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अप्रतिम गायक-नायक सहगल | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यह सही है कि जिस दौर में सहगल हुए उस दौर में उनके जैसे नायक तो कई थे लेकिन आवाज़ का फ़नकार उनकी तरह का कोई नहीं था. चार अप्रैल 1904 को जन्मे सहगल 1931-32 में एक मामूली कलाकार की तरह 'सुबह का सितारा' और 'ज़िंदा लाश' फ़िल्मों के ज़रिए फ़िल्मी दुनिया में आए लेकिन वे कोई पहचान नहीं पा सके. तब सहगल कश्मीरी थे. उनका नाम चमका 'देवदास' फ़िल्म में काम करने के बाद. वे बांग्ला के 'देवदास' में काम कर चुके थे. लेकिन पीसी बरुआ की हिंदी की 'देवदास' में उन्होंने जो हुनर दिखाया वह बेमिसाल था. दरअसल इसी फ़िल्म ने न्यू थिएटर्स के इस सितारे को पूरे देश में चमकाया. 'बलम आए बसो मोरे मन में', 'पिय बिन आए न चैन' और 'अब दिन बीतत नाही' का जादू कोलकाता से लेकर लाहौर तक छा गया. आवाज़ का तिलस्म उस दौर में भी सहगल से भी बड़े कृष्णचंद्र डे, पंकज मलिक, पहाड़ी सान्याल जैसे गायक थे लेकिन वह दौर सहगल के नाम ही रहा. दरअसल उनकी आवाज़ उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ या खरज के दूसरे माहिर गायकों की तरह लगती थी. पर उसका रहस्य या तिलस्म कुछ अलग ही था. उनकी दरवेशी आवाज़ पर फ़िदा होने वालों में उस्ताद अब्दुल करीम खाँ जैसे गायक भी थे. ये नज़ीरें यह साबित करने के लिए काफ़ी हैं कि शास्त्रीय संगीत में दक्ष न होने के बावजूद उनकी गायकी उस्तादों और पंडितों को भी चकित कर देती थी. आज यह बताना बड़ा विकट काम है कि उनकी गायकी सबसे निराली क्यों है और उनके गीत साठ-सत्तर साल बाद भी मधुर क्यों लगते हैं. क्या वजह है कि उनके अंदाज़ में विज्ञापनों के तराने बनते हैं. थोड़े में यह बताना होगा कि हमारी नाद-परंपरा में माना जाता है कि नाभि और ब्रह्मरंध्र से निकलने वाली आवाज़ अलौकिक असर करती है. संयोग से सहगल को प्रकृति ने यही आवाज़ दी थी. भले ही बाद के गायकों, सुरेंद्र, श्याम, जीएम दुर्रानी, सीएच आत्मा में उनकी गायकी की झलक दिखती है पर वे साधक स्वर शायद ही महसूस होते हों. मंद और तार सप्तक तक सहज उड़ान भरने की कला सहगल के गले में ही थी. अदाकारी का सवाल
सहगल के कई मुरीद मानते हैं कि वे अदाकारी में भी विलक्षण थे. 'स्ट्रीट सिंगर', 'सूरदास' और 'शाहजहाँ' जैसी उनकी फ़िल्मों के उदाहरण भी दिए जाते हैं लेकिन हक़ीक़त में सहगल के ज़्यादातर प्रशंसकों ने यह फ़िल्म देखी ही नहीं हैं. 'स्ट्रीट सिंगर' याद की जाती है 'बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए...' गाने के लिए जो आज तक की गायकी का महान नमूना है. ख़ास बात यह है कि यह ठुमरी सीखने के लिए सहगल कोलकाता से लखनऊ गए थे और वहाँ शंभू महाराज से यह ठुमरी सीखी थी. 'झुलना झुलाओ' एक प्राइवेट रिकॉर्ड था और इसने उस दौर में लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे. सहगल की फ़िल्मों में 'शाहजहाँ','परवाना','माई सिस्टर','यहूदी की लड़की','लगन' और 'प्रेसीडेंट' का नाम लिया जाता है लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि ये फ़िल्में उनकी अदाकारी से ज़्यादा गायकी के लिए याद की जाती है. 'ग़म दिए मुस्तकिल...','जब दिल ही टूट गया...','सो जा राजकुमारी...','एक राजा का बेटा' और 'हाय किस बुत की मुहब्बत में...' जैसे गानों वाली इन फ़िल्मों से वास्तव में कम ही लोग वाकिफ़ हैं. हक़ीकत में वे फ़िल्मों के नायक के रुप में भी अपनी लासानी गायकी का ही जादू बिखेरते रहे. आज की पीढ़ी उस नायक को नहीं, गायक को याद रखे हुए है. आज उनकी आवाज़ और अंदाज़ में मजाहिया अदाएँ दिखाने वालों को यह जानकर अचरज हो सकता है कि एक ज़माने में सहगल की नकल उतारने भर से ही कोई गायक मान लिया जाता था. तलत, मुकेश, रफ़ी और किशोर जैसे कलाकारों ने शुरु में सहगल की गायकी की नकल उतारकर ही गायन यात्रा शुरु की थी. अच्छा हुआ कि ये सब बाद में अपने अंदाज़ वाले गायक बन गए. यह सही है कि लोकप्रिय संगीत के मौजूदा दौर में सहगल जैसी आवाज़ और शैली अप्रासंगिक लगती है. लेकिन क्या कारण है कि 60-65 साल पहले गाए हुए उनके गीत नए ज़माने में भी गुनगुनाए जा रहे हैं. और दूसरी ओर आज के वे बेरस गीत हैं जो चार दिन बाद बिसरा दिए जाते हैं. यह फ़र्क ही सहगल और उनकी गायकी की श्रेष्ठता और महानता सिद्ध करता है. जन्मशती वर्ष में उनके गीतों को दुनिया भर के भारतवासी जिस तरह याद कर रहे हैं तो इसलिए कि इस दौर में भी उनके कद्रदान कम नहीं हुए हैं. कहना होगा कि जिस तरह शायरी की दुनिया में ग़ालिब प्रासंगिक हैं उसी तरह गायकी में सहगल. |
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