, ये सब कांग्रेस हैं. और कांग्रेस ने और इस भावना ने इस देश को बनाया है".
भाषण के ख़त्म होने के फ़ौरन बाद वो प्रधानमंत्री मोदी की सीट की तरफ़ बढ़े और उनके गले लग गए.
समाजशास्त्री शिव विश्वनाथन ने इस क्षण (गले लगने) को इतिहास का दोहराना बताया था:
"जब विरोधी दल अहम मौक़ों पर भेदभाव भूल जाते थे. जैसे अटल बिहारी वाजपेयी सोनिया गाँधी का बहुत आदर करते थे. आज राहुल गाँधी ने उस इतिहास की याद दिला दी. ये आपको बताता है कि ऐसा बहुत सारा इतिहास है जिन्हें मोदी को समझना होगा."
हालांकि बाद में अपने भाषण में नरेंद्र मोदी ने राहुल गाँधी के ‘गले लगने’ को ‘गले पड़ना’ बताया.
‘मोहब्बत की दुकान’

राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद ख़ास तौर पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बीजेपी के राजनीतिक अभियान के केंद्र में रहा है.
इसके जवाब में राहुल गाँधी की ज़ुबान से ‘मोहब्बत की दुकान’ और ‘विचारधारा की लड़ाई’ जैसे शब्द पिछले चंद सालों में बार-बार सुने जाते रहे हैं.
कुछ लोगों का मानना है कि इनके माध्यम से वो राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति को परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं.
ऐसा माना जाता है कि हाल की उनकी दोनों यात्राओं ‘भारत जोड़ा यात्रा’ और ‘भारत जोड़ो न्याय यात्रा’ के पीछे शायद यही सोच काम कर रही है.
पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष ने दिसंबर में हुई पार्टी की स्थापना दिवस रैली के दौरान नागपुर में कहा था:
“लोगों को लगता है कि ये राजनीतिक लड़ाई है, सत्ता के लिए, मगर इस लड़ाई की नींव में विचारधारा है.”
प्यार बांटते चलो मगर...

राहुल गाँधी अपनी कांग्रेस पार्टी को धर्मनिरपेक्ष विचारधारा वाले ख़ेमे में रखते हैं जो उनके अनुसार 'आरएसएस-बीजेपी जैसी नफ़रत फैलाने वाली ताक़तों' के ख़िलाफ़ खड़ी है.
राहुल गाँधी का मानना है कि उनकी विचारधारा प्यार बांटने में यक़ीन रखती है जिसके लिए उन्होंने 'मोहब्बत की दुकान' खोली है.
वो कहते हैं:
“नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान खोल रहा हूँ. आप मुझसे नफ़रत करो, आप मुझे गाली दो. ये आपके दिल की बात है. आपका बाज़ार नफ़रत का, मेरी दुकान मोहब्बत की. और सिर्फ़ मैं अपनी बात नहीं कर रहा हूँ.”
उन्होंने आगे कहा:
"ये मत सोचिए कि ये सिर्फ़ राहुल गाँधी बोल रहा है. ये जो पूरा का पूरा संगठन है जिसने देश को आज़ादी दिलाई, महात्मा गाँधी जैसे लोग, जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, आंबेडकर जी, आज़ाद, इन सबने मोहब्बत की दुकान खोली थी. वही हम कर रहे हैं."
भाषण के एक हिस्से में उन्होंने बीजेपी के लोगों को भी मोहब्बत की दुकान खोलने की दावत दी.
बीजेपी ने राहुल गाँधी की ‘मोहब्बत की दुकान’ को ‘नफ़रत का मॉल’ क़रार दिया, एक ऐसी जगह जहां बीजेपी के अनुसार 'परिवारवाद', 'जातिवाद', 'नफ़रत' और 'तुष्टीकरण' जैसी चीज़ें मिलती हैं.

अंग्रेज़ी अख़बार हिन्दुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा मानते हैं कि राहुल गाँधी को लगता है कि भारत इन्हीं विचारों की नींव पर खड़ा है.
जाने-माने चुनावी रणनीतिकार और जनसुराज अभियान के संयोजक प्रशांत किशोर राहुल गाँधी की इस समय हो रही यात्रा को सही नहीं बताते हैं.
वो कहते हैं:
“जब आपको मुख्यालय (दिल्ली) में होना चाहिए था तब आप यात्रा लेकर क्षेत्र में हैं.”
जनता दल (यूनाइटेड) के महासचिव केसी त्यागी कहते हैं:
"धर्मनिरपेक्षता सिर्फ़ आरएसएस को गाली देना नहीं है, न ही धर्म-निरपेक्षता मुस्लिम परस्ती है, ये एक संपूर्ण प्रक्रिया है जो आज़ादी के आंदोलन से तैयार हुई है".
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा:
"इसके लिए वाक द टॉक की ज़रूरत है, यानी जो कह रहे हैं उसे करके दिखाने की."
इस सिलसिले में वो मुलायम सिंह यादव की मिसाल देते हैं जिन्हें बाबरी मस्जिद को बचाने की कोशिशों के लिए भारी विरोध झेलना पड़ा था. या जिस तरह के हालात का सामना पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों को लागू करने के लिए किया जिसके कारण उनकी सरकार तक गिर गई.

