EWS आरक्षण: ग़रीबों के नाम पर बना क़ानून, कैसे सबसे ग़रीब और वंचित लोगों को बाहर रख रहा है

राघवेंद्र राव और शादाब नज़्मी
बीबीसी संवाददाता
ईडब्ल्यूएस आरक्षण मामले पर पिछले कई दिनों से आपने बहुत सारी बहस देखी और पढ़ी. बीते मंगलवार मध्य प्रदेश की कांग्रेस नेता डॉ. जया ठाकुर ने सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया फ़ैसले की समीक्षा के लिए एक याचिका दायर की, जिसमें जनरल केटेगरी के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के केंद्र सरकार के क़ानून को बरक़रार रखा गया था.
ये वही फ़ैसला है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ये भी साफ़ कर दिया था कि इस नए आरक्षण का लाभ अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों के ग़रीब लोगों को नहीं मिलेगा. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर ऐसा न किया जाए तो पहले से ही आरक्षण पा रहे वर्गों को "अतिरिक्त या अत्यधिक लाभ" मिल जाएगा.
संविधान निर्माताओं ने जब अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को आरक्षण देने की बात सोची थी, तो उसका आधार आर्थिक असमानता नहीं बल्कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को बनाया था. इन जातियों को आरक्षण देने का मक़सद उनके साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय को ठीक करना था और उन्हें अगड़ी जातियों या वर्गों के लोगों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए समान अवसर देना था.
साल 2019 में संविधान संशोधन कर के केंद्र सरकार ने जब आरक्षण देने के लिए आर्थिक स्थिति को आधार बनाया, तो ऐसा लगा जैसे ये क़ानून देश के सभी ग़रीब लोगों को फ़ायदा पहुंचाएगा. लेकिन ईडब्ल्यूएस आरक्षण से अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों को बाहर रखने के फ़ैसले से ये साफ़ हो गया है कि ये क़ानून सिर्फ़ ऊँची जाति के लोगों के लिए बनाया गया है.
चलिए समझते हैं कैसे?
सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से कुछ बुनियादी सवाल उठ खड़े हुए हैं:
सबसे बड़ा सवाल आंकड़ों पर है-
- ग़रीब कौन है और इस परिभाषा पर सरकार ने अलग अलग मानदंड क्यों बनाए हैं?
- ईडब्ल्यूएस आरक्षण किसे मिलेगा?
- क्या वे समाज के सबसे वंचित वर्ग से हैं या ऊंची जाति के ही होंगे?
सबसे पहले आंकड़ों की मदद से इन सवालों के जवाब तलाशते हैं.
EWS कोटा किसके लिए और ग़रीब कौन?
ईडब्ल्यूएस आरक्षण के क़ानून को ध्यान से समझा जाए तो ये साफ़ है कि ये क़ानून समाज के सबसे ग़रीब और वंचित लोगों पर लागू ही नहीं होता.
इस आरक्षण का फ़ायदा सिर्फ़ ऊँची जातियों के लोगों को मिलेगा जिन्हें किसी सामाजिक भेदभाव या जातिगत उत्पीड़न का सामना नहीं करना पड़ा है और जिनमें से बहुत से लोगों की आर्थिक स्थिति बहुत कमज़ोर नहीं है. अब तक आरक्षण का आधार सामाजिक भेदभाव के कारण उत्पीड़न सह रहे वर्गों के लिए ही था जिस पर संवैधानिक मुहर थी.
इन लोगों की पहचान करने के लिए जो शर्तें रखी गई हैं उनसे ये बात भी साफ़ हो जाती है कि ऊँची जातियों का एक ऐसा बहुत बड़ा वर्ग इस आरक्षण का लाभ उठाने की स्थिति में आ जायेगा जो ग़रीबी की परिभाषा के हिसाब से गरीब भी नहीं है.
इस बात को समझने के लिए इन आंकड़ों पर नज़र डालते हैं.
