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वसंत पर पतंग की उड़ान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्राचीन भारत में पूरे साल को जिन छह मौसमों में बाँटा जाता था उनमें वसंत लोगों का सबसे मनचाहा मौसम था. जब फूलों पर बहार आ जाती, खेतों मे सरसों का सोना चमकने लगता, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगतीं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाता और हर तरफ़ रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराने लगतीं. वसंत ऋतु का स्वागत करने के लिए माघ महीने के पाँचवे दिन एक बड़ा जश्न मनाया जाता था जिसमें विष्णु और कामदेव की पूजा होती, यह वसंत पंचमी का त्यौहार कहलाता था. पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी... और यूँ भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी जो कि आज तक जारी है. पतंगबाज़ी का वसंत से कोई सीधा संबंध नहीं है. लेकिन पतंग उड़ाने का रिवाज़ हज़ारों साल पहले चीन में शुरू हुआ और फिर कोरिया और जापान के रास्ते होता हुआ भारत पहुँचा. सीमा नहीं भारत में इसका सबसे पुराना दस्तावेज़ी सबूत मुग़ल ज़माने की कलाकृतियों में नज़र आता है. वसंत ऋतु के स्वागत के लिए भारत भर में जो हल्ले गुल्ले के त्यौहार सदियों से जारी थे, इतिहास के किसी अनजाने मोड़ पर उनमें पतंगबाज़ी भी शामिल हो गई.
और पंजाब के इलाक़े में तो वसंत के त्यौहार का सारा माहौल पतंगबाज़ी तक सीमित होकर रह गया. बँटवारे के बाद पाकिस्तानी पंजाब में भी पतंग उड़ाने का रिवाज़ तो रहा लेकिन ये शौक़ सिर्फ़ गली मोहल्ले तक ही सिमटा रहा था. ऊँचे घरानों में इसे आवारागर्दों और बेकार लोगों का शौक समझा जाता था. लेकिन सन 1980 की दशक में एक बहुत बड़ा बदलाव आया और बड़े बड़े घरानों में भी पतंगबाज़ी के शौक को क़बूल कर लिया गया. 1980 का दशक पाकिस्तान में ज़ियाउल हक़ का दशक था जब साहित्य, कला और संस्कृति पर तरह-तरह की पाबंदियाँ लग गई थीं. फ़िल्म और रंगमंच भी शिकंजा कस दिया गया और जनता के लिए हर तरह के मनोरंजन पर पाबंदी लगा दी गई. सैनिक सरकार और धार्मिक कट्टरता के इस दौर में लोग अपने मनोरंजन का कोई रास्ता तलाश रहे थे और वसंत की शक्ल में लोगों को एक बढ़िया तफ़रीह हाथ लग गई. गली मोहल्लों में तो पतंगबाज़ी की परंपरा पहले से जारी थी, अब कोठियों और बंगलों में भी इसे स्वीकार कर लिया गया. रात की पतंगबाज़ी लाहौर में मियाँ सलाहुद्दीन की हवेली इस मशग़ले का पहला केंद्र बनी जहाँ हर साल विदेशों से आने वाले मेहमानों को ठहराया जाता और पतंगबाज़ी का नज़ारा दिखाया जाता.
यूँ तो पाकिस्तान के कई शहरों में वसंत के दिन पतंगबाज़ी होती है लेकिन लाहौर की ख़ास पहचान है वहाँ की नाइट वसंत यानी रात को की जाने वाली पतंगबाज़ी. शाम होते ही छतों पर बड़ी-बड़ी सर्च लाइटें लगा दी जाती हैं जिन से आसमान जगमगा उठता है. लाहौर के जियाले छतों पर चढ़कर सारी रात पतंगबाज़ी करने में भी नहीं थकते. छतों पर बड़े-बड़े लाउडस्पीकर लगे होते हैं जिन पर गाने बजते रहते हैं और पूरा समाँ देखने लायक़ होता है. वसंत वाले सप्ताह में पंचसितारा होटलों में इतनी भीड़ रहती है कि तिल धरनी की जगह भी नहीं रहती. हर होटल की छत पर पतंगबाज़ी का इंतज़ाम रहता है. ख़ासतौर से विदेशी पर्यटकों के लिए यह बिल्कुल अनोखा और रंगबिरंगा मौक़ा होत है. वे सारी रात इसका मज़ा लेने से नहीं चूकते. रोज़गार इस वक़्त लाहौर और पाकिस्तानी पंजाब के दूसरे शहरों में लाखों लोगों का रोज़गार पतंगबाज़ी के शौक से जुड़ा हुआ है. पतंग बनाने के रोज़गार में लगे लोग वसंत के आसपास इतनी कमाई कर लेते हैं कि सारा साल उनका ख़र्च चल जाता है. लोगों का इतना जोशो-ख़रोश देखते हुए पाकिस्तान में पंजाब सरकार ने भी वसंत की सरपरस्ती शुरू कर दी है और अब हर साल फ़रवरी में "जश्ने बहारा" के नाम से एक बहुत बड़ा समारोह मनाया जाता है जिसमे हिस्सा लेने के लिए दुनिया भर से लोग आते हैं. इस बरस तो भारत से भी साहित्याकारों, पत्रकारों, कलाकारों और फ़िल्मी हस्तियों की बड़ी संख्या लाहौरी वसंत में हिस्सा लेने के लिए पाकिस्तान पहुँच रही है. |
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