केसी त्यागी की पार्टी हाल तक कांग्रेस के साथ 'इंडिया' गठबंधन का हिस्सा थी. लेकिन हाल में ही उनके नेता नीतीश कुमार ने एक बार फिर से बीजेपी के साथ जाने का फ़ैसला किया और अब जेडीयू एनडीए में है. बीबीसी की केसी त्यागी से बातचीत तब हुई थी जब उनका दल 'इंडिया' गठबंधन का हिस्सा था.
राहुल गाँधी भले ही आरएसएस और बीजेपी पर हमले करते रहें लेकिन ख़ुद उन पर और उनकी पार्टी पर सॉफ़्ट हिंदुत्व के रास्ते पर चलने के आरोप लगते रहे हैं.
कांग्रेस और सॉफ़्ट हिंदुत्व

वरिष्ठ पत्रकार क़ुर्बान अली धर्मनिरपेक्षता और सॉफ़्ट हिंदुत्व की बात को राहुल गाँधी के पिता के समय ले जाते हैं. वो कहते हैं कि राजीव गाँधी ने एक ही साथ हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेलना शुरु कर दिया था.
बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं:
"राजीव गाँधी पहले ग़रीब मुस्लिम महिला शाहबानो के पक्ष में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को पलटने के लिए क़ानून लाए जब उन पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगा तो उन्होंने दशकों से बंद बाबरी मस्जिद का ताला खुलवा दिया."

बाबरी मस्जिद का ताला किस डील के तहत खुला?
क़ुर्बान अली धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राहुल गाँधी के संघ विरोध में भी विरोधाभास देखते हैं.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "एक तरफ़ तो वो आरएसएस का विरोध धर्मनिरपेक्षता के नाम पर करते हैं और दूसरी तरफ़ गुजरात विधानसभा के लिए अपना चुनाव प्रचार एक मंदिर से शुरु करते हैं, ख़ुद को शिव-भक्त जनेऊधारी ब्राह्मण बताते हैं और दूसरी तरफ़ जातीय जनगणना की बात भी आजकल कर रहे हैं."
ख़ुद को उच्च कुल का दत्तात्रेय ब्राह्मण बताने का राहुल गाँधी का ये अकेला प्रयास न था. तक़रीबन पाँच साल पहले 2019 के लोकसभा चुनाव को कुछ ही महीने बाक़ी थे, कांग्रेस तब निचले सदन में 44 के आंकड़े पर थी, राहुल गाँधी पार्टी के अध्यक्ष थे.
समाचार एजेंसी पीटीआई ने एक तस्वीर जारी की, राजस्थान के पुष्कर में मंदिर में टीका लगाए पंडितों से घिरे पोथी देखते राहुल गाँधी.
बाद में मंदिर के एक पुजारी के हवाले से छपी ख़बरों में कहा गया कि राहुल गाँधी ने अपना गोत्र दत्तात्रेय बताया और ये भी कहा कि वो कश्मीरी ब्राह्मण हैं. राहुल गाँधी की गोत्र और जाति वाली तस्वीर को पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह ने इस संदेश के साथ शेयर किया कि बीजेपी को और कितने प्रमाण चाहिए?
राहुल गाँधी पर आरोप है कि एक तरफ़ वो जातिगत जनगणना करवाने की बात करते हैं जिसके मूल में समाज में जाति के नाम पर फैले भेदभाव को ख़त्म करना है, और दूसरी तरफ़ वो ख़ुद को ब्राह्मण बताकर पुरानी जातिवादी लकीर को और गहरी कर रहे हैं.
बिहार सरकार के जाति जनगणना करवाने और उसके आधार पर आरक्षण बढ़ाने के फ़ैसले के बाद राहुल गाँधी कह रहे हैं कि केंद्र में अगर उनकी सरकार बनती है तो वो देशव्यापी स्तर पर जाति जनगणना करवाएँगे.
जाति के सवाल को लेकर अगर राहुल गाँधी की नीति साफ़ नहीं दिखती तो सांप्रदायिकता के मसले पर भी उनका या उनकी पार्टी का रवैया अक्सर ख़ामोशी वाला रहा है.
मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की तत्कालीन भूपेश बघेल सरकार ने हिंदू-मुस्लिम हिंसा मामले में मुआवज़े को लेकर दो समुदाय के लोगों से दो तरह का व्यवहार किया.

