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अफ़ग़ान सुंदरी चली इतिहास रचने
अफ़ग़ान सुंदरी
अफ़ग़ान सुंदरी स्विसूट वर्ग में भी हिस्सा लेंगी

तालेबान का शासन ख़त्म होने के दो साल बाद अफ़ग़ानिस्तान में बहुत कुछ बदल गया है.

इसका एक सबूत यह भी है कि तीन दशक बाद देश से एक अफ़ग़ान सुंदरी एक सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग ले रही है.

अमरीका में वर्ष 1996 से रहीं 25 वर्षीया विदा समदज़ई फ़िलीपीन्स की राजधानी मनीला में आयोजित हो रही 'मिस अर्थ' प्रतियोगिता में 60 अन्य प्रतियोगियों के साथ हिस्सा लेंगी.

आयोजकों ने बताया कि समदज़ई बतौर मिस अफ़ग़ानिस्तान इस प्रतियोगिता में शरीक हो रही हैं और वह प्रतियोगिता के हर वर्ग में उतरेंगी, जिसमें स्विमसूट का वर्ग भी शामिल है.

इस वर्ग में मिस अफ़ग़ानिस्तान का हिस्सा लेने इसलिए भी अहम हो जाता है कि दो साल पहले तक सत्ता सँभालने वाले तालेबान शासन का कहना था कि महिलाओं का शरीर 'नख से शिख तक' यानी पूरा का पूरा ढँका होना चाहिए.

उस शासन में महिलाओं के लिए बुर्क़ा पहनना ज़रूरी था.

तालेबान से मुक्ति की ख़ुशी

कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय में पढ़ने वाली समदज़ई का कहना है कि इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर वह साथी देशवासियों को एक संदेश देना चाहती हैं.

उन्होंने रॉयटर्स समाचार एजेंसी को बताया, "मैं लोगों को इस बारे में जागरूक करना चाहूँगी कि बतौर अफ़ग़ान महिला हम प्रतिभाशाली हैं, बुद्धिमान हैं और ख़ूबसूरत हैं."


 मैं लोगों को इस बारे में जागरूक करना चाहूँगी कि बतौर अफ़ग़ान महिला हम प्रतिभाशाली हैं, बुद्धिमान हैं और ख़ूबसूरत हैं

विदा समदज़ई

तालेबान शासन को हटाए जाने से वह काफ़ी खुश हैं और कहती हैं, "मैं ख़ुश हूँ और मुझे इस बात की काफ़ी ख़ुशी है कि देश को अब तालेबान शासन से मुक्ति मिल चुकी है."

उन्होंने कहा, "अब महिलाएँ स्कूल जा सकती हैं, काम कर सकती हैं और वे स्वतंत्र हैं. उन्हें अब वे लंबं-लंबे बुर्क़े पहनने की ज़रूरत नहीं है."

समदज़ई सिर्फ़ ख़ूबसूरती की ही मूर्ति नहीं हैं बल्कि उन्होंने अफ़ग़ान महिलाओं की मदद के लिए अमरीका स्थित एक संगठन की स्थापना में मदद की है.

ये संगठन अफ़ग़ानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों और शिक्षा को लेकर जागरूकता फ़ैलाने की दिशा में काम कर रहा है.

किसी सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेने वाली वह सिर्फ़ दूसरी मिस अफ़ग़ानिस्तान हैं.

इससे पहले 1974 में ज़ोहरा दाउद मिस अफ़ग़ानिस्तान बनी थीं और तकनीकी रूप से देखें तो आज तक वही ख़िताब धारण किए हुए हैं.

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