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ग़ैर-कन्नड़ फ़िल्मों के विरोध से धंधा मंदा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
हिन्दी फिल्म,'धूम' को देश भर के सिनेमा घरों में दिखाए जाने के छह हफ्तों बाद जब बंगलौर के कुछ सिनेमा घरों में पिछले शनिवार को फिल्म दिखानी शुरू की, तब कुछ लोगों ने हॉल पर पथराव किया, एक सिनेमा घर का पर्दा फाड़ दिया और मीडिया के कुछ लोगों समेत हॉल के कर्मचारियों की पिटाई की. इसका कारण था इन सिनेमा घरों ने कन्नड़ फिल्म निर्माताओं द्वारा निर्धारित सात हफ्ते की समय सीमा का पालन न किया जाना. उल्लेखनीय है कि कन्नड़ फ़िल्म निर्माताओं ने नियम बना रखा है कि कन्नड़ के अलावा किसी भी दूसरी भाषा की फ़िल्म कर्नाटक में तब तक नहीं दिखाई जा सकती जब तक उसके रीलीज़ को सात हफ़्ते न हो जाए. धंधा मंदा पिछले शनिवार का यह दृश्य 15 अक्टूबर की यह दृश्य बंगलौर से दूर बेल्लारी शहर में दोहराया जा सकता है जब कुछ कन्नड़ फिल्म निर्माता, और उनके प्रतिनिधि 'बेल्लारी चलो' अभियान के तहत तेलगू फिल्म, 'शंकर दादा एमबीबीएस' को दिखाए जाने का विरोध करने जा रहे हैं. इस फिल्म के हीरो जाने-माने अभिनेता, चिरंजीवी हैं. पिछले दो महीने से भारत के आईटी उद्योग के गढ़ के नाम से मशहूर शहर, बंगलौर और कर्नाटक के बाकी शहरों के सिनेमा घरों का धंधा क़रीब-क़रीब बंद है. कन्नड़ भाषाई फिल्मों की गिरती लोकप्रियता के लिए कन्नड़ फिल्मकारों और कन्नड़ भाषा के कथित संरक्षक जैसे की 'कर्नाटक रक्षिने वैदिके ' ने तय किया कि कन्नड़ फिल्मों को प्रोत्साहित करने के लिए गैर-कन्नड़ फिल्मों पर प्रतिबंध लगाया जाए. मांग उठी की कर्नाटक राज्य में कन्नड़ भाषा और संस्कृति की रक्षा के लिए हिन्दी, अंग्रेज़ी, तमिल, तेलगू और मलयालम फिल्मों पर अंकुश लगाया जाए. कन्नड़ फिल्म प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन ने घोषणा की कि नई ग़ैर-कन्नड़ फिल्मों को कर्नाटक राज्य में सात हफ्तों तक नहीं दिखाया जाए. फिल्म प्रदर्शकों और सिनेमा हॉल मालिकों का तर्क है कि कन्नड़ भाषाई फिल्म अधिक पसंद नहीं की जातीं. वे कहते हैं कि कन्नड़ फिल्मों की क्वालिटी अच्छी नहीं होती- वो या तो तेलगू, तमिल और हिन्दी फिल्मों के रीमेक होते हैं नहीं तो गानों और कहानी के हिसाब से भद्दे. लिहाज़ा सिनेमा घर वो ही फिल्में दिखांएगी जिन्हें दर्शक देखना चाहें. बंगलौर के 'रेक्स सिनेमा' के रवि कपूर ने बीबीसी से कहा, " दर्शक लाना हमारी ज़िम्मेदारी नहीं है. अगर कन्नड़ फिल्में नहीं चलती तो हम क्या करें." आरोप लेकिन कन्नड़ फिल्म प्रोड्यूसरों का आरोप है कि यह सिनेमा घर कन्नड़ फिल्में नहीं दिखाते. इस तर्क को समर्थन मिला, कन्नड़ फिल्मों के जाने-माने कलाकार, राजकुमार से, जिनके वीरपन्न द्वारा अपहरण से राज्य में जनजीवन ठप हो गया था. राजकुमार की छवि के कारण और कन्नड़ विरोधी साबित हो जाने के डर से, एक भी राजनीतिक पार्टी ने इस विषय पर अपना रूख साफ नहीं किया है. यहां तक कि गठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता, धर्म सिंह ने राजकुमार से खुद मिलने जाने की पेशकश की है. धर्म सिंह ने 'सात हफ्ते की समयसीमा' पर कुछ कहा नहीं है. हालांकि इसके बारे में कोई सरकारी निर्देश जारी नहीं किया गया क्योंकि उससे तुरंत कानूनी चुनौती चुनौती दी जा सकती है. बात यहाँ तक पहुँच गई कुछ हफ्तों पहले हैदराबाद में एक बैठक में मुंबई फिल्म उद्योग से जुड़े लोगों और तेलगू फिल्म उद्योग के प्रतिनिधियों ने 'सात हफ्ते की समय सीमा' से, जो उनकी फिल्मों को नुकसान हुआ, उसके विरोध में घोषणा की कि वो कन्नड़ उद्योग को साजो-सामान नहीं देंगे. इससे कन्नड़ फिल्म उद्योग से जुड़े लोग और भड़क गए और उन्होंने अपने निर्णय न बदलने का ऐलान किया. कन्नड़ उद्योग की एक माँग और भी है कि राज्य सरकार ने ग़ैर-कन्नड़ फिल्मों पर टैक्स घटाकर 70 फीसदी से 40 फीसदी करने का जो निर्णय लिया था उसे वो वापिस ले. उल्लेखनीय है कि कन्नड़ फिल्मों पर कोई भी टैक्स नहीं लगता. इस विषय पर 10 अक्टूबर को उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री सिद्धरमैया कन्नड़ फिल्म उद्योग के प्रतिनिधियों से बैठक करेंगे. इस बीच कुछ सिनेमा घरों ने पुरानी अंग्रेज़ी फिल्में दिखानी शुरू कीं. लेकिन वे बताते हैं कि उनकी आमदनी बहुत घट गई. फिल्मकार और अभिनेता, गिरीश कर्नाड का कहना है कि प्रतिबंध इस समस्या का हल नहीं है बल्कि बेहतर कन्नड़ फिल्में बनानी होंगी. जबकि कन्नड़ फिल्मकार जी. कासखल्ली का कहना है, इस तरह के प्रतिबंध से ही कन्नड़ फिल्में लोकप्रिय होंगी. इस बीच सरकार ने बंगलौर के सिनेमा घरों पर हमला करने वालों के ख़िलाफ़ मामले वापिस लेने का मन बना लिया है. कन्नड़ अभिनेता अशोक ने अगले महीने एक नए कन्नड़ फिल्म चैम्बर्स आँफ कॉमर्स की स्थापना करने की घोषणा की है. इस संगठन में केवल कन्नड़ लोगों को सदस्य बनाया जाएगा, क्योंकि उनके अनुसार मौजूदा कन्नड़ फिल्म चैम्बर्स आँफ कॉमर्स के अधिकतर सदस्य कर्नाटक के मूल नागरिक नहीं हैं. |
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