बस्तर में ईसाई धर्म को मानने वाले आदिवासियों को गांव में शवों तक को दफ़नाने से रोका जाता रहा और पुलिस पर आरोप लगा कि वो मूकदर्शक बनी रही. मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ हिंदू राष्ट्र के पैरोकार विवादित गुरु धीरेंद्र शास्त्री के चरणों में दिखे.
इन मामलों में कभी भी राहुल गाँधी का कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया. इन सब कारणों से कांग्रेस पर सॉफ़्ट हिंदुत्व के आरोप लगते रहे हैं.
हालांकि जानकारों का ये भी कहना है कि कांग्रेस एक ऐसी पार्टी रही है जिसमें आज़ादी के आंदोलन के समय से ही वामपंथ से लेकर दक्षिणपंथ की तरफ़ झुकाव रखने वाले नेता साथ-साथ काम करते रहे हैं.
कॉरपोरेट जगत और राहुल गाँधी

लेकिन इससे यह भी संदेश गया या फैलाया गया कि राहुल गाँधी कॉरपोरेट विरोधी हैं.
दिल्ली से सटे दो गांवों भट्टा परसौल के किसानों के ज़मीन मुआवज़े के मामले, या फिर ओडिशा के नियमगिरि में खनन रुकवाने के आंदोलन में राहुल गाँधी आगे-आगे दिखे थे. दोनों आंदोलनों में उनके शामिल होते वक़्त केंद्र में उनकी पार्टी की ही सरकार थी. हालांकि दोनों मामलों का सीधा संबंध केंद्र सरकार से नहीं था.
भारत के एक बड़े कॉरपोरेट घराने में ऊंचे पद पर मौजूद एक व्यक्ति कहते हैं कि राहुल 1960-1970 के दशक की राजनीति कर रहे हैं, भारत की आर्थिक प्रगति का कोई मॉडल उनके पास नहीं है.
मुंबई स्थित औद्योगिक घराने के अधिकारी का कहना है कि ये पूंजीवाद के बाद (पोस्ट कैपिटलिस्ट) का दौर है, जिसमें हर व्यक्ति की एक आकांक्षा है, राहुल गाँधी के पास इसका जवाब नहीं है कि वो भारत को आनेवाले दिनों में कहां देखना चाहते हैं. और नरेंद्र मोदी इस सपने को जगाने में सक्षम हैं.

कॉरपोरेट क्षेत्र से जुड़ीं और कई मैनेजमेंट स्कूलों में पढ़ाने वाली जयश्री सुंदर कहती हैं कि बिज़नेस घराने इस सबको लेकर थोड़े चिंतित ज़रूर हुए होंगे.
कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह इसका बचाव करते हुए कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी पूंजीपतियों के ख़िलाफ़ नहीं है. वो कहते हैं, "हम जानते हैं इससे रोज़गार पैदा होता है और हमारे ही दल की सरकारों ने देश में आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की और फिर उसे आगे भी ले गए."
दिग्विजय सिंह से हमने पहले एक सवाल में पूछा था कि आज राहुल गाँधी जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी पर गौतम अडानी को लेकर पक्षपात का आरोप लगा रहे हैं एक समय कांग्रेस और धीरूभाई अंबानी के संबंधों को लेकर इसी तरह के सवाल दूसरे भी उठाते रहे थे.
इसका जवाब देते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा:
“हम (कांग्रेस पार्टी) चंद हाथों में पैसों के जमा हो जाने के विरोध में हैं. उद्योग या व्यापारिक घरानों की प्रगति को लेकर हमारी नीति हमेशा साफ़ रही है, हम इसको आगे जाते देखना चाहते हैं."
दूसरी ओर, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अतुल अंजान ये आरोप लगाते हैं कि कांग्रेस पार्टी ने 2023 के विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र और दूसरी कुछ सीटें इसलिए वामपंथी उम्मीदवारों के लिए नहीं छोड़ी क्योंकि पार्टी खनन लॉबी के साथ थी.
कांग्रेस में विचारधारा के फिसलन की बात वो ज़ोर देकर कहते हैं:
"दुविधा ये है कि नेहरू की सोशलिस्टिक पैटर्न को अपनाया जाए या मनमोहन सिंह के समय लागू किए गए बाज़ारवाद को."
राहुल गाँधी: सत्ता के दावेदार या विचारक

