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रूपहले पर्दे पर एक क्रांतिकारी की कहानी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भगत सिंह का युवा क्रांतिकारी चरित्र उनके समय से ही इतना लोकप्रिय और प्रभावशाली रहा है कि युवा वर्ग और पूरे देश में इनको लोग याद करते रहे हैं. ज़ाहिर है ऐसे चरित्र पर फ़िल्म जगत और रंगमंच भी काम करते क्योंकि भगत सिंह की लोकप्रियता का लाभ उनके काम को मिलता और ऐसा हुआ भी. यही वजह है कि आज़ादी के आंदोलन से महात्मा गांधी और भगत सिंह, दो ऐसे चरित्र हैं जिनपर भारतीय सिने जगत में सबसे ज़्यादा काम हुआ है. रंगमंच के कुछ जानकार मानते हैं कि रंगमंच में तो गांधी से भी ज़्यादा काम भगत सिंह पर हुआ है क्योंकि समाजवादी और वामपंथी आंदोलन, प्रगतिशील धारा के लोग इन्हें अपने वैचारिक प्रसार के नायक के तौर पर इस्तेमाल करते रहे.
इस तरह के प्रयासों से भगत सिंह से कई लोग वाकिफ़ तो होते रहे पर कम ही ऐसा हुआ जब भगत सिंह के व्यक्तित्व और उनकी विचारधारा के साथ न्याय किया गया हो. अधिकतर प्रयास भगत सिंह को अपने लाभ के लिए अपनी सुविधा से परोसे जाने के ही देखने को मिलते हैं. हालांकि कुछ नाटकों जैसे चरनदास सिद्धू का लिखा नाटक, भगत सिंह शहीद को ख़ासा प्रमाणिक भी माना गया और पसंद भी किया गया. भगत सिंह पर फ़िल्में भारतीय सिनेमा जगत में भगत सिंह को लेकर हिंदी में ही कम से कम सात फ़िल्में बन चुकी हैं. पहली फ़िल्म थी 1954 में बनी ‘शहीदेआज़म भगत सिंह’. इसके बाद 1963 में आई विश्राम बेडेकर की ‘शहीद भगत सिंह’ जिसमें शम्मीकपूर और प्रेमनाथ जैसे अभिनेताओं ने काम किया था पर सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हुई मनोज कुमार की 1965 में आई फ़िल्म ‘शहीद’. इस फ़िल्म का निर्देशन किया था एस राम शर्मा ने. इसके बाद 37 बरसों तक हिंदी सिने जगत को भगत सिंह की याद नहीं आई और जब आईं तो एक, दो नहीं पूरी तीन फ़िल्में.
वर्ष 2002 में दर्शकों के बीच पहुँची इन फ़िल्मों में सबसे ज़्यादा प्रशंसा मिली राजकुमार संतोषी की ‘द लीजेंड ऑफ़ भगतसिंह’ को जिसमें अजय देवगन ने मुख्य भूमिका निभाई. इसके बाद ज़िक्र आता है फ़िल्म ‘23 मार्च, 1931: शहीद’ का. बॉबी देओल की मुख्य भूमिका वाली इस फ़िल्म का निर्देशन किया था गुड्डू धनोआ ने. भगत सिंह पर सीधे तौर पर नहीं पर उन्हीं पर आधारित फ़िल्म थी ‘अंश’ जो तीन युवाओं की कहानी है. इसका निर्देशन किया था राजन जौहरी ने. सबसे हाल में आई फ़िल्म है ‘रंग दे बसंती’. 2006 में राकेश ओमप्रकाश मेहरा के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म में आमिर ख़ान और उनके साथी कलाकार आज के भारत के उन नौजवानों की कहानी दिखा रहे हैं जो भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद और बिस्मिल के व्यक्तित्वों से प्रभावित हैं. चरित्र से न्याय
पाकिस्तान के नामी कलाकार और जाने-माने शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की बेटी, सलीमा हाश्मी मानती हैं कि भारत में भगत सिंह ज़्यादा प्रसिद्ध हैं और इसका श्रेय उनपर बनी फ़िल्मों को भी जाता है. पाकिस्तान में अभी इस तरह का काम हुआ ही नहीं है. वो कहती हैं, “भारत में भगत सिंह जैसे महत्वपूर्ण क्रांतिकारी पर कई फ़िल्में बनी, इससे नई पीढ़ियों को उनके बारे में कुछ शुरुआत मालूमात हासिल हुई. पर वो तो दोनों ओर के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं. पाकिस्तान अब भगत सिंह का खोज रहा है, उन्हें जानने समझने की कोशिश कर रहा है.” इसमें कोई दो राय नहीं कि भगत सिंह से आम जन को परिचित कराने में इन फ़िल्मों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है पर एक सवाल इन फ़िल्मों में भगत सिंह के चरित्र को गढ़ने पर भी उठता रहा है. जाने-माने अभिनेता और फ़िल्मकार मनोज कुमार कहते हैं, “जब हम लोगों ने भगत सिंह पर काम किया तो मकसद फ़िल्म बनाने से ज़्यादा इस व्यक्तित्व की सच्चाई को सामने लाना था. हाल की फ़िल्में देखें तो भगत सिंह के नाम पर लोगों ने धंधा करने की कोशिश की है, उन्हें सही तौर पर बताने की नहीं.”
वो ‘रंग दे बसंती’ में भगत सिंह के विचारधारात्मक पहलु को न दिखाए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि भगत सिंह या ऐसे किसी व्यक्ति के इतिहास के साथ किसी तरह की छेड़खानी को सही नहीं ठहराया जा सकता है. भगत सिंह पर काम कर रहे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर चमनलाल कहते हैं कि फ़िल्मों में भगत सिंह की बात जब भी की गई, ज़्यादातर वही भगत सिंह दिखाया जाता रहा, जिसके हाथ में बम-पिस्तौल है. इसके रोमांच से भगत सिंह को बाहर लाकर पूरे तौर पर दिखाने की कोशिश न के बराबर ही हुई है. वो मानते हैं, “फ़िल्म जगत के लोग तो भगत सिंह को रोमांटिक हीरो के तौर पर ही पेश करते रहेंगे क्योंकि इसी से फ़िल्म की सफलता तय होती है पर चिंतन का पक्ष न होने से युवा पीढ़ी को कोई समझ बनाने का मौका नहीं मिलता है. हालांकि चिंतन पक्ष को दिखाने से दर्शकों के लिए फ़िल्म कुछ उबाऊ हो सकती हैं पर शायद यही चुनौती भी है.” इतना तो तय है कि भगतसिंह या उनके जैसे कई नायकों पर अभी भी सिने जगत में उतना काम नहीं हुआ है जितना कि होना चाहिए था और आज़ादी के 60 बरस बाद या क्रांतिकारी आंदोलन के कई नायकों के 100 बरस होने पर अभी भी नए सिरे और नए कलेवर के साथ ख़ासा काम हो सकता है. |
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