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शुक्रवार, 15 सितंबर, 2006 को 13:23 GMT तक के समाचार
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खुजली वाले पिंजरे में दी जाती है सज़ा

पिंजरे में करवट बदलना तक मुश्किल होता है
भारत के नगालैंड राज्य के मोकोकचुंग ज़िले के कुछ गाँवों में आज भी सजा देने के लिए सदियों पुराना क्रूर तरीका अपनाया जाता है.

इन गाँवों में छोटे-मोटे अपराध के दोषी लोगों को लकड़ी से बने एक तिकोने पिंजरे में डाल दिया जाता है. छह फुट गुणा एक फुट आकार के इस पिंजरे में क़ैद व्यक्ति आसानी से करवट भी नहीं ले पाता.

इस पिंजरे की लकड़ी की खासियत यह है कि इसके संपर्क में आने वाले व्यक्ति के शरीर में तीव्र खुजली शुरू हो जाती है. स्थानीय भाषा में इस लकड़ी को घोजुली कहते हैं.

असम की सीमा के पास बसे ऐसे ही एक गाँव एसिरिंगिया बस्ती की इन्युलोप आओ बताती हैं कि शराब या ड्रग्स का सेवन करने वाले या अपने परिवार में पति या पत्नी को सताने जैसे अपराध करने वाले लोगों को इस पिंजरे में डालने की सजा दी जाती है. लेकिन 15 साल से छोटी उम्र वालों को पिंजरे में नहीं डाला जाता.

 पिछले 10 सालों से मैं ऐसी सजाएँ दी जाती हुई देखता आ रहा हूँ. ऐसी सजाएँ कारगर होती हैं और गाँव की बात गाँव के अंदर ही रह जाती है
टी आओ

एसिरिंगिया बस्ती के 'गाँव बूढ़ा' यानी गाँव प्रमुख मार होंचिया दावा करते हैं कि अपने गाँव के अंदर उन्हें ऐसी सजाएँ देने का पूरा अख्तियार है. नगा समुदाय के आओ कबीले की परंपरा के तहत पुरुष और महिला दोनों को ही ऐसी सजा देने का 'गाँव बूढ़ा' को समुचित अधिकार है.

आम तौर पर ऐसी सजा पाने वाले को 10 से 12 घंटों तक पिंजरे में डाल दिया जाता है और इस दौरान उसे बाहर से खाना और पानी देते रहते हैं.

गाँव के युवक टी आओ का कहना है कि "पिछले 10 सालों से मैं ऐसी सजाएँ दी जाती हुई देखता आ रहा हूँ. ऐसी सजाएँ कारगर होती हैं और गाँव की बात गाँव के अंदर ही रह जाती है."

पुलिस की भूमिका

पुलिस अमूमन गाँव में नहीं आती. आने पर वह 'गाँव बूढ़ा' की अनुमति के बिना गाँव के किसी भी मामले में हस्तक्षेप नहीं करती.

 नगा
आओ नगालैंड की सबसे पुरानी जनजातियों में से एक है

पिंजरे में डालने की अंतिम सज़ा इसी वर्ष मार्च महीने में एक 28 वर्षीय युवक युन्लेप आओ की दी गई थी. गाँववासी बताते हैं कि उस युवक ने काफी-समझाने के बावजूद ड्रग्स का सेवन बंद नहीं किया था.

मोकोकचुंग ज़िले के पुलिस अधीक्षक इयुलिसुनेप कहते हैं कि "कानून में जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान के तहत 'गाँव बूढ़ा' को अर्धन्यायिक अधिकार प्राप्त हैं."

इन अधिकारों के तहत 'गाँव बूढ़ा' ग्राम परिषद की सहमति से अपराधों का निपटारा अपने स्तर पर ही कर सकता है लेकिन उनसे जब यह पूछा गया कि क्या इन अधिकारों के तहत किसी को कैद करने या पिंजरे में डालने का अधिकार भी है तो उन्होंने कहा कि "ऐसा अधिकार नहीं है लेकिन मुझे ऐसी सजा दिए जाने की कोई सूचना नहीं है."

डॉक्टरों का कहना है कि आम तौर पर वनस्पति से होने वाली खुजली का असर कुछ ही घंटों तक रहता है और इसका कोई स्थायी प्रभाव नहीं रहता.

गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज के चर्म रोग विशेषज्ञ डॉक्टर केएन बरुआ बताते हैं कि वनस्पति की जगह बैक्टीरिया, जीवाणुओं या रसायनों के प्रभाव से होने वाली खुजली ज्यादा खतरनाक होती है.

कानून चाहे जो भी कहे एसिरिंगिया बस्ती के निवासी अपने पारंपरिक तौर-तरीकों को लेकर खुश हैं. दसवीं तक पढ़े टी आओ का कहना है कि "हम कोर्ट-कचहरी के झमेले से दूर ही रहें यही हमारे लिए अच्छा है."

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