कांग्रेस पर चर्चित किताब '24 अकबर रोड' लिख चुके वरिष्ठ पत्रकार रशीद क़िदवई कहते हैं:
"राहुल गाँधी को तय कर लेना चाहिए कि उनकी राजनैतिक हैसियत क्या है? क्या वो प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं या महज़ एक सांसद, या उन्हें पार्टी में विचारक के तौर पर देखा जाना चाहिए?"
क़िदवई आगे कहते हैं:
"वो साल 2014 में भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं थे, अभी भी नहीं हैं, मगर साफ़ तौर पर मना भी नहीं करते हैं."
कांग्रेस पार्टी को गहराई से समझने वाले रशीद क़िदवई कहते हैं:
"हर ब्रांड का एक रोल होता है और एक उपयोगिता या मक़सद होता है, जैसे नरेंद्र मोदी को लेकर है. राहुल गाँधी ब्रांड का मक़सद क्या है? कहां कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है वो ब्रांड? किस लिए तैयार किया गया है उसे?"
क़िदवई कहते हैं:
"लक्ष्य तय करने के बाद कांग्रेस नेता को ये भी तय करना होगा कि वो वहां तक पहुंचेगे कैसे? एक छवि, नैरेटिव गढ़नी होगी इसके लिए जैसे मोदी की त्रिकोणीय रणनीति दिखती है, एक नैरेटिव-सबका साथ सबका विकास, मगर उसमें हिंदुओं का दर्जा थोड़ा ऊपर होगा, साथ ही भारत का आर्थिक विकास और विश्व पटल पर उसका स्थान."
क़िदवई पूछते हैं कि राहुल गाँधी के पास इनके जवाब में क्या है?
ब्रांड की इमेज का सवाल

दिल्ली विश्विद्यालय के मैनेजमेंट स्कूल में प्रोफ़ेसर हर्ष वर्मा कहते हैं कि हर ब्रांड की अपनी एक पहचान और इमेज होती है 'जैसे क्लोज़-अप टूथ पेस्ट को ग्राहक ताज़गी से जोड़ता है या लक्स साबुन को ख़ूबसूरती से.'
प्रोफ़ेसर वर्मा राहुल गाँधी को ‘अस्थिर’ बताते हुए कहते हैं:
“कभी वो किसानों, आदिवासियों की बात करने लगते हैं, फिर कुछ दिनों बाद जातिगत जनगणना का मुद्दा उठा लेते हैं लेकिन इनके साथ वो लंबे समय तक टिकते नहीं हैं. कई मुद्दे जैसे जातिगत जनगणना उनके हैं ही नहीं. ये तो वीपी सिंह, मुलायम, लालू का रहा है अब वो इसे अपनाने की कोशिश में हैं."
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा मानते हैं कि राहुल गाँधी को मुद्दों पर लंबे समय तक टिके रहने की आदत डालनी होगी लेकिन इसके लिए वो राहुल गाँधी से ज़्यादा कांग्रेस पार्टी को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

राहुल गाँधी की पिछले साल ख़त्म हुई भारत जोड़ो यात्रा की बात करते हुए विनोद शर्मा कहते हैं कि यात्रा के पहले या बाद में क्या किसी तरह का कोई ब्लू-प्रिंट तैयार किया गया कि राहुल गाँधी 4500 किलोमीटर की भारत जोड़ो यात्रा में जिन-जिन लोगों से मिलेंगे उनसे बाद में जाकर पार्टी का कोई कार्यकर्ता मिलेगा, उनके विचार जानने की कोशिश करेगा, अपनी बातें उन तक पहुँचाएगा, क्या किसी तरह का फ़ॉलो-अप हुआ?
राहुल गाँधी पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की समाधि पर भी गए, साथ ही उन्होंने लालू प्रसाद के घर गोश्त भी पकाया लेकिन इन दोनों अहम सिंबौलिज़्म (प्रतीकों) को राहुल गाँधी की मीडिया टीम लोगों तक उस तरह नहीं पहुंचा पाई.
राहुल गाँधी कहते रहे हैं कि उनकी लड़ाई विचारधारा की है, व्यक्तिगत नहीं. राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद के घर जाकर गोश्त पकाने की राहुल की छवि को हालांकि एक ज़बरदस्त सिम्बल माना जाना चाहिए, ख़ास तौर पर एक ऐसे समय जब भोजन के नाम पर ही कई मुसलमानों की लिंचिंग हुई है. लेकिन कांग्रेस का इसका फ़ायदा उठाना तो दूर, बीजेपी ने इस मामले में राहुल गाँधी पर ही निशाना साधा.
बीजेपी प्रवक्ता शहज़ाद पूनावाला ने सवाल उठाया कि कोई भी सच्चा सनातनी सावन के पवित्र महीने में नॉन-वेज भोजन के बारे में सोच भी कैसे सकता है. बीजेपी के ही संबित पात्रा ने सवाल उठाया कि राहुल गाँधी, जो एक जनेऊधारी ब्राह्मण हैं वो सावन में बकरे का गोश्त किस तरह खा सकते हैं.
‘राहुल गाँधी से बीजेपी को ख़तरा’