ईडब्ल्यूएस कोटा उन लोगों के लिए बनाया गया है जिनकी सालाना आमदनी 8 लाख रुपये से ज़्यादा नहीं है. तो सवाल ये है कि असलियत में कितने प्रतिशत भारतीय इस श्रेणी में आते हैं. इसका जवाब आसान नहीं है क्योंकि भारत में विश्वसनीय घरेलू आय डेटा उपलब्ध नहीं है.
केवल 2.3 प्रतिशत भारतीय परिवारों की आय 8 लाख रुपये सालाना से ज़्यादा
हालाँकि सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के 2019 के सर्वेक्षण के आंकड़ों से पता चलता है कि केवल 2.3 प्रतिशत भारतीय परिवारों की आय 8 लाख रुपये सालाना से ज़्यादा है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जिन भारतीय परिवारों की सालना आमदनी 8 लाख रुपये तक या उससे कम है उनकी संख्या कुल आबादी का 97.7 प्रतिशत है.
चूंकि इस 97.7 प्रतिशत आबादी में सभी जातियां शामिल हैं तो जनरल केटेगरी के लोगों की संख्या निकालने के लिए इस आबादी में से अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों को अलग करना होगा.
साल 2011 में हुई जनगणना के अनुसार भारत की कुल आबादी में अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों का हिस्सा 25.26 प्रतिशत था, जबकि एनएसएसओ के 2007 के आंकड़ों के मुताबिक़ ओबीसी श्रेणी में 41 प्रतिशत लोग थे.
इस हिसाब से भारत की कुल आबादी में क़रीब 66 प्रतिशत हिस्सा अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्ग के लोगों का था.
2011 के बाद से देश में जनगणना नहीं हुई है. लेकिन अलग-अलग अनुमानों से ये माना गया है कि साल 2011 से अब तक ये हिस्सा बढ़कर 82 प्रतिशत हो गया है.
इसके मायने ये हैं कि कुल आबादी का 18 प्रतिशत हिस्सा ही जनरल कैटेगरी में आता है.
तो ये साफ़ है कि इन 18 प्रतिशत जनरल कैटेगरी के लोगों में से भी 97.7 प्रतिशत लोग सालाना 8 लाख रुपये से कम ही कमाते हैं और अब वे ईडब्ल्यूएस आरक्षण का फ़ायदा उठा सकेंगे.
आसान शब्दों में कहा जाए तो जनरल कैटेगरी में 2.3 प्रतिशत लोगों के अलावा सभी अब ईडब्ल्यूएस आरक्षण पा सकेंगे.
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रवींद्र भट ने अपने डिस्सेंटिंग जजमेंट या असहमति वाले फ़ैसले में ईडब्ल्यूएस क़ानून को भेदभावपूर्ण कहा था. उन्होंने भी इस बात का ज़िक्र किया कि उन 82 प्रतिशत लोगों को इस आरक्षण से बाहर रखा जा रहा है जो इसका फ़ायदा उठाने के लिए योग्य तो हैं लेकिन अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों से सम्बंधित हैं.
सालाना आमदनी को ईडब्ल्यूएस कोटा का आधार बनाने से पैदा हुई स्थिति को समझने के लिए हमने आयकर रिटर्न के आंकड़ों को भी देखा.
हालांकि भारतीय आबादी का एक छोटा हिस्सा आयकर का भुगतान करता है लेकिन आंकड़े कुछ चौंकाते हैं. 2018-19 में आयकर रिटर्न दाख़िल करने वालों में से 88 प्रतिशत लोगों की सकल वार्षिक आय 9.5 लाख रुपये से कम थी.
तो इसके क्या मायने हैं?
चूँकि साल 2018-19 में 5.87 करोड़ आयकरदाताओं में से 5.21 करोड़ की आय 9.5 लाख से कम थी, तो ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि 8 लाख तक की सालाना आमदनी वाले लोगों की एक बहुत बड़ी संख्या है और अब ये सब लोग ईडब्ल्यूएस आरक्षण पाने के लिए योग्य बन गए हैं.
