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'मौलाना' पर पाबंदी पर कड़ी आपत्ति
मशहूर सिने अभिनेता और रंगकर्मी टॉम आल्टर के नाटक 'मौलाना' पर गुजरात सरकार ने पाबंदी लगा दी है जिसका टॉम आल्टर ने कड़ा विरोध किया है और इसे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमला बताया है. मौलाना का शो अहमदाबाद में नौ नवंबर को होना था लेकिन पहले वहाँ के सेंसर बोर्ड ने इसके कुछ हिस्से हटा दिए जाने की शर्त रखी फिर बाद में इसे दिखाए जाने पर ही पाबंदी लगा दी. स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आज़ाद पर केंद्रित इस एकल नाटक में टॉम आल्टर मौलाना आज़ाद की भूमिका निभा रहे हैं. गुजरात सरकार को इसके कुछ हिस्से पर आपत्ति है. टॉम आल्टर कहते हैं, "जब हम दिल्ली, मुंबई, देहरादून और मसूरी में इसके कई शो कर चुके हैं तो गुजरात क्या हिंदुस्तान से अलग है. ये बकवास है और गुजरात सरकार को इसका जवाब देना होगा." उनका कहना था, "मौलाना आज़ाद जैसी शख़्सियत को हिंदू-मुस्लिम एकता आज़ादी से भी ज़्यादा अज़ीज़ थी और इस नाटक से किसी को तकलीफ़ हो रही है तो इसका मतलब है उसे हिंदू मुस्लिम एकता नहीं चाहिए." देहरादून में नाटक की प्रस्तुति के सिलसिले में आए टॉम आल्टर इस बारे में बात करते-करते जज़्बाती हो उठे. पृष्ठभूमि 'मौलाना' नाटक मौलाना आज़ाद के जीवन पर आधारित है.
डॉ सईद आलम ने ये नाटक लिखा है और इसमें विभाजन के हालात और उसे लेकर मौलाना के विचार और उनके संघर्ष को दिखाया है. इस नाटक में मौलाना अंत तक विभाजन का विरोध करते हैं और बार-बार कहते हैं कि पाकिस्तान बनाने की ज़रूरत नहीं है. मौलाना आज़ाद को गाँधी, नेहरू और सरदार पटेल से शिकायत थी कि वे बंटवारे पर राज़ी क्यों हो गए. टॉम आल्टर बताते हैं कि इस नाटक में मौलाना आज़ाद के निजी ख़यालात ज़रूर उजागर होते हैं लेकिन इससे किसी को भला क्या एतराज़ हो सकता है. नाटक में पटेल के बारे में वे खुले ढंग से बातें करते हैं. जैसे वे एक जगह अपने सेक्रेटरी से कहते हैं कि ये कहना ग़लत नहीं होगा कि सरदार पटेल ही हिंदुस्तान के बंटवारे के जनक हैं. मौलाना आज़ाद नाटक का आख़िरी अंश है- जब मौलाना आज़ाद हुमायूँ कबीर को दास्ताँ सुना रहे होते हैं कि गाँधीजी भी किस तरह से आख़िर में बँटवारे के लिए राज़ी हो गए. हुमायूँ उनसे पूछते हैं कि 'फिर'. इस पर बेहद जज़्बाती हो कर मौलाना कहते हैं, "फिर क्या? आप अभी-अभी चाँद से उतरे हैं कि आपको 'फिर' की ख़बर नहीं. आपको मंटो के अफ़साने पढ़वाने होंगे कि आपको इस बात का पता चले कि 'फिर' हिंदुस्तान बँट गया और 'फिर' हिंदुस्तान आज़ाद हुआ." संस्कृतिकर्मी लोकेश ओहरी कहते हैं, "ये नाटक तो ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है और इसमें कई ऐसी बातें हैं जो इतिहास की किताबों में नहीं मिलतीं." उनका कहना है कि नाटक में सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील कुछ भी नहीं है, राजनैतिक रूप से संवदेनशील ज़रूर कुछ हो सकता है. इस नाटक के शो अगले महीने बंगलौर और मुंबई में पृथ्वी थियेटर में होंगे लेकिन गुजरात के लोग इसे नहीं देख पाएँगे. |
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