कांग्रेस नेता तारिक़ अनवर आरोप लगाते हैं कि साल 2012-13 से ही बीजेपी से जुड़े एक पूरे तंत्र का मिशन यही है कि नरेंद्र मोदी की इमेज को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाए जबकि राहुल गाँधी की छवि को ख़राब किया जाए.
यह बात सच है कि राहुल गांधी के राजनीतिक विरोधी उनकी एक ख़ास तरह की छवि बनाने में बहुत हद तक सफल हुए हैं.
तारिक़ अनवर कहते हैं कि हाल में हुई यात्राओं के बाद आम लोगों को लगने लगा है कि राहुल गाँधी की जो इमेज बनाई गई है वो सच्ची नहीं है.
सिंगापुर की एडवर्टाइज़िंग कंपनी कॉम्प इंफ़ौरमो के भारत क्षेत्र के डॉयरेक्टर अनिल अल्हाम का मानना है कि राहुल गाँधी की छवि बिगाड़ने के लिए विरोधियों ने आठ-दस साल का समय लगाया, लगातार इसी काम में लगे रहे इसका मतलब ये है कि राहुल गाँधी एक ऐसा ब्रांड हैं जिनसे उनको ख़तरा दिखता है.
बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं:
"तैयार की गई तमाम बुरी छवियों के बाद भी युवाओं का एक वर्ग राहुल गाँधी से जुड़ा हुआ महसूस करता है."
बेंगलुरु में रहने वाले अनिल अल्हाम बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों के साथ चुनावों में काम कर चुके हैं.
जयश्री सुंदर कहती हैं कि भारत में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो जवाबी नैरेटिव के इंतज़ार में है. लोगों को लगता है कि एक मज़बूत विपक्ष का देश में होना ज़रूरी है.
‘बंदे में है दम’




कांग्रेस नेता तारिक़ अनवर कहते हैं:
"जब भारत जोड़ो यात्रा शुरु हुई तो ये भी कहा जा रहा था कि वो यात्रा पूरी नहीं कर पाएँगे. लेकिन उन्होंने ये साबित कर दिया कि बरसात हो या बर्फ़ानी सर्दी, उन्होंने जिस चीज़ को ठान लिया है उसे पूरा करके रहेंगे."
‘स्ट्रेंज बर्डेन्स, द पॉलिटिक्स एंड प्रेडिकामेंट ऑफ़ राहुल गाँधी’ नाम की किताब में लेखक सुगाता श्रीनिवासराजू कहते हैं, "राहुल गाँधी के साथ सेल्फ़ी ले रहे लोगों को ये छवियां उन तस्वीरों से बिल्कुल उलट दिख रही थीं जिनमें पूरा फ़ोकस सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुद को फ़क़ीर बुलाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर होता है, फ़्रेम में सिर्फ़ वही मौजूद होते हैं, अलग-अलग लिबास और भाव-भंगिमा में. कोई उन फ़ोटो-शूट्स के दौरान ग़लती से फ़्रेम में आ गया है तो उसे बाहर निकाल दिया जाता है."
सुगाता श्रीनिवासराजू कहते हैं कि भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होने वाले हर आम आदमी के पास अपने साथ वापस ले जाने को एक तस्वीर थी जिसे वो अपनी दीवार पर लगा सकता था.क्योंकि उनके अनुसार सेल्फ़ी-क्लिक में राहुल गांधी के साथ वो ख़ुद भी शामिल है जबकि नरेंद्र मोदी की तस्वीर देवी-देवताओं के फ़्रेम्स के साथ ही स्थान ले सकती है.
पुरुषार्थ की एक अलग छवि

53 साल के राहुल गाँधी में यात्रा के दौरान एक भिन्न छवि भी देखी गई जो ‘56-इंच’ के सीनेवाली नैरेटिव से अलग थी.
फ़िल्ममेकर और लेखिका परोमिता वोहरा ने लिखा:
“यात्रा के वीडियोज़ ने एक बिल्कुल भिन्न पौरूष की भावना को जगाया. ये वो प्रचंड अधिकारवादी पुरुष नहीं था जो आपसे उसके सामने झुकने की मांग रखता है. ये एक मर्दानगी थी जिसमें खुलापन था, मुस्कुराहट थी, मधुरता थी, आलिंगन था."

