You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
वित्त मंत्री या प्रधानमंत्री: किस भूमिका में मनमोहन सिंह साबित हुए ज़्यादा असरदार?
- Author, राघवेंद्र राव और इशाद्रिता लाहिड़ी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पांच साल तक भारत के वित्त मंत्री और दस साल तक भारत के प्रधानमंत्री रहे डॉ. मनमोहन सिंह की विरासत इन्हीं दो कार्यकालों के ज़रिए समझी जा सकती है.
जहां वित्त मंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह एक आर्थिक सुधारक के रूप में उभरे वहीं उनका प्रधानमंत्री का कार्यकाल राजनीतिक खींचतान और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा रहा.
वित्त मंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने भारत को एक वैश्विक पटल तक पहुँचाया, लेकिन प्रधानमंत्री रहते हुए उन पर लगातार आरोप लगा कि वो एक कमज़ोर प्रधानमंत्री हैं.
तो वित्त मंत्री मनमोहन सिंह बनाम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह में किसका पलड़ा भारी रहा? आइए समझने की कोशिश करते हैं.
बीबीसी हिंदी के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
1991-1996: वित्त मंत्री मनमोहन सिंह
जब डॉ. मनमोहन सिंह ने 1991 में वित्त मंत्री का पद संभाला था उस वक़्त देश अपने अंतरराष्ट्रीय क़र्ज़ों की अदायगी में चूकने के कगार पर था और महंगाई और घटते विदेशी मुद्रा भंडार जैसी परेशानियों से जूझ रहा था.
वित्त मंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह भारत के आर्थिक उदारीकरण के शिल्पकार बने. उन्होंने बड़े स्तर पर सुधार लागू किए. इसमें रुपये का अवमूल्यन, व्यापार का उदारीकरण, सरकारी उद्यमों का निजीकरण और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफ़डीआई) पर ज़ोर देना शामिल था.
वित्त मंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने भारत की अर्थव्यवस्था को बाज़ार के हिसाब से चलने वाली खुली अर्थव्यवस्था बनाने की कोशिश की और काफ़ी हद तक कामयाब भी हुए.
डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा शुरू किए गए अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के तहत ये सुनिश्चित किया गया कि कारख़ानों को शुरू करने और उनका विस्तार करने या उपकरणों के आयात के लिए सरकारी मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं होगी.
डॉ. सिंह ने ऐसी वित्त नीतियां बनाईं जिनसे पूंजी बाज़ारों से धन जुटाना आसान हुआ और बिजली, सिविल एविएशन, दूरसंचार, राजमार्ग और बंदरगाहों से लेकर बैंकिंग, बीमा और केबल टेलीविज़न जैसे कई क्षेत्रों में निजी निवेश का रास्ता खुल गया.
डॉ. सिंह की वैश्वीकरण की नीतियों से भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाज़ारों, धन और टेक्नोलॉजी तक पहुंच मिली.
वित्त मंत्री रहते हुए डॉ. मनमोहन सिंह ने आयात शुल्क में कमी की, निजी क्षेत्र की भागीदारी और विदेशी निवेश को प्रोत्साहित किया. उन्हें लाइसेंस राज को ख़त्म करने का भी श्रेय दिया जाता है.
माना जाता है कि मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों की बदौलत ही भारत में 1990 के दशक में उद्योग तेज़ी से बढ़े और महंगाई पर लगाम लगायी जा सकी.
अर्थव्यवस्था की हालत सुधारने के लिए वित्त मंत्री के रूप में डॉ. सिंह के कार्यकाल को काफ़ी हद तक सफल माना जाता है. हालांकि उनके आलोचकों का ये भी कहना है कि डॉ. सिंह ने जो आर्थिक सुधार किए उनकी वजह से जो आमदनी की असमानता बढ़ी उसे दूर करने के लिए वो कुछ ख़ास नहीं कर पाए.
2004-2014: प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह
साल 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद जब ये साफ़ हो गया कि कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है तो ये तय माना जा रहा था कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी देश की अगली प्रधानमंत्री होंगी.
लेकिन सोनिया गांधी के विदेशी मूल पर उठे सवालों और विरोध के चलते उन्होंने प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया. इसके बाद मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद के लिए चुना गया.
जिस वक़्त मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने उस वक़्त भारत की अर्थव्यवस्था पहले ही खुल चुकी थी और तेज़ी से बढ़ रही थी. डॉ. सिंह के प्रधानमंत्री के कार्यकाल में जीडीपी में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई और भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक के रूप में उभरा.
वित्त मंत्री के तौर पर 90 के दशक की शुरुआत में डॉ. सिंह ने जिन आर्थिक सुधारों की नींव रखी थी, प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने उन सुधारों की वकालत करना जारी रखा. लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद डॉ. सिंह ने अपना ध्यान लोक कल्याण की नीतियों को लागू करने और मनरेगा और सूचना के अधिकार जैसे विषयों पर केंद्रित किया.