दिलचस्प बात ये भी है कि हाल ही में मद्रास हाई कोर्ट के मदुरै बेंच में DMK के सदस्य कुन्नूर श्रीनिवासन ने एक याचिका दायर कर ये सवाल पूछा है कि अगर सालाना 8 लाख रुपये से कम आमदनी वाले परिवार ईडब्ल्यूएस हैं तो 2.50 लाख रुपये से अधिक कमाने वाले लोगों को आयकर क्यों देना चाहिए? अदालत ने नोटिस जारी कर इस पर केंद्र सरकार से जवाब माँगा है.
इंडियास्पेंड.कॉम पर प्रकाशित एक साक्षात्कार में अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर अश्विनी देशपांडे ने कहा है कि ईडब्ल्यूएस के लिए जो कट-ऑफ़ निर्धारित किया गया है वो ग़रीबी रेखा के नीचे के परिवारों के अलावा भी बहुत से परिवारों को शामिल करता है. चूंकि ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को समाज में सबसे ग़रीब माना गया है, इसलिए यहां चिंता ये है कि 8 लाख रुपये सालाना आमदनी का मानदंड सबसे ग़रीब लोगों के अलावा ऐसे बहुत से लोगों को आरक्षण के लिए योग्य बना देता है जो आर्थिक रूप से इतने कमज़ोर नहीं हैं.
सीएमआईई के आंकड़ों का हवाला देते हुए प्रोफ़ेसर अश्विनी देशपांडे कहती हैं कि ये आंकड़े एक और अनुमान से मेल खाते हैं, जिसके मुताबिक साल 2015 में देश में सभी परिवारों में से 98 प्रतिशत की सालाना आमदनी 6 लाख रुपये या उससे कम थी.
वे कहती हैं कि ग़रीबी एक गंभीर समस्या है जिसका इलाज किया जाना चाहिए लेकिन आरक्षण ग़रीबी दूर करने का सही ज़रिया नहीं है.
जानेमाने अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज़ कहते हैं कि "तथाकथित ईडब्ल्यूएस कोटा प्रभावी रूप से जनरल कैटेगरी के लिए ही एक कोटा है क्योंकि बाक़ी लोगों को इससे बाहर रखा गया है और आमदनी की सीमा ऐसी है जो जनरल कैटेगरी में बहुत ही कम लोगों पर लागू नहीं होती."
द्रेज़ कहते हैं कि एससी, एसटी और ओबीसी को आरक्षण देने का आधार ये है कि एक तरफ़ तो वे एक ऐतिहासिक अन्याय का बोझ उठाते हैं और दूसरा ये कि उनके साथ लगातार भेदभाव होने की वजह से सकारात्मक कार्रवाई के बिना उन्हें इंसाफ़ मिलने की संभावना नहीं है. वे कहते हैं कि ये आधार जनरल कैटेगरी पर लागू नहीं होते.
ग़रीबी रेखा के नीचे जीने वाले ऊंची जाति के 18 फ़ीसद लोगों को EWS आरक्षण, 82 फ़ीसद दूसरी जातियों के लोग इससे बाहर
साल 2006 में भारत सरकार ने सामान्य वर्ग के उन आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण पर विचार करने के लिए एक आयोग का पुनर्गठन किया जिन्हें मौजूदा आरक्षण नीति के तहत कवर नहीं किया गया था.
इस आयोग की अध्यक्षता सेवानिवृत मेजर जनरल एस आर सिन्हो ने की और सिन्हो कमीशन ने जुलाई 2010 में अपनी रिपोर्ट पेश की. सुप्रीम कोर्ट के हालिया फ़ैसले में सिन्हो कमीशन की रिपोर्ट का ज़िक्र बार-बार किया गया है.
सिन्हो कमीशन की रिपोर्ट में नैशनल सैंपल सर्वे ऑफ़िस (एनएसएसओ) के जिन साल 2004-05 के आंकड़ों को आधार बनाया गया उनके मुताबिक भारत में ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की कुल संख्या 31.7 करोड़ थी.