वो आगे लिखती हैं:
"इसमें दोस्ती थी, साथ रहने का भाव था. ख़ुद को तलाश करने की भावना थी किसी तरह के बड़े वायदों से परे, एक ऐसी तलाश जो अनिश्चितता और तमाम कमज़ोरियों के बावजूद अड़ी है खड़े रहने की ज़िद पर. इसने एक भावना जगाई, अगर नमो एक शक्तिशाली, प्रभावी और एकरुपता का नारा है तो राहुल संगीत के समान है, जिससे संपर्क होने के बाद वो धीरे-धीरे पसरता है, उसे अर्थ देता हुआ."

परोमिता वोहरा हालांकि अपने लेख में ये भी कहती हैं कि पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद वो लोग जिन्हें राहुल गाँधी अच्छे लगने लगे थे, उन्होंने फिर से कहना शुरू कर दिया कि वो अच्छे आदमी हैं, लेकिन राजनीति उनके बस की बात नहीं.
राहुल और सहयोगी दल

कांग्रेस ने तो उन्हें पार्टी को ‘विचारधारा की राह दिखाने वाला’ से लेकर ‘तपस्वी, योगी, अलौकिक (सुपरह्यूमन)’ तक बुलाया ही, सहयोगी दल भी उनमें देश का नेता देखने लगे. नेशनल कांफ्रेस के फ़ारूक़ अब्दुल्लाह को भारत जोड़ो यात्रा सैकड़ों साल पहले की गई आदि शंकराचार्य की धर्म यात्रा जैसी लगी, एनसीपी के शरद पवार ने कहा कि राहुल गाँधी भविष्य में देश का नेतृत्व करेंगे.‘विरोधी विचारधारा’ वाली विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राममंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बयान दिया कि इस सर्द मौसम में एक युवक पैदल तीन हज़ार किलोमीटर की दूरी तय कर रहा है वो तारीफ़ के क़ाबिल है.

हालांकि ‘इंडिया’ गठबंधन की साथी तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस पार्टी के बीच पश्चिम बंगाल में सीटों के बंटवारे को लेकर ठनी हुई है.तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने कुछ दिनों पहले गंठबंधन की एक बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम ‘इंडिया’ के प्रधानमंत्री पद उम्मीदवार के तौर पर सामने रखा, इससे लगा कि ममता की नज़र में राहुल गाँधी अभी उतने मज़बूत और आकर्षक ब्रांड नहीं हैं.लेखक और राजनीतिक विश्लेषक रशीद क़िदवई कहते है, "उनके भाषणों का ज़ोर वर्तमान और भविष्य की राजनीतिक विचारधारा तैयार करने पर ज़्यादा रहा है. चुनावी रणनीति अधिकतर इनसे ग़ायब रही है."
गठबंधन धर्म नहीं निभाने का आरोप
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अतुल अंजान कहते हैं कि हाल में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार का कारण उसका अहंकार है.
वे कहते हैं:
"इस अंहकार की वजह थी यात्रा में जमा होती भीड़ जिसे राहुल गाँधी, प्रियंका और उनकी पार्टी के लोगों ने समर्थन समझ लिया.राजस्थान में कांग्रेस ने सीपीआई और सीपीएम की कई सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे, तो छत्तीसगढ़ में सीटें छोड़ने को कहने पर हमसे कहने लगे हम क्यों छोड़ें."
अतुल अंजान कहते हैं:
"बीजेपी से लड़ना भी चाहते हैं और साथियों के ख़िलाफ़ अपना उम्मीदवार भी खड़ा करते हैं? ये महज़ सीटों का सवाल नहीं था, इन चंद सीटों के देने से राजनीतिक तौर पर लोगों में एक संदेश जाता."
हालांकि इमेज मैनेजमेंट कंपनी टॉर्क कम्यूनिकेशन्स के डॉयरेक्टर सुप्रियो गुप्ता का मानना है कि इन चुनावी नतीजों का जिस तरह मतलब निकाला जा रहा है राहुल गाँधी ब्रांड उससे कहीं बेहतर तरीक़े से काम कर रहा है.
सुप्रियो गुप्ता कर्नाटक और तेलंगाना में मिली जीत के संदर्भ में कहते हैं, "राहुल गाँधी उन लोगों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब रहे हैं जिनका राजनीतिक मूल्य उनसे मेल खाता है लेकिन राज्यों के चुनाव बड़े पैमाने पर स्थानीय नेताओं के काम, संगठन और लेन-देन की क्षमता पर निर्भर करते हैं. और उस हिसाब से नतीजे साफ़ हैं, मज़बूत नेता उस राजनीतिक ज़मीन का फ़ायदा उठाने में कामयाब रहे हैं जो राहुल गाँधी ने तैयार की है, जो कमज़ोर थे या जो पार्टी के भीतर जारी रस्साकशी में लगे रहे, वो ऐसा करने में नाकाम रहे."
एक-एक कर अपनों ने छोड़ा साथ

