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मंगलवार, 13 जनवरी, 2004 को 14:19 GMT तक के समाचार
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आया रे आया सिनेमा वाला आया!

चलता फिरता सिनेमा घर
ऐसे दिखाता है सलीम सिनेमा
कोलकाता की गलियों में जैसे ही अंधेरा होता है सलीम की हाथगाड़ी निकल पड़ती है, ग़रीब बच्चों के लिए टेक्नीकलर सपना लिए हुए.

सलीम के पास एक जापानी प्रोजेक्टर है जो 107 साल पुराना है और छोटे स्पीकर हैं जो उन्होंने ख़ुद अपने घर पर बनाए हैं.

बिलकुल ताबूत की शक्ल वाली यह हाथगाड़ी सलीम का चलता फिरता सिनेमा घर है जो कोलकाता की ग़रीब बस्तियों की गलियों में ख़ासा लोकप्रिय है.

सिनेमा शुरु होते ही बच्चे, और कभी कभी बड़े भी कैमरे के ऊपर पड़ा हुआ कपड़ा उठाकर अपना सिर भीतर घुसा लेते हैं.

उस काले कपड़े के पीछे ढाई इंच का एक पर्दा है जिस पर फ़िल्म दिखाई देती है, यानी पुराने बाईस्कोप की तरह.

लेकिन इससे पहले दर्शकों से सलीम एक-एक रुपया वसूलते हैं, सिनेमा का टिकट.

फ़िल्म

लेकिन यह पूरी फ़िल्म होती है - ब़ाकायदा आवाज़ों और गानों के साथ.

एक बच्चा ख़ुशी से चिल्लाता है, ''यह तो नई फ़िल्म है, यह तो नई फ़िल्म है.''

सलीम
सलीम को अक्सर फ़िल्म अपने घर पर तैयार करनी होती है

इस ज़माने में जब केबल टीवी घर-घर पहुँच गया है और रंगीन टीवी घर में होना एक आम बात है, ऐसे वक़्त में भी सलीम का यह सिनेमा घर काफ़ी लोकप्रिय है.

वह एक बार में क़रीब दस मिनट की एक फ़िल्म दिखाते हैं.

ये फ़िल्में सलीम सिनेमा घरों की रद्दी से दस रुपए किलो की दर से ख़रीदते हैं.

वे बताते हैं कि उन्हें अपनी फ़िल्म के लिए पूरा मसाला जुटाना होता है. गाने, ढिशुम-ढिशुम और थोड़ा ड्रामा भी.

इसके लिए उन्हें आमतौर पर किसी भी फ़िल्म के ट्रेलर की तलाश होती है. वह न मिला तो अपने एक कमरे के मकान में पुरानी फ़िल्मों को जोड़कर अपनी फ़िल्म ख़ुद बनाते हैं.

कारीगरी

सलीम जैसे ही गलियों में पहुँचते हैं, बच्चे खुशी से चिल्लाने लगते हैं, ''सिनेमा वाला आ गया! सिनेमा वाला आ गया!''

प्रोजेक्टर
1897 के इस प्रोजेक्टर से सलीम ने कई कारगुज़ारियाँ दिखाई हैं

सिनेमा वाले सलीम की यह आजीविका पचास साल पहले तब शुरु हई जब उसके पिता यह कैमरा एक पुराने सिनेमाघर से दो सौ रुपए में ख़रीद लाए थे.

सलीम को लगा कि हाथ गाड़ी के इस सिनेमा घर के लिए प्रोजेक्टर का लैंस बहुत ताक़तवर है और इससे काम नहीं चलने वाला है.

तब उन्होंने बाजार से तीन रुपए में एक पॉवर काँच खरीदा और उसे काम के लायक बनाया.

दूसरी दिक़्क़त यह थी कि यह प्रोजेक्टर मूक सिनेमा यानी बिना आवाज़ वाली फ़िल्मों के लिए बनाया गया था.

जब रंगीन टीवी आया तो सलीम को लगा कि वह बेरोज़गार हो जाएँगे, फिर उन्होंने उस प्रोजेक्टर में आवाज़ का प्रबंध किया.

आज सलीम हर दिन लगभग छह घंटे इस हाथगाड़ी को साथ लिए बीस किलोमीटर का चक्कर लगाते हैं.

उन्हें दिन में सौ से डेढ़ सौ रुपए प्रतिदिन कमाई भी हो जाती है.

सलीम कहते हैं कि इससे छह बच्चों वाले उनके परिवार का ग़ुज़ारा हो जाता है लेकिन वह यह भी मानते हैं कि उनके बच्चे इसके भरोसे नहीं जी सकेंगे.

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