ग़रीबी रेखा के नीचे की इस 31.7 करोड़ आबादी में से क़रीब 82 फ़ीसदी लोग अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों से थे. ऊँची जातियों के 18 फ़ीसदी लोग ही ग़रीबी रेखा के नीचे पाए गए. (ग्राफ़िक्स देखें)
इन आंकड़ों में ये भी बताया गया था कि हर 100 अनुसूचित जाति के लोगों में से 38 ग़रीबी रेखा के नीचे थे. इसी तरह हर 100 अनुसूचित जनजाति के लोगों में से 48 और हर 100 पिछड़े वर्ग के लोगों में से 33 लोग ग़रीबी रेखा के नीचे थे.
जनरल कैटेगरी या ऊँची जाति के हर 100 लोगों में से सिर्फ़ 18 लोग ही ग़रीबी रेखा के नीचे थे.
ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को समाज में सबसे ग़रीब माना जाता है. इन आंकड़ों से साफ़ है कि जनरल कैटेगरी के सबसे ग़रीब लोगों की संख्या अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सबसे ग़रीब लोगों के मुक़ाबले काफ़ी कम है.
अगर ये मान लिया जाए कि आज भी भारत में 31.7 करोड़ लोग ग़रीबी रेखा के नीचे आने वाले लोग हैं, तो ईडब्ल्यूएस आरक्षण के तहत सबसे ग़रीब लोगों में से क़रीब 82 प्रतिशत लोगों को कोई फ़ायदा नहीं मिलेगा. ये फ़ायदा केवल 18 प्रतिशत लोगों को ही मिलेगा.
ऐसे में ये सवाल उठना लाज़मी है कि क्या ईडब्ल्यूएस आरक्षण समाज के सबसे ग़रीब लोगों के एक बहुत बड़े तबके को नज़रअंदाज़ नहीं कर रहा है?
क्या इस आरक्षण का फ़ायदा सबसे ज़्यादा ग़रीब और वंचित लोगों के बजाय साधन-संपन्न लोग नहीं उठा लेंगे?
वरिष्ठ पत्रकार मनोज मिट्टा क़ानून, मानवाधिकार और सार्वजनिक नीति से जुड़े मुद्दों के जानकार हैं और जाति के मुद्दे पर गहन शोध कर रहे हैं.
वे कहते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति वर्गों के अंदर ही ऐसे ग़रीब लोग हैं जो जीवन में उन अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगों की तुलना में आगे नहीं बढ़ पाते जो किसी अच्छे स्कूल में पढ़े हैं, या किसी अच्छे शहर में रहते हैं या जिनकी सुविधाओं तक पहुँच है.
वे कहते हैं:
"एससी और एसटी बहुत बड़ी श्रेणियां हैं. वे कुल आबादी का क़रीब 24 प्रतिशत हैं. इन श्रेणियों के ग़रीब लोगों को एससी और एसटी वर्ग के ही साधन-संपन्न लोगों के साथ मुक़ाबला करना पड़ता है और वे ज़्यादातर ऐसा नहीं कर पाते हैं. जब ईडब्ल्यूएस श्रेणी बनाई गई, तो इन ग़रीब लोगों को उस तक पहुंच नहीं दी गई क्योंकि ये विशेष रूप से ऊँची जाति के ग़रीबों के लिए आरक्षित है. तो एससी, एसटी और ओबीसी में जो ज़्यादा पिछड़े हैं और जो आबादी का एक बड़ा हिस्सा हैं और ऊँची जातियों की तुलना में बहुत अधिक हैं, उन्हें इस पूरी योजना में से छोड़ दिया गया है."
मनोज मिट्टा के मुताबिक एससी और एसटी श्रेणियों में साधन-संपन्न और ग़रीब लोगों के बीच के फासले पर कई अध्ययन हुए हैं और कई सुझाव दिए गए हैं.
ऐसा ही एक सुझाव ये है कि अगर किसी एससी या एसटी परिवार में किसी को क्लास 1 या क्लास 2 नौकरियों में कोटा मिलता है तो इसे एक या दो पीढ़ियों के बाद बंद कर देना चाहिए. मिट्टा कहते हैं कि एक विकल्प ये भी सुझाया गया है कि ओबीसी की तरह एससी और एसटी श्रेणियों के लिए भी क्रीमी लेयर लागू करने पर विचार किया जा सकता है.
