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सच में धोनी की एक 'अनटोल्ड स्टोरी'!
- Author, सुशांत एस मोहन
- पदनाम, बीबीसी मुंबई
रेटिंग - ***1/2 स्टार
आमतौर पर हिन्दी फिल्मों के रिलीज़ से पहले प्रेस और समीक्षकों के लिए ख़ास शो का आयोजन किया जाता है. इसके आधार पर रिलीज़ से पहले समीक्षक अपनी प्रतिक्रिया देते हैं.
लेकिन क्रिकेट स्टार धोनी की बायोपिक 'एम एस धोनी - एन अनटोल्ड स्टोरी' की रिलीज़ से पहले समीक्षकों के लिए कोई स्क्रीनिंग नहीं रखी गई.
शुक्रवार को आम दर्शकों के साथ ही मीडिया ने भी पहली बार ये फ़िल्म देखी.
फ़िल्म देखने आए अन्य मीडिया संस्थानों के लोगों का कहना था कि ज़रूर फ़िल्म में कोई कमी रही होगी, इसी वजह से फ़िल्म समीक्षकों को पहले नहीं दिखाई गई.
सुबह नौ बजे के शो में भी लाइन में लगकर टिकट ख़रीदनी पड़ रही थी. यह इस बात का सबूत था कि समीक्षाएं न आने के बाद भी बड़ी संख्या में लोग ये फ़िल्म देखने आए हैं.
ये संख्या निश्चित तौर पर इस साल की सबसे बड़ी हिट 'सुल्तान' के पहले शो के लिए आए दर्शकों से ज़्यादा थी.
फ़िल्म का पहला ही दृश्य शुरू होता है साल 2011 के विश्व कप फ़ाइनल मैच से, फिर फिल्म फ़्लैशबैक में चली जाती है.
रांची के एक स्कूल में एक वॉटर पंप ऑपरेटर का बेटा कैसे फ़ुटबॉल के गोलकीपर से क्रिकेट का विकेटकीपर बनता है.
कैसे वो लोकल लेवल से खेल कर रेलवे की नौकरी तक पहुंचता है और फिर कैसे अपने साथियों के भारतीय टीम में चुने जाने के बाद भी अपनी बारी का इंतजार करता है.
इस कहानी में धोनी के कैप्टन कूल धोनी बनने तक का पूरा सफ़र है. हालांकि छोटी अवधि की फ़िल्में देखने के आदी हो चुके दर्शक तीन घंटे से ज़्यादा लंबी इस फ़िल्म में थोड़ा असहज लगते हैं.
लेकिन नीरज पांडे ने एक असल कहानी या बायोपिक को फ़िल्मी माध्यम में अच्छे से बांधा है. फ़िल्म के कुछ दृश्य आपको वाक़ई रुलाते, हंसाते और दिलचस्प लग सकते हैं.
फ़िल्म का नाम 'अनटोल्ड स्टोरी' है और वाकई इस फ़िल्म में कई ऐसी बातें हैं जो शायद पहले आपको नहीं मालूम रही होगीं.
जैसे धोनी-युवराज की पहली मुलाक़ात, धोनी के हेलीकॉप्टर शॉट का जन्म और सबसे दिलचस्प है धोनी की लव लाइफ़.
कई लोग जो आज तक ये मानते आए हैं कि साक्षी धोनी की बचपन की साथी हैं और अब उनकी पत्नी हैं, उनका भ्रम इस फ़िल्म को देखकर टूटेगा.
फ़िल्म की एक बड़ी कमी है धोनी से जुड़े विवादों को ना दिखाना.
भारत की एकदिवसीय टीम से गांगुली, लक्ष्मण या द्रविड़ को निकाला जाना हो या आईपीएल का मैच फ़िक्सिंग विवाद, ये फ़िल्म इन कोनों को न तो छूती है और न ही इन पर रोशनी डालती है.
किसी भी विवाद से बचने के लिए फ़िल्म में कुछ दृश्यों में खिलाड़ियों के नाम भी म्यूट कर दिए गए हैं, जो अखरता है.
हालांकि इसकी भरपाई फ़िल्म में कमाल के ग्रॉफ़िक्स डाल कर की गई है. भारत के मैचों की असली फ़ुटेज में धोनी के चेहरे पर सुशांत सिंह राजपूत का चेहरा लगाया है.
और सुशांत कुछ दृश्यों में धोनी की इतनी अच्छी नक़ल करते हैं कि वो वाक़ई में धोनी लगते हैं.
फ़िल्म एमएस धोनी के निजी जीवन, उनके परिवार और उनके सफ़र के बारे में है. फ़िल्म अचानक से विश्व कप जीत के साथ ख़त्म हो जाती है. मन में कई सवाल रह गए, कुछ अनकहे क़िस्से छूट गए.
लेकिन तब तक सिनेमा हॉल में स्टेडियम वाला माहौल बन चुका था और फ़िल्म के आख़िरी दृश्य में जब धोनी दिखाई दिए तो पूरे हॉल में एक ही आवाज़ गूंज रही थी, "धोनी, धोनी!"
कुल मिलाकर कई तकनीकी ख़ामियों और कहानी की कमियों के बावजूद इस फ़िल्म को आप भारत में क्रिकेट पर बनी अब तक की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों जैसे कि इक़बाल, लगान से कम हरगिज़ नहीं कह पाएंगे.
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