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'बाद में जाना कि मेरे नाना बड़े आदमी थे' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सहगल साहब की शादी हुई थी आशारानी से. हिमाचल के एक छोटे से गाँव से आईं थीं वो. उसी समय सहगल साहब की फ़िल्म 'चंडीदास' रिलीज़ हुई. सहगल साहब सपरिवार फ़िल्म देखने पहुँचे. गहमा गहमी के बीच फ़िल्म चलती रही. लोग सहगल साहब से मिलने आते रहे और वो ज़्यादा देर अपनी पत्नी के पास नहीं बैठ पाए. उधर पर्दे पर सहगल साहब की शादी हो गई. सहगल साहब की पत्नी को लगा कि इस गहमागहमी के बीच सहगल साहब ग़ायब हैं तो ज़रुर जो दिख रहा है वह सही है और उनकी शादी सचमुच किसी और से हो गई है. सहगल को आशारानी को समझाने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ी कि वो सब फ़िल्मी था सच नहीं. यहाँ तक कि उन्हें स्टूडियो ले जाकर शूटिंग भी दिखानी पड़ी. आशारानी मेरी नानी थीं और सहगल मेरे नाना. नानी ने यह घटना ख़ुद मुझे सुनाई थी. ख़ाना बनाने का शौक यह सवाल अपने आपमें अटपटा लगता है कि मैं सहगल साहब को कैसे याद करता हूँ, वो तो हर वक़्त मेरे जीवन में बसे हुए हैं. मैं दस बारह बरस का हो चुका था तब तक तो मेरे नानाजी मेरे लिए एक सामान्य नाना ही थे. बाद में जब रेडियो में उनके गाने सुनने लगा और लोगों से अपने नानाजी के बारे में बातें सुनने लगा तब समझ में आया कि मेरे नाना कोई सामान्य से नाना नहीं हैं. बहुत अलग और बड़े हैं. मैं ख़ुद तो सहगल साहब की मृत्यु के तेरह-चौदह साल बाद पैदा हुआ इसलिए मेरे पास जो भी अनुभव है वह या तो माँ से सुना हुआ है या नानी से. माँ के पास भी अपना निजी अनुभव बहुत कम था क्योंकि जब नानाजी का देहांत हुआ तो मेरी माँ की उम्र सिर्फ़ पाँच साल की थी. उन्हें लिए पिताजी की याद सिर्फ़ वैसी ही थी जैसी एक बच्ची की हो सकती थी. अलबत्ता नानी उन्हें बहुत भावुक होकर याद करती थीं. रेडियो या रिकॉर्ड पर सहगल साहब का गाना बजा नहीं कि वे पुरानी यादों में खो जाती थीं. फ़िल्मी शादी की घटना तो मज़ेदार था ही. नानी बताती थीं कि नानाजी को ख़ाना बनाने का भी शौक था. वे बहुत शौक से मेथी-मीट बनाते थे. उनके लिए ताँबे की एक अलग हाँडी थी जिस पर यह लज़ीज़ व्यंजन बनता था. अब जब उनकी जन्म-शताब्दी मनाई जा रही है, तो लोगों का उनके प्रति प्यार देखकर बहुत अच्छा लगता है. दिल भीग जाता है. (विनोद वर्मा से हुई बातचीत के आधार पर) |
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