वे कहते हैं:
"एक दूसरा सुझाव एससी और एसटी में उप-श्रेणियां बनाने का था क्योंकि एससी और एसटी में कुछ प्रमुख जातियां हैं जो अधिकांश सीटों पर कब्जा कर लेती हैं."
मिट्टा उदाहरण देते हैं तेलंगाना के माला और मादिगा समुदायों का जहां माला समुदाय की स्थिति को बेहतर माना गया है और मादिगा समुदाय ने अपने लिए एक अलग श्रेणी बनाने के लिए आंदोलन चलाया जिसकी वजह से मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया.
EWS कोटा को लागू करने में चुनौतियाँ
भारत में आरक्षण कई सालों से चर्चा का एक बड़ा मुद्दा रहा है. जनरल कैटेगरी में आने वाले बहुत से लोगों का आरक्षण पाने वाले लोगों के प्रति रोष भी समय-समय पर महसूस किया जाता रहा है.

इसी रोष और विरोध का एक उदाहरण साल 1990 में देखने को मिला था जब मंडल कमीशन की पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफ़ारिश के ख़िलाफ़ देश भर में प्रदर्शन हुए और दिल्ली के एक कॉलेज में राजीव गोस्वामी नाम के एक छात्र ने आत्मदाह करने की कोशिश की.
बहस का एक और विषय ये भी रहा है कि आज़ादी के बाद 75 साल तक आरक्षण लागू रहने के बाद भी क्या अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़े वर्ग के लोगों की स्थिति में कोई सुधार आया है?
अक्सर ये तर्क भी दिया जाता है कि आरक्षण के फ़ायदे अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के वही लोग पीढ़ी दर पीढ़ी उठाते आ रहे हैं जो प्रभावशाली हैं. ये भी कहा जाता है कि इन सभी वर्गों में जो ग़रीब लोग हैं वे उन्हें आज भी आरक्षण का कोई फ़ायदा नहीं मिला है.
समय-समय पर मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात का ज़िक्र होता रहा है कि ओबीसी श्रेणी में आने वाली पांच से छह हज़ार जातियों में से एक प्रतिशत से भी कम जातियों ने केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश और सरकारी सेवाओं में भर्ती में आरक्षण लाभ के 50 प्रतिशत हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया है.
मनोज मिट्टा कहते हैं कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए सकारात्मक कार्रवाई का मतलब कभी भी ग़रीबी उन्मूलन नहीं था.
वे कहते हैं, "अगर आप ग़रीबों की मदद करना चाहते हैं तो आप शुल्क में रियायत दे सकते हैं या अधिक सुविधाएं बना सकते हैं. लेकिन कट-ऑफ़ को कम करने, न्यूनतम योग्यता अंकों को कम करने या अलग कोटा रखने की कोई ज़रूरत नहीं है."
वे कहते हैं कि एससी, एसटी और ओबीसी श्रेणियों को आरक्षण देने का असाधारण क़दम इसलिए उठाया गया क्योंकि भारत के समाज में जातिगत पक्षपात की समस्या थी और उस ऐतिहासिक ग़लती को दूर करने के लिए यह तरीक़ा अपनाया गया.
तो सवाल ये भी है कि जब जाति-आधारित आरक्षण के फ़ायदे उन जातियों के सबसे ग़रीब लोगों तक पहुँच ही नहीं पाएं हैं, तो ये उम्मीद करना कितना सही है कि जनरल कैटेगरी के सबसे ग़रीब लोग आरक्षण का फ़ायदा उठा पाएंगे.
ये याद रखना ज़रूरी है कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण साल 2019 से लागू हो चुका है और सुप्रीम कोर्ट में ये मसला लंबित रहने के बावजूद इसे लागू करने पर कोई रोक नहीं थी.

योगेंद्र यादव
योगेंद्र यादव
हाल ही द प्रिंट में छपे एक लेख में राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव ने लिखा कि साल 2019 में इस क़ानून के लागू होने के बाद किए गए एक विश्लेषण से पता चलता है कि जिन अगड़ी जातियों को ईडब्ल्यूएस कहा जा रहा है उनके छात्रों का प्रतिनिधित्व उच्च शिक्षा के 445 संस्थानों में पहले से ही 28 प्रतिशत था. यादव ने पूछा, "ऐसे में उन्हें आरक्षण देने का क्या औचित्य?"
