You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
लाहौर ने कैसे पाई कूड़े के पहाड़ से आने वाली बदबू से निजात
- Author, उमर दराज़ नांगियाना
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, लाहौर
कुछ समय पहले तक लाहौर के रिंग रोड से गुज़रते हुए एक ऐसी जगह थी जहां दूर से ख़तरनाक बदबू आनी शुरू हो जाती थी. ये बदबू बता देती थी कि आप महमूद बूटी के इलाक़े के क़रीब पहुँच गए हैं.
महमूद बूटी में लाहौर की लैंडफ़िल साइट थी जहां कूड़े का पहाड़ लगभग 80 फ़ुट ऊंचा हो चुका था. कई सालों से लाहौर शहर से इकट्ठा होने वाला 14 मिलियन टन कूड़े का यह ढेर लगभग 41 एकड़ में फैल चुका था.
बदबू तो दिक्कत थी ही पर इससे भी बड़ी समस्या वह ख़तरनाक गैस थी जो उससे रिस रही है. ये गैस थी मीथेन.
कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में मीथेन गैस को जलवायु परिवर्तन के लिए कई गुना ज़्यादा ज़िम्मेदार माना जाता है. अगर मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड दोनों वातावरण में 20 साल तक रहती हैं तो धरती को गर्म करने में मीथेन का रोल 80 फ़ीसदी ज़्यादा होगा.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
वातावरण में आने के साथ ही इस गैस के मॉलिक्यूल तुरंत अपने अंदर गर्मी को सोख लेते हैं. हालांकि हवा में इसका ठहराव कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कम होता है लेकिन जितने समय तक इसका ठहराव रहता है उतने में यह गैस धरती को गर्म करने में कहीं बड़ा रोल अदा करती रहती है.
विभिन्न उपग्रहों की मदद से सन 2021 और उसके बाद के वर्षों में लाहौर की हवा में मीथेन के बादल देखे गए हैं. खास तौर पर एक ऐसा बादल महमूद बूटी लैंडफ़िल साइट और उसके पास लक्खू डीर डंप साइट के ऊपर देखा गया था.
बीबीसी से बात करते हुए लाहौर वेस्ट मैनेजमेंट कंपनी के सीईओ बाबर साहब दीन ने बताया कि 'ब्लूमबर्ग' पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार साल 2021 में इस लैंडफ़िल साइट के ऊपर मीथेन का एक बादल देखा गया था जिसकी वजह से बहुत बड़ी समस्या पैदा हो गई थी.
उस रिपोर्ट के अनुसार मीथेन गैस के इस बादल का आयतन लगभग 126 मीट्रिक टन था. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार साल 2021 में पाकिस्तान मीथेन का रिसाव करने वाला दुनिया का सातवां सबसे बड़ा देश था.
महमूद बूटी डंप साइट मीथेन के ज़रिए केवल वातावरण को ही नुक़सान नहीं पहुंचा रही थी बल्कि यह 'लीचेट' के रूप में भूगर्भीय जल को भी प्रदूषण कर रही थी और इससे पानी पीने के लायक़ नहीं रह पा रहा था.
लेकिन पिछले कुछ महीनों से धीरे-धीरे नज़रों से ओझल होते हुए महमूद बूटी डंप साइट का 14 मिलियन कूड़ा अब पूरी तरह ग़ायब हो चुका है. अब यहां से गुज़रते हुए बदबू भी नहीं आती. इसकी जगह मिट्टी का एक पहाड़ नज़र आता है.
कूड़े का पहाड़ कहां चला गया?
ये लैंडफ़िल साइट पाकिस्तान सरकार और स्थानीय प्रशासन के लिए एक सरदर्द बन चुका था. साल 2016 में महमूद बूटी लैंडफ़िल साइट को बंद कर दिया गया था लेकिन इसके बाद भी समस्या यह थी कि इतने ज़्यादा कूड़े का क्या किया जाए.
इसके अलावा पाकिस्तान ने दूसरे देशों के साथ मिलकर जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की 26वीं कॉन्फ़्रेंस यानी 'कॉप 26' में इस बात का संकल्प कर रखा है कि वह साल 2030 तक मीथेन के मानवीय स्रोतों से रिसाव की दर को 30 फ़ीसद तक नीचे लाएगा.
मीथेन के दो बड़े मानवीय स्रोत लाइव स्टॉक यानी मवेशियों का मल व गैस और लैंडफ़िल साइट्स हैं.
हाल ही में एलब्ल्यूएमसी (लाहौर वेस्ट मैनेजमेंट कंपनी) ने रावी अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी के साथ मिलकर एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया है जिसमें महमूद बूटी लैंडफ़िल साइट को ठीक करने की योजना बनाई गई है. इस योजना के शुरुआती चरणों पर काम के बाद यहां मौजूद 14 मिलियन टन कूड़ा मिट्टी के अंदर दब चुका है.
इस प्रोजेक्ट पर काम प्राइवेट कंपनियां कर रही हैं जिसे इस साल अगस्त तक पूरा किया जाना है. इस पर लगभग 140 करोड़ पाकिस्तानी रुपये ख़र्च होने का अनुमान है.