पिछले दिनों एक तस्वीर सोशल मीडिया पर ख़ूब घूमती रही. कई सालों पहले ली गई तस्वीर में राहुल गाँधी के कभी क़रीबी माने जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद और मिलिंद देवड़ा साथ-साथ खड़े हैं और किसी बात पर हंस रहे हैं.

मुंबई से सांसद रह चुके मिलिंद देवड़ा ने कांग्रेस का हाथ छोड़कर महाराष्ट्र के राजनीतिक दल और बीजेपी की सहयोगी पार्टी शिव सेना (शिंदे) की तीर कमान संभाली है.
मिलिंद देवड़ा ने जाने का दिन वही चुना जिस दिन राहुल गाँधी की न्याय यात्रा 14 जनवरी को मणिपुर से शुरू हो रही थी.
‘राहुल ब्रिगेड’ के एक और सदस्य के कांग्रेस छोड़ने के बाद पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष की लोगों को जोड़ने की क्षमता पर एक बार फिर सवाल उठे.
मिलिंद देवड़ा के पार्टी छोड़ने के बाद राहुल के क़रीबी माने जानेवाले युवा ब्रिगेड में से सिर्फ़ सचिन पायलट ही कांग्रेस में रह गए हैं.
और सिर्फ़ कुछ ही दिन पहले महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के क़द्दावर नेता अशोक चाह्वाण ने भी कांग्रेस का हाथ छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया.
राजनीतिक विश्लेषक रशीद क़िदवई कहते हैं, "राहुल ख़ुद को राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति के बजाए उसके ट्रस्टी के तौर पर देखते हैं, और उम्मीद करते हैं कि उनके सहयोगी भी उन चीज़ों से दूर रहें जिन्हें राजनीतिक ताक़त से जोड़कर देखा जाता है जैसे लाल बत्ती वाली गाड़ियां."
क़िदवई आगे कहते हैं:
"राहुल गाँधी ने या तो इस बात को नहीं समझा है या समझना नहीं चाहते हैं कि राजनीतिक वफ़ादारियां बहुत बड़े पैमाने पर लेन-देन पर आधारित होती हैं."
लेकिन तारिक़ अनवर कहते हैं:
"जो साथ छोड़ गए उन्हें कांग्रेस और राहुल गाँधी के क़रीबी होने का बहुत फ़ायदा मिला. पहली बार जीतकर आए नेताओं को भी मंत्रिमंडल में जगह दी गई थी. ये राहुल गाँधी के हक़ में अच्छा हुआ कि ये लोग उनका साथ छोड़कर चले गए. उनका जाना किसी विचारधारा के नतीजे में तो था नहीं, वो या तो दबाव में गए या किसी पद या किसी और लालच में."
‘युवा नेताओं के लिए कम अवसर’

हाल में हिंदी पट्टी के तीन राज्यों (मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान) में जीत के बाद बीजेपी ने जिस तरह नए चेहरों को जगह दी उसके बाद कुछ लोगों ने इन्हें उदाहरण के तौर पर पेश करते हुए ये कहना शुरू किया कि इसकी कमी कांग्रेस में है जिसके कारण पार्टी के युवा राजनीतिज्ञ अलग राह तलाश करने लगते हैं.
हालांकि लोकसभा में पार्टी के उप-नेता गौरव गोगोई कहते हैं कि पार्टी में बड़े पैमाने पर जेनेरेशल चेंजेज़ (पीढ़ी में बदलाव) हुए हैं जैसे हिमाचल प्रदेश में सुखविंदर सिंह सुक्खू को मुख्यमंत्री बनाना या कुछ माह पहले राज्यों में हुए चुनावों के बाद तेलंगाना में 54-साल के रेवंत रेड्डी को मुख्यमंत्री की कमान देना.
2018 में छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल को मुख्यमंत्री बनाया गया था जिन्हें कई बुज़ुर्ग नेताओं पर तरजीह दी गई थी.
गौरव गोगोई ख़ुद अपना उदाहरण देकर कहते हैं कि वो महज़ 41 वर्ष के हैं लेकिन पार्टी ने उन्हें लोकसभा में उप-नेता की ज़िम्मेदारी सौंपी है.
राजनेताओं के मीडिया मैनेजमेंट से जुड़े वीके चेरियन बताते हैं कि राहुल गांधी के क़रीबी सर्किल्स में वैसे लोग ज़्यादा हैं जो अपने विषय के माहिर तो हैं लेकिन राजनीतिक दिमाग़ वाले नहीं हैं, यानी ऐसे लोग जिनकी राजनीतिक सोच पढ़ी गई किताबों पर आधारित है हालांकि उन्हें ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो खांटी हिंदी प्रदेश के हों और राजनीति को उसी क्षेत्र की जनता की तरह देखते हों.
विद्रोही, ग़ुस्सैल, घमंडी?