दूसरी बात, ईडब्ल्यूएस आरक्षण के लिए लोगों को अपनी योग्यता साबित करने के लिए किसी न किसी दस्तावेज़ की ज़रूरत पड़ेगी. पर क्या वे कोई मुक़्क़मल दस्तावेज़ आसानी से उपलब्ध करा पाएंगे?
उदाहरण के तौर पर नैशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 पर नज़र डालें तो पता चलता है कि सबसे कमज़ोर आर्थिक स्थिति के परिवारों में क़रीब 60 प्रतिशत ऐसे थे जिनके पास जन्म-प्रमाणपत्र तक नहीं थे.
तो अगर ईडब्ल्यूएस आरक्षण का मक़सद सामान्य श्रेणी के ग़रीब लोगों को फ़ायदा पहुँचाना है तो इस श्रेणी में भी जो सबसे ग़रीब लोग हैं उनके लिए ये फ़ायदा ले पाना चुनौती भरा ही रहने वाला है.
दूसरी तरफ़ ये संभावना तो है ही कि सामान्य श्रेणी के जो लोग 8 लाख रुपये सालाना तक कमा रहे हैं वे ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की तुलना में इस आरक्षण का बेहतर लाभ उठाने की स्थिति में होंगे.
योगेंद्र यादव कहते हैं, "ये सिर्फ़ संभावना नहीं, यही तो सारा खेल है. जब भी ईडब्ल्यूएस आरक्षण को सही ठहराने की बात आती है तो उसका नैतिक और क़ानूनी औचित्य ग़रीबों के नाम पर दिया जाता है. कहा जाता है कि सवर्णों में भी तो ग़रीब हैं. लेकिन इस फ़ैसले की कड़वी हक़ीक़त ये है कि ग़रीबों के नाम पर अगड़ी जातियों के मध्यम-वर्गीय परिवारों को आरक्षण का लाभ दे दिया गया है. दरअसल यही इसका मक़सद था."
योगेंद्र यादव के मुताबिक़ पिछले काफ़ी समय से ऊँची जाति का मिडिल क्लास वर्ग आरक्षण से बेहद परेशान था और बहुत से विशेषाधिकार प्राप्त लोग ख़ुद को पीड़ित समझ रहे थे.
वे कहते हैं, "भारत में इस वक़्त ऊँची जाति के मिडिल क्लास शिक्षित वर्ग की ये मानसिकता बना दी गई है जिसमें उन्हें लगता है कि उनके साथ बहुत अन्याय हो रहा है. हिन्दू ऊँची जातियों के लोग भारत की आबादी का क़रीब 20 फ़ीसदी हैं. और किसी भी सर्वेक्षण या साक्ष्य से देखें तो वे देश के महत्वपूर्ण पदों में से क़रीब 65 से 80 प्रतिशत पर आसीन हैं. और फिर भी वे भेदभाव महसूस करते हैं."
योगेंद्र यादव कहते हैं कि बहुत सालों तक न्यायपालिका ने इस मानसिकता का विरोध किया और अलग-अलग फैसलों में कहा कि इस देश की ज़मीनी हक़ीक़त कुछ अलग है और हमें ये मानना होगा कि समाज में भेदभाव मौजूद है और हमें उसके लिए प्रावधान करना होगा. "तो इस बात की एक तरह की नैतिक स्वीकृति थी कि हम एक असमान समाज में रहते हैं और इसलिए कभी-कभी हमें कुछ प्रावधान बनाने की ज़रुरत है.लेकिन पिछले 10-20 साल से जो देश में एक माहौल बना वो ये है कि इतना भी देने की क्या ज़रुरत है."
यादव कहते हैं, "ये हमारी संवैधानिक व्यवस्था के साथ बहुत बड़ा धोखा है और सामाजिक न्याय की जो एक समझ है उसके साथ एक भद्दा मज़ाक है. और बहुत दुर्भाग्य की बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने उस भद्दे मज़ाक पर अपनी मुहर लगा दी है."