सरकार इस प्रोजेक्ट के लिए पैसे कहां से लाएगी?
एलब्ल्यूएमसी के सीईओ बाबर साहब दीन ने बताया कि इस प्रोजेक्ट के तहत 41 एकड़ पर फैली लैंडफ़िल साइट से गैस हासिल की जाएगी जिसे पास के उद्योगों को बेचा जाएगा.
उन्होंने बताया, "साथ ही इसके 11 एकड़ रक़बे पर एक सोलर पार्क बनाया जाएगा जो लगभग 5 मेगावाट बिजली बनाने की क्षमता रखेगा. बाकी 30 एकड़ पर अर्बन फ़ॉरेस्ट उगाया जाएगा."
महमूद बूटी साइट पर लेवलिंग और ग्रेडिंग का काम काफ़ी हद तक पूरा हो चुका है. साइट पर गैस की वेंट्स या रिसाव के लिए पाइप भी लगा दिए गए हैं.
यहां से मीथेन अब बादल की तरह निकलने की बजाय थोड़ी-थोड़ी करके रिस रही है.
बाबर साहब दीन ने बताया कि इस प्रोजेक्ट की अच्छी बात यह है कि इस पर सरकार का एक पैसा ख़र्च नहीं होगा. उन्होंने बताया कि इस पर सभी ख़र्च निजी कंपनियां करेंगी और उन कंपनियों को 'कार्बन क्रेडिट्स' के ज़रिए अदायगी की जाएगी.
कार्बन क्रेडिट क्या होता है?
कार्बन क्रेडिट्स को दूसरे शब्दों में ग्रीनहाउस गैस के रिसाव में कमी भी कहा जा सकता है. जब कोई कंपनी, शख़्स या संस्था कोई ऐसा प्रोजेक्ट करती है जिससे ग्रीन हाउस गैस ख़त्म हो या कम हो तो वह कार्बन क्रेडिट पैदा करती है.
एक मीट्रिक टन ग्रीन हाउस गैस ख़त्म होने या कम होने पर एक कार्बन क्रेडिट मिलता होता है. कंपनियां इसे कार्बन मार्केट में बेच सकती है.
कार्बन मार्केट में वह कंपनियां इससे यह क्रेडिट्स ख़रीद लेती हैं जो ख़ुद अपनी एमिशन या कार्बन उत्सर्जन को कम करने में सक्षम नहीं होतीं.
वह एक तरह से ऐसे प्रोजेक्ट्स को फ़ंड कर रही होती हैं जो कार्बन के रिसाव को कम कर रहे हैं. इस तरह उनकी तरफ़ से किया जाने वाला रिसाव ख़त्म होने वाली कार्बन या ग्रीनहाउस गैस से बैलेंस हो जाता है.
बाबर साहब दीन ने बीबीसी को बताया कि आम तौर पर कार्बन मार्केट में कार्बन क्रेडिट प्रोजेक्ट की क्वालिटी को देखते हुए 5 अमेरिकी डॉलर से लेकर 50 डॉलर तक मिलता है.
उन्हें उम्मीद है कि वो यहां से जुटाए गए कार्बन क्रेडिट को 18 से 20 डॉलर के बीच बेच पांएगे.
तो क्या मीथेन के रिसाव की समस्या हल हो गई?
मीथेन के रिसाव का एक बहुत बड़ा स्रोत मवेशियों का मल और गैस है. लेकिन लैंडफ़िल साइट्स के ख़राब प्रबंधन का भी मीथेन के रिसाव में बहुत बड़ा हाथ है.
अब यह देखना है कि सरकार महमूद बूटी के इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह लागू करने में कामयाब होती है या नहीं. और अगर वह इसमें कामयाब भी हो जाती है तो महमूद बूटी वह अकेला लैंडफ़िल साइट नहीं जहां लाखों टन कूड़ा हो.
महमूद बूटी साइट के बंद होने के बाद से लाहौर का ज़्यादातर कूड़ा पास के लक्खू डीर लैंडफ़िल साइट पर जा रहा है. वहां भी कई मिलियन टन कूड़ा जमा हो चुका है.
बाबर साहब दीन बताते हैं कि लक्खू डीर को भी उसी तरह ठीक करने का प्रोजेक्ट है. इसके लिए जर्मनी से फंड मिला है और तुरंत वहां भी काम शुरू हो जाएगा.
आगे चलकर इस पर भी महमूद बूटी की तरह अर्बन फ़ॉरेस्ट और सोलर पार्क बनाया जाएगा. उनका कहना है कि पहले इस तरह की लैंडफ़िल साइट्स को ख़त्म करना एक समस्या थी क्योंकि इस पर ख़र्च बहुत ज़्यादा आता था.
अब उन्हें उम्मीद है कि कार्बन क्रेडिट्स के आने से यह समस्या हल हो जाएगी और इस तरह के प्रोजेक्ट्स दूसरी जगहों पर भी शुरू किए जा सकेंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)