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'स्लमडॉग' से 'लायन की लचीली आत्मा' तक
- Author, असीम छाबड़ा
- पदनाम, स्तंभकार
डैनी बॉयल की फ़िल्म 'स्लमडॉग मिलियनेअर' के समय देव पटेल 18 साल के थे.
उनकी अभिनय क्षमता और बोलने के लहजे पर बहस शुरू हो चुकी थी, पर वे मीडिया में अच्छे ख़ासे पसंद किए जाने लगे थे.
पिछले आठ सालों में उन्होंने बहुत लंबी दूरी तय कर ली है.
अब वे 26 साल के हो चुके हैं. उनकी फ़िल्म 'लायन' टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म उत्सव में बीते हफ़्ते दिखाई गई.
वे उसमें सारू ब्रियरली की भूमिका में है. यह वह पात्र है, जो भारतीय मूल का है और जिसे ऑस्ट्रेलिया की एक दंपति ने गोद लिया है.
हालांकि पटेल फ़िल्म के बीच में आते हैं, पर वे कहानी को अपने आकर्षण, खूबसूरती, भावनात्मक गहराई और लंबे बालों के बल पर आगे ले जाते हैं.
'हॉलीवुड रिपोर्टर' ने अपनी समीक्षा में पटेल की 'ज़बरदस्त भूमिका' की तारीफ़ की और उन्हें 'लायन की लचीली आत्मा' क़रार दिया.
कुछ हलकों में कहा जा रहा है कि पटेल को ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामित किया जा सकता है.
टोरंटो फिल्म उत्सव के बाद 'रिपोर्टर' के प्रभावशाली टिप्पणीकार स्कॉट फ़ेनबर्ग ने कहा है कि सपोर्टिंग एक्टर श्रेणी में पटेल का नामांकन लगभग पक्का है.
मुझे इससे सहमत होना ही पड़ेगा. पटेल ने फ़िल्म लायन में बेहद अच्छा काम किया है.
अमरीका में द वीन्सटेन कंपनी इसकी वितरक है. इस कंपनी के मुखिया हार्वे वीन्सटेन का ऑस्कर पुरस्कारों के लिए अभियान और उसमें कामयाबी जगजाहिर है.
टोरंटो फ़िल्म उत्सव में इस फ़िल्म का प्रीमियम हुआ, जहां दर्शकों की आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने खड़े होकर तालियां बजा कर फिल्म को सराहा.
'वेराइटी' पत्रिका ने इस पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि "लायन के साथ ही हार्वे वीन्सटेन एक बार फिर ऑस्कर पुरस्कार की तलाश में चल पड़ेंगे."
'स्लमडॉग मिलियनेअर' के बाद जिस तरह सह कलाकार फ्रीडा पिंटो और इरफ़ान ख़ान का फिल्मी सफ़र आसान रहा, देव पटेल का वैसा नहीं रहा.
पिंटो को वूडी एलन, माइकल विंटरबॉटम और जूलियन स्कनैबेल जैसे नामी गिरामी निर्देशकों की फ़िल्में मिलीं. पर पटेल को सिर्फ़ आतंकवादी या टैक्सी ड्राइवर की भूमिकाओं से संतोष करना पड़ा.
उन्हें एक ही बड़ी फ़िल्म मिली. वह थी एम नाइट श्यामलन की 'द लास्ट एअरबेंडर'. पर इसे दर्शकों ने ख़ारिज कर दिया और समीक्षकों ने इसकी बेहद तीखी आलोचना की.
एक छोटी फ़िल्म 'अबाउट चेरी एंड द रोड विदइन' में भी उनके अभिनय की ओर किसी का ध्यान नहीं गया.
उनके पास बहुत काम नहीं था और उन्हें भारतीय लहजे में बोलने को कहा जाता था. पटेल के लिए यह चुनौतीपूर्ण था और वे इसे पूरी तरह कभी नहीं कर पाए.
उनका संघर्ष तब ख़त्म हुआ जब उन्हें 'द बेस्ट एग्ज़ॉटिक मेरीगोल्ड होटल' और उसके बाद उसी विषय पर बनी फ़िल्म 'सूनी कूपर' में काम मिला.
इस बीच पटेल ने एचबीओ पर नील संपत की न्यूज़ नाइट शो धारावाहिक में काम किया.
कास्टिंग एजेंट और शो के प्रोड्यूसरों ने यही देखा कि पटेल भारतीय मूल के ब्रितानी अभिनेता हैं.
पटेल ने भारतीय लहजे में बोलने की चिेंता किए बग़ैर अपनी अभिनय प्रतिभा दिखा दी. यह मौक़ा उन्हें तब मिला जब 7 जुलाई 2005 को लंदन के भूमिगत मेट्रो में बमों से हमला किया गया था.
बीते साल मैट ब्राउन ने माना कि 'द मैन हू न्यू इनफ़िनिटी' के लिए पैसे का इंतजाम करने में काफ़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, लेकिन जब लोगों को बताया गया कि इस फ़िल्म में देव पेटल भी हैं, प्रोड्यूसरों को पैसे लगाने वाल लोग मिल गए.
लोग यकायक पटेल पर जेरेमी आइरन्स से भी ज़्यादा भरोसा करने लगे. जेरेमी को ऑस्कर मिल चुका है. उन्होंने रामानुजम के मेंटर जीएच हार्डी की भूमिका निभाई है.
यह साफ़ है कि ब्रितानी पटेल ने ख़ुद को तमिल ब्राह्मण रामानुजन के अनुरूप ढालने के लिए काफ़ी मेहनत की है.
लेकिन लायन एक अलग किस्म का प्राणी है. इसके लिए पटेल को ब्रितानी लहजा छोड़ कर ऑस्ट्रेलियाई लहजा अपनाना पड़ा. यह पहला कौशल है, जिसे ब्रितानी और ऑस्ट्रेलियाई अभिनेताओं को सीखना ही चाहिए.
दूसरी बात यह कि उन्होंने मेलबर्न में रहने वाले अपने ही उम्र के व्यक्ति का किरदार निभाया है.
लायन के बारे में पूछे जाने पर पटेल ने कहा, "मैंने अब तक जितनी स्क्रिप्ट पढ़ी, उनमें इसकी स्क्रिप्ट सबसे अच्छी है. इसलिए इसका हिस्सा बनना बड़ी बात है."
तो इस बार, शायद पहली बार पटेल सही जगह हैं. ऑस्कर के बारे में पहले से जो बात की जा रही है, वह आश्चर्यनजक बिल्कुल नहीं है.