जिस व्यक्ति को अपनी ही सरकार के क़ानून की प्रतियां फाड़ने के लिए घमंडी बुलाया गया हो, जिस पर ‘पप्पू’ का ठप्पा लगाने की कोशिश की गई हो, जिसे बार-बार नामदार पुकारा जाता हो, कैसा है वो व्यक्ति?
मैनेजमेंट पढ़ाने वाली जयश्री सुंदर ज़ोर देकर कहती हैं कि उन्हें राहुल गाँधी में किसी तरह का घमंड नहीं दिखा. बीजेपी के कई नेता भी जो राहुल गाँधी को अच्छा राजनेता मानने को तैयार नहीं, उन्हें एक अच्छा इंसान मानते हैं.
जयश्री सुंदर दिल्ली में लियो ब्रनेट नाम की इमेज मैनेजमेंट कंपनी की दिल्ली में प्रमुख थीं जिसने साल 2004 में कांग्रेस पार्टी का प्रचार अभियान और रणनीति तैयार की थी.
कांग्रेस की टक्कर तब अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे नेता से थी जो समाज के एक बड़े वर्ग में स्वीकार्य थे जबकि कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से बाहर थी.
‘डोंट फ़ॉर्गेट 2004, एडवरटाइज़िंग सीक्रेट्स ऑफ़ एन इम्पॉसिबल इलेक्शन विक्टरी’ किताब में जयश्री सुंदर गांघी-नेहरू परिवार, जयराम रमेश, सलमान ख़ुर्शीद और दूसरे नेताओं से मुलाक़ात और पूरी रणनीति तैयार किए जाने से लेकर चुनावी सफलता तक की बात करती हैं.
किताब शुरु होती है छह जनवरी की उस सुबह से जब उन्हें कांग्रेस कार्यकर्ता शमीम का फ़ोन आता है, जिसे वह पहली बार किसी तरह का मज़ाक़ समझती हैं.
फ़िल्टर कॉफ़ी की चुस्कियों के बीच जयश्री हमें उस दिन के बारे में बताती हैं जिस दिन पहली बार उनकी मुलाक़ात राहुल और प्रियंका गाँधी से हुई थी. सोनिया गाँधी से वो पहले ही मिल चुकी थीं.
वो कहती हैं:
"सोनिया गाँधी ने राहुल और प्रियंका से मेरा परिचय करवाया, मैंने मन में सोचा इन दोनों को कौन नहीं जानता, लेकिन सोनिया गाँधी ने ख़ुद से ये नहीं समझ लिया था कि उनके बच्चों को तो सब जानते हैं, मेरे लिए ये उनकी शालीनता का एक उदाहरण था."
फिर राहुल और प्रियंका से लगातार उनकी भेंट होती रही, जिनमें राहुल को उन्होंने हमेशा किसी न किसी किताब के साथ देखा और वो हर बात को सुक्ष्मता और विस्तार से समझने की कोशिश करते दिखे.
तो क्या राहुल गाँधी कोई ऐसा राजनीतिक ब्रांड है जो भविष्य में एक चुनौती साबित हो सकता है?
ब्रांड गुरु संदीप गोयल कहते हैं कि हर ब्रांड की तरह राहुल गाँधी ब्रांड के भी कुछ नकारात्मक और कुछ सकारात्मक पहलू हैं.
संदीप गोयल कहते हैं:
"उन्हें नौजवानों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, गांधी-नेहरू की वंशावली के हैं और उनकी यात्रा ने उनमें लोगों से आसानी से मेलजोल के अलावा उन्हें एक जन समुदाय के नेता के तौर पर पेश किया है, इस तौर पर देखें तो वो एक ऐसा ब्रांड हैं जो वर्क इन प्रोग्रेस है."
रिपोर्ट: फ़ैसल मोहम्मद अली
फोटो: गेटी
इलस्ट्रेशन: चेतन सिंह
प्रोडक्शन: शादाब नज़्मी