ज्यां द्रेज़ कहते हैं, "इस बात की काफी संभावना है कि जनरल केटेगरी के साधन-संपन्न सदस्य ईडब्ल्यूएस कोटे के मुख्य लाभार्थी होंगे. सामाजिक न्याय की तो बात ही छोड़िए, ग़रीबी उन्मूलन की दृष्टि से कोटे की अहमियत बहुत कम होगी. ऐसा लगता है कि ईडब्ल्यूएस कोटे का असली मक़सद आरक्षण को ख़त्म करने के लिए आधार तैयार करना है."
EWS श्रेणी में कौन आता है?
केंद्र सरकार ने जो मानदंड तैयार किए हैं उनके अनुसार सामान्य श्रेणी के वो लोग जिन्हें किसी भी किस्म के आरक्षण का फ़ायदा नहीं मिला है वे ईडब्ल्यूएस आरक्षण के लिए योग्य होंगे अगर उनके परिवार की पूरी कमाई साल में आठ लाख रुपये से कम है.
जनरल केटेगरी के किसी व्यक्ति को EWS नहीं माना जायेगा अगर उसके परिवार के पास:
- पांच एकड़ या उससे ज़्यादा कृषि भूमि है
- 1000 वर्ग फ़ीट या उससे ज़्यादा का आवासीय फ़्लैट है
- अधिसूचित नगर पालिकाओं में 100 वर्ग गज या और उससे ज़्यादा का आवासीय प्लॉट है
- अधिसूचित नगर पालिकाओं के अलावा अन्य क्षेत्रों में 200 वर्ग गज या उससे ज़्यादा के आवासीय प्लॉट हैं
- सरकार ने ये भी स्पष्ट किया कि अगर किसी परिवार की अलग-अलग जगहों या शहरों में ज़मीन या संपत्ति है तो उन सब को जोड़ कर ही ईडब्ल्यूएस होने या न होने का फ़ैसला किया जाएगा.
ये मानदंड तय तो कर दिए गए हैं लेकिन नवीनतम जाति-आधारित डाटा के अभाव में सबसे बड़ी चुनौती है सभी जातियों के लोगों की असल संख्या का पता लगाना जिससे जनरल कैटेगरी के आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लोगों की सही संख्या आंकी जा सके.
अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़े वर्गों की संख्या पर आधिकारिक आंकड़े आख़िरी बार 2011 की जनगणना में ही पता चले थे.
पिछले कुछ सालों में जाति जनगणना करवाए जाने की मांग समय-समय पर उठती रही है. जहां विपक्षी पार्टियां जाति जनगणना करवाने के पक्ष में बात करती रही हैं, वहीं सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे पर कार्रवाई के लिए इच्छुक नहीं दिखती.
दशकों पहले जब भारत के संविधान निर्माताओं ने कुछ जातियों को आरक्षण देने के बारे में सोचा तो इसके पीछे मंशा उन लोगों को शिक्षा और रोज़गार में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की थी जिनके साथ उनकी जाति की वजह से ऐतिहासिक तौर पर भेदभाव किया गया था. इस आरक्षण को आर्थिक आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया था.
ईडब्ल्यूएस कोटा सिर्फ़ आर्थिक आधार पर दिया गया है और जहां पहली नज़र में लगता ज़रूर है कि ये देश के ग़रीब लोगों के लिए एक संजीवनी का काम करेगा, ये स्पष्ट है कि इस क़ानून ने भारत की आबादी के एक बहुत बड़े और आर्थिक रूप से सबसे कमज़ोर तबके को हाशिए पर धकेल दिया है. साथ ही सवाल इसके ज़रिए राजनीतिक हित साधने की मंशा पर भी हो रहा है.
बीबीसी संवाददाता: राघवेंद्र राव और शादाब नज़्मी
फोटो:गेटी
शॉर्टहैंड प्रोडक्शन: शादाब नज़्मी
पब्लिश्ड:25 नवंबर, 2022