You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
सब्ज़ी खरीदना शौक और थिएटर ज़िंदगी, नादिरा बब्बर की 'कहानी ज़िंदगी की'
- Author, इरफ़ान
नादिरा ज़हीर बब्बर ने अपनी कला और समर्पण से भारतीय रंगमंच और सिनेमा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. अभिनेता और राजनेता राज बब्बर उनके पति हैं. आर्य बब्बर और जूही बब्बर उनके बच्चे हैं, जो अभिनय से जुड़े हैं.
मैं उनसे बातचीत करके ना सिर्फ उनकी प्रेरणादायक यात्रा से प्रभावित हुआ, बल्कि उनके जीवन और विचारों से बहुत कुछ सीखा. नादिरा बब्बर का नाम सुनते ही मेरे मन में पहला विचार उनके भारतीय रंगमंच और सिनेमा में उल्लेखनीय योगदान का आता है.
वह एक प्रतिभाशाली थिएटर कलाकार, लेखिका और निर्देशक हैं, जिन्होंने 'एकजुट' नामक थिएटर ग्रुप की स्थापना की थी, जो आज हिंदी रंगमंच में एक जाना-माना नाम है.
माता-पिता से मिली ये सीख
नादिरा बब्बर ने अपने माता-पिता यानी प्रगतिशील लेखक सज्जाद ज़हीर और रज़िया सज्जाद ज़हीर से सामाजिक न्याय, समानता और प्रगतिशील विचारधारा को आत्मसात किया. उनके पिता, सज्जाद ज़हीर, प्रगतिशील लेखक आंदोलन के संस्थापक सदस्य थे, और उनकी माँ, रज़िया, एक विद्वान और लेखिका थीं, जिन्होंने उन्हें संवेदनशीलता और साहस का पाठ पढ़ाया.
छोटी उम्र से ही नादिरा ने अन्याय, असमानता और अपमान के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई. इस जज़्बे को उन्होंने अपने रंगकर्म में खूबसूरती से पिरोया, जिसके सबूत उनके नाटकों जैसे 'दयाशंकर की डायरी' और 'सकुबाई' में देखे जा सकते हैं.
इन नाटकों में सामाजिक मुद्दों को गहराई से उकेरा गया, जो दर्शकों को नए ढंग से सोचने और परिवर्तन के लिए प्रेरित करते हैं. उनकी बहुमुखी प्रतिभा का सम्मान 2001 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से हुआ, जो भारतीय कला और संस्कृति में उनके योगदान का प्रमाण है.
इन फ़िल्मों से जीते दर्शकों के दिल
1981 में 'एकजुट' थिएटर ग्रुप की स्थापना नादिरा की दूरदर्शिता का परिणाम थी. इस ग्रुप के ज़रिए उन्होंने ना केवल हिंदी रंगमंच को समृद्ध किया, बल्कि कई नए कलाकारों को मौके भी दिए.
'एकजुट' ने दर्जनों नाटक प्रस्तुत किए हैं , जो सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत विषयों को छूते हैं और आज भी यह समूह उभरते रंगकर्मियों के लिए एक प्रेरणा है. हमारी बातचीत में नादिरा बब्बर ने बताया कि कैसे उन्होंने रंगमंच को एक माध्यम बनाया, जो ना सिर्फ मनोरंजन करता है, बल्कि समाज को आईना भी दिखाता है. उनके लेखन और निर्देशन में यह दृष्टि साफ झलकती है.
रंगमंच के अलावा, नादिरा बब्बर ने फ़िल्मों में भी अपनी छाप छोड़ी. उन्होंने 'ब्राइड एंड प्रेजुडिस' (2004) और 'जय हो' (2014) जैसी फ़िल्मों में सहायक भूमिकाओं से दर्शकों के दिल जीते.
उन्होंने अपने शुरुआती दिनों, चुनौतियों और सफलताओं की कहानियां साझा की हैं. यह सुनना प्रेरणादायक है कि कैसे उन्होंने अपने माता-पिता की विरासत को आगे बढ़ाया और आधुनिक रंगमंच के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा है.
आने वाली पीढ़ी को क्या संदेश दिया?
नादिरा बब्बर भारतीय कला और संस्कृति की एक प्रतीक हैं. हमारी चर्चा के दौरान उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अपने छात्र जीवन, रंगगुरु इब्राहीम अलकाज़ी, रंगमंच की ताकत, कलाकारों की ज़िम्मेदारी पर ठहर कर बातें कीं और आने वाली पीढ़ी के लिए संदेश दिया कि सफलता का कोई छोटा रास्ता नहीं होता, इस दिशा में लगातार प्रयास करते रहना होगा.
एक क्षण जो मुझे ख़ासतौर से याद रहेगा, वह था जब उन्होंने कहा, "मुझे सब्ज़ी के बाज़ार में जाना बहुत अच्छा लगता है क्योंकि वहां तरह तरह की सब्ज़ियां होती हैं. वहां सहज स्वभाव वाले दुकानदार और सरल जीवन है, जो मेरी कला को समृद्ध बनाते हैं." उनकी यह बात मेरे दिल को छू गई.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां कर सकते हैं. आप हमें एक्स, इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)