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ग्रोक जैसे एआई टूल्स का ज़्यादा स्मार्ट होना कितना ख़तरनाक? - द लेंस
एआई यानी आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और चैटबॉट्स स्मार्ट होते जा रहे हैं. आप भी ये लगातार सुन रहे होंगे.
इस हफ़्ते सोशल मीडिया पर तूफ़ान खड़ा करने वाला ग्रोक हो, डीपसीक हो, गूगल का जेमिनाई हो या उसके भी पहले से मौजूद चैटजीपीटी.
इनसे जहां आम लोग मज़े ले रहे हैं, वहीं ये राजनीति का अखाड़ा भी बन रहे हैं.
बात ये भी है कि दुनिया भर में टेक्नोलॉजी की क्रांति जैसी दिख रही है और भारत भी उसमें एक अहम मोड़ पर है, जहां वो सिर्फ़ मूकदर्शक नहीं बना रह सकता.
जो कुछ हो रहा है वो मज़ेदार लग रहा है मगर जब उसकी तह में जाने की कोशिश करें तो कुछ हद तक वो डरावना भी हो सकता है.
बात डेटा सिक्योरिटी, लोकतंत्र की असली भावना, तटस्थता और पूर्वाग्रह की भी है.
द लेंस के आज के एपिसोड में मुकेश शर्मा ने एआई और उससे जुड़े इन तमाम पहलुओं पर चर्चा की.
उनके साथ इस चर्चा में शामिल हुए शिव नादर विश्वविद्यालय में आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स के प्रोफ़ेसर आकाश सिन्हा और सुप्रीम कोर्ट की वकील ख़ुशबू जैन.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित