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"कामुकता पाप नहीं, अच्छी है"
कामुकता सदियों से जीवन के सात घोर पापों में से एक रही है. लेकिन अब एक जाने-माने दार्शनिक का कहना है कि 'लस्ट' यानी कामुकता या यौनलिप्सा को पाप या बुराई बेवजह ही कहा गया. उनका मानना है कि कामुकता को मानव जीवन का अभिन्न अंग मानना चाहिए क्योंकि यह मनुष्य के लिए अच्छी है और अनैतिक भी नहीं है. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सिमोन ब्लैकबर्न 'कामुकता' को बचाने की कोशिशों में लगे हुए हैं. उनका कहना है कि कामुकता को सदियों से ग़लत ढंग से परिभाषित किया जाता रहा है. उन्होंने लंदन से प्रताशित होने वाले एक अख़बार से बातचीत में कहा, ''सेक्स आनंद है और इसे मानवता के लिए जीवन में फिर स्थान दिया जाना चाहिए.'' प्रोफ़ेसर ब्लैकबर्न की यह अवधारणा ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के चार साल से चल रहे उस शोध-अभियान का हिस्सा है जिसमें जीवन के सात घोर पापों की प्रासंगिकता की फिर से जाँच पड़ताल की जा रही है. ग़ौरतलब है कि छठी सदी में पोप ग्रेगरी ने जीवन के सात घोर पापों का निर्धारण किया था और तभी से लोग इन्हें मान्यता देते आए हैं. "कामुकता अच्छी" प्रोफ़ेसर ब्लैकबर्न कहते हैं कि पुराने धर्माचार्यों की वजह से यह धारणा बन गई है कि कामुकता पाप है या एक बुरा काम है. वह इसके लिए कुछ पादरियों के अलावा जर्मन दार्शनिक कांट को भी इसके लिए दोषी ठहराते हैं.
लंदन से प्रकाशित अख़बार संडे टाइम्स के अनुसार उन्होंने कहा, ''कामुकता का मतलब है यौन क्रिया के लिए उत्सुकता और अपने लिए आनंद की प्राप्ति.'' वह कहते हैं कि अब उनकी कोशिश मानव जीवन के लिए कामुकता को बचाकर इसे पाप से अच्छाई की श्रेणी में लाना है. वैसे उनका दावा है कि सत्रहवीं शताब्दी में थॉमस हॉब्स और अठारवीं सदी में डेविड ह्यूम जैसे दार्शनिकों ने भी कामुकता को अच्छाई माने जाने की हिमायत की थी. प्रोफ़ेसर ब्लैकबर्न कहते हैं, ''सवाल कामुकता का नहीं है सवाल यह है कि हम उसे किस तरह अपने नियंत्रण में रखते हैं.'' सात पाप छठी सदी में पोप ग्रेगरी ने जीवन के सात घोर पापों का निर्धारण किया था और तभी से लोग इन्हें मानते आए हैं. ये सात पाप हैं - अहंकार, ईर्ष्या, कामुकता, आलस्य, क्रोध, लालच और पेटूपन यानी ज़्यादा खाने की इच्छा है. वैसे भारतीय समाज में भी सदियों से कमोबेश इन्हीं को मानव का सबसे बड़ा दुश्मन माना जाता रहा है. वैसे तो समय समय पर इन पर सवाल भी उठते रहे हैं लेकिन इस बार बाक़ायदा एक अध्ययन हो रहा है कि वर्तमान जीवन शैली, आध्यात्मिकता और नैतिकता के पैमाने में इन पापों की कितनी प्रासंगिकता है. योजना यह अघ्यययन ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस और न्यूयॉर्क पब्लिक लाईब्रेरी की संयुक्त योजना है.
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की जनसंपर्क अधिकारी केट फ़ाकहर थॉमसन ने बीबीसी हिदी ऑन लाइन को बताया कि दोनों संस्थाएँ मिलकर दुनिया के सात घोर पापों की प्रासंगिकता का अध्ययन कर रही हैं. इसके लिए प्रोफ़ेसर ब्लैकबर्न के अलावा छह और विद्वानों को अलग अलग 'पापों' पर अध्ययन करने के लिए कहा गया. इसमें लेखक, कलाकार और दार्शनिक शामिल हैं. इनमें जोसेफ़ एपिस्टीन, वेंडी वासरस्टीन, फ़्रांसिन प्रोज़ वग़ैरा के नाम प्रमुख हैं. केट के अनुसार ये विद्वान अपने-अपने विषयों पर अध्ययन कर रहे हैं और न्यूयॉर्क पब्लिक लाईब्रेरी इस पर लेक्चर का आयोजन भी कर रही है. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की योजना इन विषयों पर सात अलग-अलग किताबें छापने की है. केट के अनुसार इनमें से दो किताबें गत वर्ष नवंबर में प्रकाशित हो चुकी हैं और तीसरी प्रोफ़ेसर ब्लैकबर्न की किताब इस साल फ़रवरी में प्रकाशित हो जाएगी. |
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