प्रधानमंत्री बनने के बाद डॉ. सिंह को गठबंधन सरकार के बंधनों में रहते हुए सरकार चलानी थी. इसका सीधा मतलब ये था कि उन्हें हर वक़्त अपने सहयोगी दलों के साथ सहमति बनाकर और उन्हें साथ लेकर चलना ज़रूरी था.
गठबंधन राजनीति के दबावों के चलते डॉ. सिंह को जीएसटी और एफ़डीआई जैसे मुद्दों पर फ़ैसला लेने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा. इन ज़रूरी मुद्दों पर फ़ैसलों में देरी होने की वजह से कहा जाने लगा कि उनकी सरकार में पॉलिसी पैरालिसिस (नीतिगत मसलों पर फ़ैसला न ले पाना) आ गया है.
मनमोहन सिंह के आलोचक अक़्सर उन्हें एक कमज़ोर प्रधानमंत्री कहते रहे. उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी ये भी कहते थे कि डॉ. सिंह के पास प्रधानमंत्री के तौर पर कोई असली ताक़त नहीं थी और उनकी सरकार के सब ज़रूरी फ़ैसले सोनिया गाँधी की मंज़ूरी के बाद ही लिए जाते थे.
अंतरराष्ट्रीय मामलों में डॉ. सिंह अपने शांत और कूटनीतिक दृष्टिकोण के लिए जाने जाते थे. उन्होंने रूस और अमेरिका जैसी महाशक्तियों के साथ-साथ एशिया के प्रमुख देशों के साथ संबंध मज़बूत करने की दिशा में काम किया.
गठबंधन के कुछ सहयोगियों के कड़े विरोध के बावजूद डॉ. सिंह भारत और अमेरिका के बीच परमाणु समझौते पर काम करते रहे और आख़िरकार उसे एक हक़ीक़त बनाने में कामयाब हुए. ये समझौता उनकी विदेश नीति की एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है.
प्रधानमंत्री के उनके पहले कार्यकाल के अंत में भारत भी दुनिया भर में फैली आर्थिक मंदी की चपेट में आ गया था. इसका नतीजा ये हुआ कि देश में महंगाई बढ़ी, रुपया कमज़ोर होने लगा और विकास की गति थमने लगी. उनकी सरकार पर असरदार फ़ैसले न ले पाने के आरोप लगे.
मनमोहन सिंह का प्रधानमंत्री के रूप में दूसरा कार्यकाल भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों से घिरा रहा. 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला आवंटन से जुड़े कथित घोटालों के आरोपों ने उनकी छवि को नुक़सान पहुंचाया.
टेक्नोक्रैट या राजनेता?
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा के मुताबिक़ मनमोहन सिंह "एक टेक्नोक्रैट थे, राजनेता नहीं" और वो अपना काम चुपचाप करते थे, लोगों को दिखाने के लिए नहीं.
विनोद शर्मा कहते हैं, "वित्त मंत्री के रूप में उनके पास तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की पावर ऑफ अटॉर्नी (राव की दी हुई सब शक्तियां) थी. मनमोहन सिंह ने नरसिम्हा राव के लिए ख़ुद को जोखिम में डाला और आर्थिक सुधारों की घोषणा से पहले राव को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया ताकि अगर वे नाकामयाब हो जाएं तो नरसिम्हा राव मनमोहन सिंह पर दोष मढ़ सकें."
मनमोहन सिंह की आलोचना में अक़्सर कहा जाता है कि वो अपने व्यवहार में दृढ़ता नहीं दिखाते थे. विनोद शर्मा कहते हैं कि प्रधानमंत्री के रूप में डॉ. सिंह को जब कोई स्टैंड लेने की ज़रूरत होती थी तो वो स्टैंड लेते थे.
शर्मा कहते हैं, "उन्हें एहसास था कि वो कांग्रेस पार्टी के स्वाभाविक नेता नहीं थे और उन्हें मुख्य रूप से एक अर्थशास्त्री होने के कारण लाया गया था. वे कांग्रेस पार्टी की पसंद बन गए क्योंकि वे पार्टी में किसी के भी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नहीं थे. उनकी योग्यता की वजह से ही उनकी ज़रूरत थी."
"सिंह और कांग्रेस पार्टी दोनों ही इस बात का ध्यान रखते थे कि वे प्रणब मुखर्जी या पी. चिदंबरम या उन जैसे किसी ऐसे फुल-टाइम राजनीतिज्ञ के साथ टकराव में न पड़ें जो ख़ुद मंत्री या प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते थे."
विनोद शर्मा याद करते हैं कि 'अपने दूसरे कार्यकाल के आख़िरी दिनों में मनमोहन सिंह 2जी घोटाले में उनके और पार्टी के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे दुष्प्रचार से परेशान थे.'
वो कहते हैं, "डॉ. सिंह डीएमके के दूरसंचार मंत्री ए राजा को बाहर का रास्ता दिखाना चाहते थे. उन्होंने अपना मन बना लिया था लेकिन करुणानिधि सहमत नहीं हुए. इससे मनमोहन सिंह को अपनी सरकार की स्थिरता से हाथ धोना पड़ा."
