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यूके महोत्सव: दूरियाँ मिटाने की कोशिश
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में चल रहे यूके महोत्सव ने एक तरह से टेम्स और हुगली नदियों के बीच की दूरियाँ मिटाने की कोशिश की है. राज्य सरकार के सहयोग से ब्रिटिश उप-उच्चायोग की ओर से कोलकाता और ब्रिटेन के संबंधों को मज़बूत बनाने के लिए आयोजित अपनी तरह का ये पहला और अनूठा महोत्सव स्थानीय लोगों के अलावा विदेशी पर्यटकों के भी आकर्षण का केंद्र है. इस दस दिवसीय महोत्सव का मुख्य विषय है ब्रिटेन और कोलकाता. इस उत्सव की शुरुआत बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने किया. इस मौक़े पर भारत में ब्रिटेन के नए उच्चायुक्त माइकल आर्थर भी मौजूद थे. कार्निवल महोत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण रहा कोलकाता कार्निवल. महानगर के पहले और भारत के इस सबसे बड़े कार्निवल का आयोजन इतना भव्य था कि देखनेवाले इसे जीवन भर नहीं भूल पाएँगे. पूरब और पश्चिम के इस अनूठे मेल के ज़रिए इस कार्निवल के बारे में और जानकारी दी गई.
ब्रिटिश कार्निवल कंपनी काइनेटिका के निर्देशक अली प्रेटी ने कार्यक्रम का संचालन किया जिसमें ब्रिटेन की महारानी रहीं विक्टोरिया की साज-सज्जा में ब्रितानी महिलाएँ थीं तो रंग-बिरंगे पोशाकों में सजे स्कूली बच्चे और बंगाल के पारंपरिक नर्तक भी थे. अली ने कोलकात बंदरगाह से गन्ने के खेतों में काम करने गए भारतीय मज़दूरों की यात्रा की गाथा और विभिन्न संस्कृतियों के मिश्रण का ब्यौरा देकर कोलकाता-त्रिनिदाद और लंदन को एक ही धागे में पिरो दिया. एक स्विस पर्यटक इज़ाबेल राइडर का कहना था कि उसने देश विदेश में कार्निवल देखे मगर ऐसा कभी नहीं देखा. वहीं ब्रितानी उप-उच्चायुक्त एंड्रयू हॉल का कहना था कि भारत में शायद पहली बार किसी कार्निवल के लिए इतनी बड़ी संख्या में कलाकार इकट्ठे हुए हैं. मज़बूत रिश्ते उनके अनुसार इस कार्निवल को कोलकाता के तरीक़े से ही पेश किया गया है जिससे कोलकाता औऱ ब्रिटेन के रिश्ते और मज़बूत होंगे.
इस साल सितंबर महीने में थेम्स नदी के किनारे भी इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. जानी-मानी कलाकार तनुश्री शंकर इसकी नृत्य-निर्देशक थीं जबकि कार्निवल के डिज़ाइन और वेशभूषा का काम त्रिनिदाद के कलाकारों कार्ल गैब्रिएल, मर्फ़ी वॉल्टर्स और कार्लटन गार्सिया ने किया. इस दौरान कई और व्यापारिक और सांस्कृतिक आयोजन हुए. इनमें रॉयल कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स एडिनबरा का सम्मेलन और ब्रिटेन में निवेश पर संगोष्ठी भी थी. इस मौक़े पर आधुनिक सिनेमा की विविधता पर एक फ़िल्मोत्सव बी हुआ जिसमें एशियाई मूल के कई ब्रितानी निर्माताओं की फ़िल्में दिखाई गईं. अब आम राय बन रही है कि ऐसे महोत्सवों का आयोजन हर साल होना चाहिए. |
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