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बच्चों को नहीं भूले रस्किन
एक लंबे समय से अपनी रोचक कहानियों, उपन्यासों और संस्मरणों से बच्चों का मनोरंजन करने वाले मशहूर लेखक रस्किन बाँड अब अपनी आत्मकथा के साथ हाज़िर हुए हैं. चार किताबों की श्रृंखला वाली उनकी आत्मकथा में वैसे तो उनकी ज़िंदग़ी का लेखा-जोखा ही है लेकिन इसमें काल्पनिकता भी है. इसमें उनकी अपनी कहानी के अलावा काल्पनिक पात्र भी हैं. काल्पनिकता को शामिल करने के बारे में रस्किन कहते हैं, “फैंटेसी का पुट देना ज़रूरी था वरना निराशा होती क्योंकि आपको तो मालूम ही है कि बच्चों के लिए लिखना बड़ों के लिए लिखने से कहीं कठिन है.” उनके अनुसार, “पहले पन्ने से ही बच्चों को आकर्षित करना ज़रूरी है क्योंकि बड़े तो शायद आपको एक या दो अध्यायों तक मौक़ा दे दें लेकिन बच्चों को तो अगर कोई रचना शुरू से ही रोचक और सरस नहीं लगी तो वे दूसरे पन्ने को तो हाथ भी नहीं लगाएँगे.” रस्किन का कहना था कि आलंकारिक भाषा और दार्शनिक अंदाज़ बच्चों को नहीं लुभाते इसलिए उनके लिए लिखते वक़्त कड़ा अनुशासन और मेहनत करनी होती है. चार कड़ियों में आत्मकथा रस्किन बाँड की इस आत्मकथा में चार किताबें हैं जिनमें से तीन हाल में ही प्रकाशित हुई हैं और चौथी अगले महीने तक बाज़ार में आ जाएगी. पहली कड़ी है ‘रस्टी द बॉय फ़्रॉम हिल्स’ जिसमें उन्होंने देहरादून में अपने दादा-दादी के साथ बिताए बचपन को याद किया है.
दूसरी कड़ी का नाम ‘रस्टी रन्स अवे’ है जिसमें ये दास्तान है कि किस तरह रस्किन ने किशोरावस्था में स्कूल से भागकर मन भाने वाले झरनों, पहाड़ों और नज़ारों के बीच समय बिताया. तीसरी किताब है ‘रस्टी ऐंड द लेपर्ड’ जिसमें रस्किन जीवन की कठिनाइयों से रूबरू होते हुए बड़े होते हैं. रस्किन चौथी किताब लिख रहे हैं जिसका नाम ‘रस्किन गोज़ टू लंदन’ है. ये पुस्तक उनके लेखक बनने का ब्यौरा पेश करती है. रस्किन का जन्म 1934 में हिमाचल प्रदेश में कसौली में हुआ था मगर कुछ ही समय बाद उनका परिवार देहरादून आ गया. उनका पहला उपन्यास 17 वर्ष की उम्र में प्रकाशित हुआ था और वह पुरस्कृत भी हुआ था. अब तक तो वह 500 से भी ज़्यादा कहानियाँ, उपन्यास और लेख लिख चुके हैं. उनकी मशहूर किताब ‘अ फ़्लाइट ऑफ़ पिजन्स’ पर तो जूनून नाम से फ़िल्म भी बन चुकी है. भारत प्रेम उन्हें 17 वर्ष की उम्र में ज़बरदस्ती लंदन भेजा गया था मगर वह भागकर फिर भारत पहुँच गए. इसकी वजह के बारे में रस्किन कहते हैं, “मैंने अपने आपको वहाँ फ़िट नहीं पाया. मेरा बचपन और जवानी यहाँ बीती थी. वापस लौटने की कसक इतनी ज़्यादा थी कि मैं वहाँ रुक ही नहीं पाया.”
मगर क्या कभी रस्किन को इस फ़ैसले पर मलाल हुआ है, ये पूछे जाने पर रस्किन तपाक से कहते हैं, “नहीं, कभी नहीं. मैं भारतीय हूँ ठीक वैसे ही जैसे कोई गुजराती या मराठी होगा.” रस्किन जैसा लिखते हैं वैसे ही दिखते भी हैं. सरल, रोचक और हँसमुख. उम्र के इस पड़ाव पर रस्किन कहते हैं कि अभी बहुत कुछ लिखना बाक़ी है. मसूरी से उन्हें गहरा प्रेम है और अपने गोद लिए परिवार के साथ वह वहीं रहते भी हैं. उन्हें बच्चों से और बच्चों को उनसे प्यार भी है. वह कहते हैं, “मेरा गोल-मटोल और थुलथुल शरीर बच्चों को खूब भाता है.” मसूरी आने वाले लोग अनायास ही उनके घर की ओर खिंचे चले आते हैं. रस्किन कहते हैं कि कई बार उन्हें अच्छा लगता है कि लेकिन इससे कभी-कभी उनके लेखन में बाधा भी पड़ती है. मगर ये शायद इस बात का भी प्रमाण है कि आज के दौर में जब किताबों के प्रति रुझान घट रहा है कोई लेखन इतना लोकप्रिय है. |
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