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक रशीद किदवई ने कहा, "जब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने उस वक़्त वे राजनीति में नौसिखिए थे लेकिन जब वे प्रधानमंत्री बने तब वे राजनेताओं के बीच राजनेता बन चुके थे. वे कांग्रेस के कई लोगों के षड्यंत्रकारी चरित्रों से वाकिफ़ थे. साथ ही वे अपनी सीमाओं को भी जानते थे. वे जानते थे कि किन बातों में पड़ना है और किन बातों में नहीं पड़ना है."
किदवई के मुताबिक़ 1991 से 1996 के बीच मनमोहन सिंह ने कई राजनीतिक ग़लतियां कीं.
वो कहते हैं, "मिसाल के तौर पर 1991 में जब उन्होंने अपना पहला बजट पेश किया तो उन्होंने राजीव गांधी फाउंडेशन नाम के एक निजी ट्रस्ट को 100 करोड़ रुपये का अनुदान देने का प्रस्ताव रखा. विपक्ष ने इस पर ख़ूब हंगामा किया और सरकार को अपना फ़ैसला वापस लेना पड़ा. यह सोनिया गांधी को नीचा दिखाने के लिए नरसिम्हा राव की एक राजनीतिक चाल थी लेकिन चूंकि बजट मनमोहन सिंह ने पेश किया इसलिए उन्होंने सारा दोष अपने ऊपर ले लिया."
किदवई कहते हैं, "दूसरी तरफ़ जब वे प्रधानमंत्री बने तो उनके आसपास अर्जुन सिंह, प्रणब मुखर्जी, शिवराज पाटिल, शरद पवार, और नटवर सिंह जैसे लोग थे. इन सभी के पास दशकों का राजनीतिक अनुभव था. हालांकि सिंह ने उन्हें नियंत्रित और अनुशासित किया."
किस भूमिका में ज़्यादा असरदार?
तो सवाल यही है कि क्या मनमोहन सिंह वित्त मंत्री के तौर पर ज़्यादा असरदार रहे या प्रधानमंत्री के तौर पर?
पत्रकार पंकज पचौरी मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री के दूसरे कार्यकाल के दौरान उनके मीडिया सलाहकार थे.
उनके मुताबिक़ वित्त मंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने जो काम किए उन्हीं की बदौलत वो प्रधानमंत्री बनकर बहुत कुछ कर पाए.
पचौरी कहते हैं, "जो वित्त मंत्री के तौर पर नींव रखी गई थी उसके ऊपर जो इमारत बनी वो प्रधानमंत्री की भूमिका में बनी और वो नींव ठोस है. जो इमारत बनी दुनिया में उसका डंका बज रहा है. उस इमारत के ऊपर उन्हीं खम्बों पर चाहे वो आधार हो, चाहे वो मनरेगा हो, चाहे वो शिक्षा का अधिकार हो और भोजन का अधिकार हो, वो जो खंबे थे उस इमारत के उन्हीं पर दूसरी और तीसरी मंज़िल बनने लगी."
विनोद शर्मा कहते हैं कि वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन सिंह एक जानी-पहचानी ज़मीन पर बल्लेबाज़ी कर रहे थे.
उन्होंने कहा, "ये उनके लिए कोई नई बात नहीं थी. ये वो कला थी जिसका वे एक अर्थशास्त्री, रिज़र्व बैंक के गवर्नर, योजना आयोग के उपाध्यक्ष और विश्व बैंक के अधिकारी के रूप में अपने पूरे जीवन में अभ्यास करते रहे थे. जब वे वित्त मंत्री बने तो उनके पास वह कौशल था. प्रधानमंत्री के रूप में वे राजनीतिक मोर्चे पर बहुत चुस्त नहीं थे. उन्हें इसलिए लाया गया क्योंकि उनकी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा नहीं थी."
रशीद किदवई कहते हैं कि साल 2009 में मनमोहन सिंह को लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का मौक़ा दिया गया था और अकाली उन्हें जालंधर से समर्थन देना चाहते थे लेकिन उन्होंने मना कर दिया.
किदवई ने कहा, "लेकिन 1999 के लोकसभा चुनाव के तजुर्बे से उन्हें एहसास हुआ कि पार्टी में भीतरघात की वजह से वो चुनाव हार गए थे. भीतरघात करने वाले कई लोग उनके कैबिनेट सहयोगी थे. इसलिए उन्होंने एक राजनीतिक चेहरा ओढ़ लिया. मैं उन्हें एक राजनेता के रूप में एक बड़ी सफलता के रूप में देखता हूं - एक नौकरशाह या अर्थशास्त्री से कहीं ज़्यादा. वे किसी भी दिन वित्त मंत्री से बेहतर प्रधानमंत्री थे. वे एक नए और बड़े जनादेश के साथ (2009 में) वापस आए. यह उनकी राजनीतिक सफलता और प्रधानमंत्री के रूप में सफलता का सबूत है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)