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शुक्रवार, 10 अक्तूबर, 2003 को 05:51 GMT तक के समाचार
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क्रिकेट के बहाने एक समाज पर फ़िल्म
लंदन के एक यहूदी लड़के पर है कहानी
क्रिकेट के बहाने एक समाज पर बात करती है फ़िल्म

इंग्लैंड का समाज धीरे धीरे बदला और फिर वह एक बहुनस्लीय समाज बन गया.

यह फ़िल्म इस सामाजिक परिवर्तन पर टिप्पणी करने के लिए क्रिकेट का सहारा लेती है.

वाँड्रस ऑब्लिवियन ने क्रिकेट के बहाने एक ऐसे यहूदी लड़के की कहानी कहने की कोशिश की है जो 1960 के लंदन में पला बढ़ा है.

उसने नस्लीय तनाव को देखा है, बहुत सी संस्कृतियों का प्यार पाकर दोस्ती और वफ़ादारी का पाठ सीखा है.

11 साल का यह लड़का क्रिकेट तो खेलना चाहता है लेकिन उसे इसका मौक़ा नहीं मिल पाता.

अचानक उनके पड़ोस में जमैका से एक परिवार रहने आता है जो अपने घर के आंगन में क्रिकेट का नेट लगा लेता है.

बच्चा उनसे दोस्ती तो कर लेता है लेकिन दूसरे पड़ोसियों को यह पसंद नहीं आता.

डेविड (सैम स्मिथ) को उनके पड़ोसी डेनिस (डेलरॉय लिंडो) और उनकी बेटी (एजेंला विंटर) क्रिकेट खेलना सिखाते हैं और वह एक शानदार बल्लेबाज़ बन जाता है.

उसके खेल से उसकी स्कूल टीम को कप मिलता है.

पुरानी यादें

इस फ़िल्म के फ़िल्म के निदेशक पॉल मॉरिसन ने इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट ख़ुद छह साल पहले लिखी थी.

वे बताते हैं कि इंग्लैंड के एक बहु-नस्लीय देश में बदलने की कहानी को वे क्रिकेट के माध्यम से कहना चाहते थे.

उनका कहना है कि यूरोप के सुसभ्य समाज पर कैरेबियन संस्कृति का वैसा ही प्रभाव पड़ा जैसा कि डेविड और उसके परिवार पर पड़ा.

पॉल मॉरिसन बताते हैं कि क्रिकेट को फ़िल्माना एक कठिन काम है.

उनका कहना है कि यह कहानी क्रिकेट की ज़रुर है लेकिन असल में यह बीते ज़माने को याद करने जैसा है.

पॉल मॉरिसन इस फ़िल्म को मार्च में रिलीज़ करने जा रहे हैं और संयोग है कि तभी इंग्लैंड की टीम वेस्टइंडीज़ के दौरे पर जा रही है.

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